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विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक छाप: बस्तर की ढोकरा कला बनी भारत की कूटनीतिक पहचान

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रायपुर छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन को भेंट की ‘ट्री ऑफ लाइफ’ शिल्पकृति, वैश्विक मंच पर चमकी छत्तीसगढ़ की जनजातीय विरासत

रायपुर/भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत ने एक बार फिर विश्व मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री श्री क्रिस्टोफर लक्सन को छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की विश्वविख्यात ढोकरा ‘ट्री ऑफ लाइफ’ (जीवन वृक्ष) धातु शिल्पकृति भेंट कर न केवल भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को नई ऊंचाई प्रदान की, बल्कि छत्तीसगढ़ की जनजातीय कला, शिल्प परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक सम्मान भी दिलाया।

यह उपहार केवल दो राष्ट्राध्यक्षों के बीच सौहार्द का प्रतीक नहीं है, बल्कि भारत की “सॉफ्ट पावर” का प्रभावशाली उदाहरण भी है, जिसमें स्थानीय कला और परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का माध्यम बनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा इस विशिष्ट शिल्पकृति का चयन यह दर्शाता है कि भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता को विश्व समुदाय के सामने गर्व के साथ प्रस्तुत कर रहा है।

छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण

छत्तीसगढ़ लंबे समय तक अपनी प्राकृतिक संपदा, खनिज संसाधनों और जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है। अब यही राज्य अपनी अद्भुत लोककला और हस्तशिल्प के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान बना रहा है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार जनजातीय कला, संस्कृति और पारंपरिक शिल्पों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। कलाकारों को प्रशिक्षण, विपणन, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों तथा सरकारी योजनाओं के माध्यम से प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका परिणाम आज स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जब बस्तर की ढोकरा कला विश्व नेताओं के बीच सांस्कृतिक उपहार के रूप में सम्मान प्राप्त कर रही है।

मुख्यमंत्री ने इसे पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता को वैश्विक पहचान दिलाने वाला ऐतिहासिक अवसर है।

क्या है ढोकरा कला?

ढोकरा कला विश्व की सबसे प्राचीन धातु शिल्प परंपराओं में गिनी जाती है। इसका इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना माना जाता है। प्रसिद्ध मोहनजोदड़ो की कांस्य नर्तकी भी इसी प्रकार की धातु ढलाई तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।

इस कला में “लॉस्ट वैक्स कास्टिंग” (मोम सांचा ढलाई) तकनीक का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले मधुमक्खी के मोम से आकृति बनाई जाती है, फिर उस पर मिट्टी की कई परतें चढ़ाई जाती हैं। गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसके स्थान पर पिघली हुई धातु भरी जाती है। ठंडा होने के बाद मिट्टी हटाई जाती है और एक अद्वितीय कलाकृति तैयार होती है।

इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक शिल्पकृति पूरी तरह हस्तनिर्मित होती है। इसलिए दो कलाकृतियां कभी भी पूरी तरह एक जैसी नहीं होतीं। यही इसकी मौलिकता और कलात्मक मूल्य है।

ट्री ऑफ लाइफ’ : केवल शिल्प नहीं, एक दर्शन

प्रधानमंत्री द्वारा भेंट की गई ‘ट्री ऑफ लाइफ’ शिल्पकृति भारतीय दर्शन में जीवन, प्रकृति, समृद्धि और संतुलन का प्रतीक मानी जाती है।

भारतीय परंपरा में यह कल्पवृक्ष की अवधारणा से जुड़ी है, जो जीवन, विकास और सभी जीवों के परस्पर संबंधों का संदेश देता है।

दिलचस्प बात यह है कि न्यूजीलैंड के माओरी समुदाय की “व्हाकापापा” परंपरा भी जीवन, प्रकृति और पूर्वजों के बीच गहरे संबंधों की बात करती है। इस प्रकार यह उपहार केवल कलात्मक नहीं, बल्कि दोनों देशों की सांस्कृतिक संवेदनाओं को जोड़ने वाला सेतु भी बन गया।

कूटनीति में संस्कृति की बढ़ती भूमिका

आज दुनिया में कूटनीति केवल राजनीतिक और आर्थिक समझौतों तक सीमित नहीं रह गई है। संस्कृति, कला और विरासत भी देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाने का प्रभावी माध्यम बन चुकी हैं।

भारत पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों को स्थानीय और पारंपरिक हस्तशिल्प भेंट कर अपनी सांस्कृतिक विविधता का परिचय दे रहा है। इस नीति से एक ओर भारतीय कलाकारों को वैश्विक पहचान मिल रही है, वहीं दूसरी ओर देश की सांस्कृतिक छवि भी सशक्त हो रही है।

बस्तर की ढोकरा कला का इस स्तर पर चयन यह साबित करता है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़ी परंपराओं को विश्व मंच पर सम्मानपूर्वक स्थापित कर रहा है।

स्थानीय शिल्पकारों के लिए नई संभावनाएं

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस कला को मिली पहचान का सबसे बड़ा लाभ बस्तर के जनजातीय शिल्पकारों को मिलने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय हस्तशिल्प की वैश्विक मांग बढ़ेगी, निर्यात के नए अवसर खुलेंगे, जनजातीय कलाकारों की आय में वृद्धि होगी, युवाओं का पारंपरिक शिल्प के प्रति आकर्षण बढ़ेगा, सांस्कृतिक पर्यटन को नया प्रोत्साहन मिलेगा, यह उपलब्धि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर सकती है।

संस्कृति संरक्षण की दिशा में राज्य सरकार के प्रयास

छत्तीसगढ़ का संस्कृति विभाग लोककलाओं, जनजातीय परंपराओं और हस्तशिल्प के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। राज्य के संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में कलाकारों को मंच, प्रशिक्षण, विपणन और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

इन पहलों का उद्देश्य केवल कला का संरक्षण नहीं, बल्कि उसे आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाना है, ताकि कलाकार अपनी परंपरा को नई पीढ़ियों तक पहुंचा सकें।

विश्व को मिला छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक संदेश

बस्तर की ढोकरा ‘ट्री ऑफ लाइफ’ आज केवल धातु से बनी एक कलाकृति नहीं रह गई है। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा, जनजातीय ज्ञान, प्रकृति के प्रति सम्मान, सतत जीवनशैली और भारतीय सभ्यता के मानवीय मूल्यों का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री को भेंट किया जाना इस बात का प्रमाण है कि भारत की स्थानीय परंपराएं अब विश्व संवाद का हिस्सा बन रही हैं।

यह उपलब्धि केवल छत्तीसगढ़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है। यह संदेश भी देती है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक विरासत, लोककला और उन कलाकारों में निहित होती है जो पीढ़ियों से अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

जब बस्तर की ढोकरा कला विश्व नेताओं के हाथों तक पहुंचती है, तब केवल एक शिल्पकृति नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति, जनजातीय ज्ञान और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना भी विश्व मंच पर सम्मानपूर्वक स्थापित होती है।

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