गणेश चतुर्थी : एक ऐसी कथा, जिसमें पुत्र का सिर कटता है और फिर वही बालक बन जाता है प्रथम पूज्य
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का विशेष अंक
✍️ गणेश चतुर्थी ✍️
आलेख : प्रदीप मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से गूंजता है गणपति बप्पा का जयकारा… लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाने की परंपरा क्यों बनी, गणेश जी का जन्म कैसे हुआ, उनके मस्तक पर हाथी का सिर ही क्यों लगाया गया और वे प्रथम पूज्य कैसे बने?
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का यह विशेष अंक भगवान गणेश की कथा, उनके अद्भुत स्वरूप, रिद्धि-सिद्धि से जुड़े प्रसंग, गणेश चतुर्थी के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व और आधुनिक दृष्टि से इसके सामाजिक तथा पर्यावरणीय पक्ष को समझने का एक प्रयास है।
गणेश जी से जुड़ी कथाएं केवल मंदिरों और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं। उनके विशाल मस्तक से लेकर बड़े कान, छोटी आंखें, सूंड, एकदंत स्वरूप और मूषक वाहन तक हर प्रतीक अपने भीतर जीवन को समझने की एक अलग सीख देता है। लेकिन इन कथाओं को समझते समय यह अंतर भी बनाए रखना जरूरी है कि पुराणों में वर्णित धार्मिक कथाएं आस्था और परंपरा का हिस्सा हैं, जबकि ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्य अपने अलग प्रमाणों पर आधारित होते हैं।
इसीलिए इस विशेष लेख में हम श्रद्धा के साथ उन पुरानी कथाओं को समझेंगे, लेकिन जहां अलग-अलग परंपराओं में अलग विवरण मिलते हैं, वहां उसे उसी रूप में प्रस्तुत करेंगे, ताकि आस्था भी बनी रहे और तथ्य के प्रति ईमानदारी भी।
तो आइए, गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर जानें – गणेश जी कौन थे? माता पार्वती ने उन्हें कैसे बनाया? शिव ने उनका सिर क्यों काटा? पार्वती के क्रोध के बाद शिव ने क्या कहा? हाथी का सिर ही क्यों लगाया गया? गणेश जी प्रथम पूज्य कैसे बने? रिद्धि-सिद्धि कौन थीं? और आखिर गणेश चतुर्थी के पीछे छिपा आध्यात्मिक, ज्योतिषीय, सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश क्या है?
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। सनातन धर्म में भगवान गणेश प्रथम पूज्य माने गए हैं, इसलिए शुभ कार्यों की शुरुआत उनकी पूजा से होती है। गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाला यह पर्व आगे आने वाले अनेक धार्मिक उत्सवों की श्रृंखला का भी शुभ आरंभ माना जाता है।
गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश की पूजा का पर्व नहीं है। यह भारतीय धार्मिक परंपरा की उन कथाओं को याद करने का अवसर है, जिनमें परिवार, कर्तव्य, बुद्धि, अहंकार, क्षमा, पुनर्जन्म और जीवन के गहरे संदेश छिपे हुए हैं।
भगवान गणेश की आकृति देखते ही मन में पहला सवाल उठता है, आखिर एक देवता का सिर हाथी का ही क्यों है?
क्या यह केवल एक पौराणिक घटना है या इसके पीछे कोई प्रतीकात्मक संदेश भी है? और जब माता पार्वती के पुत्र का सिर भगवान शिव ने काट दिया, तब माता ने ऐसा क्या कहा कि स्वयं शिव को उस बालक को पुनर्जीवित करना पड़ा?
शिव पुराण की प्रसिद्ध कथा में इस प्रसंग का विस्तार मिलता है। हालांकि गणेश जी के जन्म और स्वरूप से जुड़ी कथाएं अलग-अलग पुराणों और क्षेत्रीय परंपराओं में अलग रूप में भी मिलती हैं। इसलिए पुरानी कथाओं को श्रद्धा के साथ प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि ये धार्मिक-पौराणिक परंपराएं हैं, आधुनिक इतिहास या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित घटनाओं का विवरण नहीं।
गणेश जी कौन थे?
सनातन धार्मिक परंपरा में गणेश जी को भगवान शिव और माता पार्वती का पुत्र माना जाता है। उनके अनेक नाम हैं गणेश, गणपति, विनायक, गजानन, एकदंत, लंबोदर, सिद्धिविनायक और विघ्नहर्ता।
‘गणपति’ अर्थात गणों के स्वामी और ‘विघ्नहर्ता’ अर्थात बाधाओं को दूर करने वाले।
लेकिन गणेश जी की सबसे अलग पहचान उनका स्वरूप है, मनुष्य का शरीर और हाथी का सिर।
यही स्वरूप उन्हें बुद्धि, विवेक और शक्ति के अद्भुत प्रतीक के रूप में स्थापित करता है।
माता पार्वती ने बालक को कैसे बनाया?
प्रसिद्ध शिव पुराण परंपरा के अनुसार एक समय माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने उस बालक को अपना पुत्र माना और उसे आदेश दिया कि जब तक वे स्नान कर रही हैं, तब तक किसी को भीतर प्रवेश न करने दिया जाए।
बालक ने माता की आज्ञा को अपना कर्तव्य मान लिया। इसी बीच भगवान शिव वहां पहुंचे।
बालक ने शिव को पहचान नहीं पाया और उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। शिव के गणों ने उसे समझाने और हटाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपने स्थान से नहीं हटा। उसके सामने एक ओर स्वयं भगवान शिव थे और दूसरी ओर उसकी मां की आज्ञा।
बालक ने मां की आज्ञा को प्राथमिकता दी। यहीं से कथा संघर्ष की ओर बढ़ती है।
शिव ने बालक का सिर क्यों काटा?
पुराणिक कथा के अनुसार विवाद इतना बढ़ गया कि भगवान शिव ने क्रोध में बालक का सिर अलग कर दिया।
जब माता पार्वती को यह पता चला तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। उनके लिए वह केवल कोई बालक नहीं था, बल्कि उनका पुत्र था।
पार्वती ने देवताओं और शिव के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त की और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की मांग की। यहीं कथा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आता है।
माता पार्वती ने क्या कहा और शिव ने क्या उत्तर दिया?
शिव पुराण के इस प्रसंग में पार्वती की मांग केवल भावनात्मक नहीं थी। कथा के अनुसार उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यदि उनके पुत्र को जीवन और सम्मान नहीं दिया गया तो उनका क्रोध संसार के लिए विनाशकारी हो सकता है।
देवताओं और ब्रह्मा आदि ने स्थिति को शांत करने का प्रयास किया। अंततः शिव ने यह स्वीकार किया कि बालक को पुनर्जीवित किया जाएगा।
शिव पुराण में पार्वती की शर्तों में बालक को सम्मानजनक स्थान और प्रमुख पद देने की बात भी आती है। इसके बाद शिव ने देवताओं को एक विशेष आदेश दिया।
यहीं से हाथी के सिर की पूरी कथा शुरू होती है।
आखिर हाथी का सिर ही क्यों लाया गया?
यह गणेश कथा का शायद सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है। शिव पुराण के वर्णन के अनुसार भगवान शिव ने देवताओं से कहा कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और जो पहला जीव मिले, उसका सिर लेकर आएं, जिसे गणेश के शरीर पर लगाया जा सके।
ध्यान देने वाली बात यह है कि कथा में शिव ने यह नहीं कहा था कि “केवल हाथी का सिर ही लेकर आना।”
आदेश था, उत्तर दिशा की ओर जाना और सबसे पहले मिलने वाले जीव का सिर लाना।
देवताओं को वहां एकदंत हाथी मिला। उसका सिर लाया गया और गणेश के शरीर पर स्थापित किया गया। इसके बाद वैदिक मंत्रों और पवित्र जल के माध्यम से उनके शरीर में पुनः चेतना आने का वर्णन मिलता है।
इसलिए इस कथा के मूल रूप को देखते हुए यह कहना अधिक सही है कि हाथी का सिर पहले से तय विकल्प नहीं था; कथा में उत्तर दिशा में मिले एकदंत हाथी का सिर गणेश जी को लगाया गया।
यही बात इस प्रसंग को और रहस्यमय बनाती है।
उत्तर दिशा ही क्यों?
अब दूसरा प्रश्न उठता है, शिव ने उत्तर दिशा में जाने का आदेश ही क्यों दिया?
पुराणिक और भारतीय धार्मिक परंपराओं में उत्तर दिशा का विशेष महत्व रहा है। हिमालय और कैलास की धार्मिक कल्पना उत्तर से जुड़ी है। इसलिए इस दिशा को आध्यात्मिक उन्नति और देवभूमि से जोड़कर भी देखा गया है। शिव का आदेश उत्तर दिशा की ओर जाने का था और वहां उन्हें एकदंत हाथी मिला।
गणेश जी फिर जीवित कैसे हुए?
हाथी का सिर गणेश जी के शरीर पर स्थापित किया गया। इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं द्वारा मंत्रोच्चार तथा पवित्र जल के अभिषेक का वर्णन आता है। शिव की इच्छा के अनुसार उस बालक में चेतना लौटती है।
कथा के अनुसार बालक फिर उठ खड़ा हुआ।
माता पार्वती का दुख समाप्त हुआ। और यहीं एक साधारण बालक की कहानी एक देवता के रूप में नए अध्याय में प्रवेश करती है।
शिव ने गणेश को क्या वरदान दिया?
बालक के पुनर्जीवित होने के बाद शिव ने उसे केवल अपना पुत्र स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे विशेष सम्मान दिया। गणेश को गणों का अधिपति बनाया गया।
इसी से उनका एक प्रमुख नाम बना – गणपति।
उनके प्रथम पूज्य होने की परंपरा भी इसी व्यापक धार्मिक परंपरा से जुड़ती है। अर्थात जिस बालक ने अपनी मां की आज्ञा की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव को भी रोक दिया था, वही आगे चलकर देवताओं में शुभ कार्यों के आरंभ में सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता बने।
यह कथा अपने भीतर एक गहरा संदेश रखती है
कर्तव्य के प्रति निष्ठा, बुद्धि और समर्पण अंततः सम्मान का कारण बन सकते हैं।
हाथी का सिर केवल कथा नहीं, एक प्रतीक भी है
अगर हम गणेश जी के स्वरूप को केवल शाब्दिक रूप से देखें तो हमारे सामने एक हाथी का सिर और मानव शरीर दिखाई देता है। लेकिन भारतीय प्रतीक परंपरा इसे कहीं अधिक गहराई से देखती है।
हाथी का सर विशाल होता है। उसमें शक्ति है, लेकिन उसके साथ धैर्य भी जुड़ा है।
गणेश जी का बड़ा सिर हमें विस्तृत सोच की प्रेरणा देता है।
उनके बड़े कान कहते हैं – पहले सुनो, फिर बोलो।
उनकी छोटी आंखें कहती हैं – अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखो।
उनकी सूंड बताती है कि शक्ति के साथ सूक्ष्मता भी जरूरी है। हाथी की सूंड भारी वस्तु उठाने में सक्षम है और छोटी वस्तु को भी संभाल सकती है।
अर्थात जीवन में परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता जरूरी है।
गणेश जी का बड़ा पेट क्या कहता है?
गणेश जी को लंबोदर भी कहा जाता है। उनके बड़े पेट को परंपरागत रूप से संसार के अनुभवों को धारण करने और सुख-दुख को पचाने की क्षमता से जोड़ा जाता है।
मनुष्य को जीवन में प्रशंसा भी मिलेगी और आलोचना भी। सफलता भी मिलेगी और असफलता भी। यदि हर बात पर हम टूट जाएं या क्रोधित हो जाएं तो आगे बढ़ना मुश्किल होगा।
गणेश जी का लंबोदर स्वरूप हमें मानो सिखाता है
अनुभवों को पचाना सीखो।
एकदंत का क्या अर्थ है?
गणेश जी के एक दांत से जुड़ी भी अलग-अलग पौराणिक कथाएं हैं। किसी कथा में इसका संबंध परशुराम से जुड़ता है तो किसी परंपरा में महाभारत लेखन से,इन सभी कथाओं को एक ही ऐतिहासिक घटना मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन ‘एकदंत’ का प्रतीकात्मक संदेश स्पष्ट रूप से एकाग्रता, त्याग और लक्ष्य पर टिके रहने से जोड़ा जा सकता है। हर चीज अपने पास रखने की आवश्यकता नहीं। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए कुछ छोड़ना भी पड़ता है।
मूषक ही गणेश जी का वाहन क्यों?
यह भी गणेश जी के स्वरूप का अद्भुत हिस्सा है।
एक ओर विशाल हाथीमुख और दूसरी ओर छोटा सा मूषक। मूषक से जुड़ी भी अलग-अलग पुराणिक कथाएं हैं। प्रतीकात्मक रूप से मूषक को मनुष्य की चंचल इच्छाओं और लगातार भागते मन से जोड़ा गया है। मन भी तो हर समय कुछ न कुछ चाहता है।
एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी पैदा हो जाती है।
लेकिन गणेश जी उसी मूषक पर सवार हैं।
अर्थात मनुष्य को अपनी इच्छाओं का गुलाम नहीं बनना चाहिए; विवेक को इच्छाओं का स्वामी बनाना चाहिए।
गणेश जी प्रथम पूज्य कैसे बने?
गणेश जी को प्रथम पूज्य बनाने से जुड़ी प्रसिद्ध कथा उनके और कार्तिकेय के बीच संसार की परिक्रमा की प्रतियोगिता से जुड़ी है। कथा के अनुसार दोनों भाइयों के सामने संसार की परिक्रमा करने की चुनौती रखी गई। कार्तिकेय अपने वाहन पर निकल पड़े।
गणेश जी ने परिस्थिति को समझा। उनका वाहन मूषक था। वे जानते थे कि शारीरिक गति में वे कार्तिकेय से मुकाबला नहीं कर सकते।
उन्होंने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा की और कहा कि माता-पिता ही उनके लिए पूरा संसार हैं। यह कथा गणेश जी की सबसे बड़ी शक्ति बताती है – बुद्धि – जहां दूसरे गति से आगे निकलना चाहते हैं, वहां गणेश ने सोचकर रास्ता खोज लिया।
रिद्धि और सिद्धि कौन थीं?
गणेश जी के साथ रिद्धि-सिद्धि का नाम लगभग हर व्यक्ति ने सुना है। लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है।
गणेश जी की पत्नियों को लेकर विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में अलग-अलग नाम मिलते हैं। शिव पुराण की एक प्रसिद्ध कथा में प्रजापति विश्वरूप की दो पुत्रियों के नाम सिद्धि और बुद्धि बताए गए हैं। इसी कथा में गणेश जी का विवाह उनके साथ होने और आगे चलकर उनके पुत्र क्षेम और लाभ होने का वर्णन मिलता है।
दूसरी ओर उत्तर भारत की लोकप्रिय परंपराओं में गणेश जी के साथ रिद्धि और सिद्धि का उल्लेख अधिक सुनने को मिलता है।
रिद्धि और सिद्धि का अर्थ क्या है?
नामों के अर्थ को समझें तो गणेश जी की परंपरा और भी रोचक हो जाती है।
रिद्धि को सामान्यतः समृद्धि, उन्नति, संपन्नता या प्रगतिशीलता से जोड़ा जाता है।
सिद्धि का अर्थ उपलब्धि, सफलता, पूर्णता या किसी कार्य की सिद्धि से जुड़ा है।
वहीं शिव पुराण में वर्णित बुद्धि विवेक, समझ और सही निर्णय की ओर संकेत करती है।
बुद्धि सही दिशा देती है, सिद्धि कार्य की पूर्णता का प्रतीक है और रिद्धि समृद्धि का।
लेकिन समृद्धि यदि बुद्धि के बिना हो तो उसका सही उपयोग कठिन हो सकता है। और बुद्धि यदि कर्म में परिणत न हो तो वह केवल विचार बनकर रह सकती है। इसलिए गणेश परंपरा हमें मानो बताती है, सही बुद्धि, सही कर्म और सही परिणाम तीनों का संतुलन ही जीवन की वास्तविक सफलता है।
शिव पुराण के वर्णन में सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ के जन्म का भी उल्लेख मिलता है।
गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता में इसे गणेश जी के जन्मोत्सव से जोड़ा जाता है। इस दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है, पूजा होती है, आरती होती है, मोदक और अन्य नैवेद्य चढ़ाए जाते हैं, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक आयोजन होते हैं।
कई स्थानों पर यह उत्सव कई दिनों तक चलता है और अंत में गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
विसर्जन भी अपने भीतर एक बड़ा संदेश रखता है।
जिस मिट्टी से स्वरूप बना, वह अंततः प्रकृति में लौट जाता है। आगमन और विसर्जन हमें जीवन की नश्वरता और प्रकृति के चक्र की याद दिलाते हैं।
गणेश जी को मोदक क्यों प्रिय है?
मोदक को गणेश जी का प्रिय प्रसाद माना जाता है।
इसके पीछे अनेक लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं हैं। लेकिन मोदक का एक सुंदर प्रतीकात्मक अर्थ भी निकाला जा सकता है।
बाहर से सामान्य दिखाई देने वाला मोदक भीतर से मीठा होता है। क्या मनुष्य को भी ऐसा ही नहीं होना चाहिए? बाहर से साधारण, लेकिन भीतर से मधुर।
वाणी में मिठास, व्यवहार में प्रेम, मन में करुणा
यही किसी भी धार्मिक पर्व की वास्तविक सुंदरता है।
दूर्वा का महत्व
गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा बहुत पुरानी है।
इसके महत्व से जुड़ी विभिन्न धार्मिक कथाएं मिलती हैं, दूर्वा की खासियत यह भी है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी उगने वाली जीवट घास है।
इसलिए इसे जीवनशक्ति और स्थायित्व के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है, गणेश पूजा में दूर्वा अर्पित करना हमें प्रकृति से जुड़े रहने की याद दिलाता है।
ज्योतिषीय परंपरा में गणेश जी को बुद्धि, वाणी, तर्क, गणना और सीखने की क्षमता से जोड़ा जाता है। कई परंपराओं में उनका संबंध बुध ग्रह से माना जाता है। विद्यार्थी, व्यापारी, लेखक और बौद्धिक कार्य करने वाले लोग गणेश उपासना को विशेष महत्व देते हैं। लेकिन यहां भी धार्मिक मान्यता और विज्ञान को अलग-अलग रखना जरूरी है।
ग्रहों की स्थिति या किसी देवता की पूजा से निश्चित परिणाम मिलते हैं, गणेश जी की पूजा का व्यावहारिक संदेश फिर भी बहुत स्पष्ट है, सोचो, समझो, फिर निर्णय लो।
गणेश जी की सामूहिक पूजा लोगों को जोड़ती है।
परिवार को साथ लाती है, बच्चों को अपनी संस्कृति से परिचित कराती है, भजन और सामूहिक धार्मिक गतिविधियां लोगों को मानसिक शांति और सामाजिक जुड़ाव का अनुभव दे सकती हैं सार्वजनिक गणेशोत्सव सामाजिक सहभागिता का माध्यम भी बन सकता है, लेकिन आज के समय में इसके साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी भी जुड़ गई है।
क्या गणेश जी हमें पर्यावरण बचाने का संदेश भी देते हैं?
गणेश जी की पूजा में मिट्टी, फूल, दूर्वा, जल और प्रकृति से जुड़ी अनेक वस्तुओं का प्रयोग होता है।
तो फिर क्या गणेश उत्सव के नाम पर नदी, तालाब और जलाशयों को प्रदूषित करना उचित होगा?
यह सवाल हर भक्त को खुद से पूछना चाहिए।
जहां संभव हो वहां प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमा और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जा सकता है।
आस्था तभी सुंदर लगती है जब उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो, गणेश जी की पूजा प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर नहीं, प्रकृति के प्रति सम्मान के साथ होनी चाहिए।
गणेश जी हमें आज क्या सिखाते हैं?
आज का मनुष्य बहुत तेजी से दौड़ रहा है, मोबाइल की दुनिया है, प्रतिस्पर्धा है, तनाव है, इच्छाएं लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे समय में गणेश जी का स्वरूप और भी प्रासंगिक दिखाई देता है।
बड़ा सिर कहता है – बड़ा सोचो।
बड़े कान कहते हैं – सुनना सीखो।
छोटी आंखें कहती हैं – ध्यान केंद्रित रखो।
सूंड कहती है – परिस्थिति के अनुसार ढलना सीखो।
बड़ा पेट कहता है – हर अनुभव को धैर्य से संभालो।
एकदंत कहता है – लक्ष्य पर टिके रहो।
मूषक कहता है – अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखो।
और गणपति का स्वरूप कहता है – बुद्धि को शक्ति से ऊपर रखो।
विसर्जन का सबसे बड़ा अर्थ
गणेश जी हमारे घर आते हैं, हम उनका स्वागत करते हैं, उन्हें सजाते हैं, आरती करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं, फिर एक दिन उन्हें विदा कर देते हैं।
क्यों?
क्योंकि भारतीय दर्शन में संसार को परिवर्तनशील माना गया है, मिट्टी से प्रतिमा बनती है और फिर मिट्टी में लौटती है, इसी में जीवन का संदेश छिपा है।
धन स्थायी नहीं। पद स्थायी नहीं। शरीर स्थायी नहीं।
अहंकार स्थायी नहीं, लेकिन अच्छे कर्म, संस्कार और विचार समाज में लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।
इसलिए गणेश विसर्जन केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करना नहीं होना चाहिए, यह अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और नकारात्मकता को विदा करने का संकल्प भी बन सकता है।
गणेश जी की सबसे बड़ी पूजा क्या है?
क्या गणेश जी की सबसे बड़ी पूजा सबसे बड़ा पंडाल लगाना है? क्या सबसे महंगी प्रतिमा स्थापित करना है? क्या सबसे ऊंची सजावट करना है?
शायद नहीं।
अगर गणेश जी बुद्धि के देवता हैं तो उनकी सबसे बड़ी पूजा है बुद्धि का सही उपयोग, अगर वे विघ्नहर्ता हैं तो किसी परेशान व्यक्ति का विघ्न दूर करना भी गणेश पूजा की भावना है, अगर वे मंगलमूर्ति हैं तो किसी के जीवन में मंगल करना भी उनकी आराधना है, अगर वे प्रकृति से जुड़े प्रतीकों के साथ पूजे जाते हैं तो प्रकृति की रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
गणेश जी की कथा में छिपा सबसे बड़ा रहस्य
गणेश जी की कहानी में सबसे बड़ा रहस्य शायद उनका हाथी का सिर नहीं है।
सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जिस बालक का सिर काट दिया गया, वही आगे चलकर प्रथम पूज्य कैसे बना?
इसका उत्तर कथा में छिपा है,उसने अपनी मां की आज्ञा निभाई, उसने कर्तव्य से समझौता नहीं किया।
उसके जीवन में संकट आया, उसका स्वरूप बदल गया, लेकिन अंततः उसे नया जीवन, नया सम्मान और नया दायित्व मिला।
मानो कथा कह रही हो, जीवन में एक अंत कभी-कभी एक नए आरंभ का रास्ता भी खोलता है।
यही शायद गणेश चतुर्थी का सबसे सुंदर संदेश है।
गणेश चतुर्थी में गणेश जी को घर लाएं, लेकिन उनकी सीख भी साथ लाएं, गणेश चतुर्थी हर वर्ष आती है, गणपति की प्रतिमा आती है, ढोल बजते हैं, आरती होती है, मोदक चढ़ते हैं,जयकारे लगते हैं –
गणपति बप्पा मोरया!
लेकिन असली सवाल तब शुरू होता है जब गणेश जी विदा होते हैं, क्या उनके साथ हमारी बुराइयां भी विदा हुईं?, क्या हमारा क्रोध कम हुआ?, क्या अहंकार थोड़ा कम हुआ?, क्या हमने अपने माता-पिता का सम्मान बढ़ाया?, क्या हमने किसी जरूरतमंद की मदद की?, क्या हमने पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लिया?, क्या हमने अपने बच्चों को केवल गणेश जी की कथा सुनाई या उनकी सीख भी समझाई?
यदि गणेश जी की विदाई के बाद भी उनके बड़े कान हमें सुनना सिखाएं, उनकी छोटी आंखें हमें एकाग्र रखें, उनका विशाल मस्तक हमें व्यापक सोच दे, उनकी सूंड हमें परिस्थितियों से सामंजस्य सिखाए और उनका मूषक हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण की याद दिलाता रहे तो समझिए गणेश जी केवल हमारे घर नहीं आए थे, वे हमारे जीवन में आए थे।
पुराणिक कथा अपनी जगह आस्था का विषय है। इतिहास और विज्ञान अपने प्रमाणों के आधार पर चलते हैं। दोनों को अलग रखते हुए भी हम गणेश परंपरा में छिपे जीवन-मूल्यों को समझ सकते हैं।
और शायद यही गणेश चतुर्थी का सबसे सुंदर अर्थ है
विघ्न बाहर खोजने से पहले भीतर देखो, समस्या से पहले बुद्धि को जगाओ, सफलता से पहले विवेक को अपनाओ और समृद्धि से पहले संस्कार को स्थान दो।
गणपति बप्पा मोरया! मंगल मूर्ति मोरया!
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का विशेष संदेश
इस गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा के साथ एक संकल्प जरूर लें, बुद्धि का सही उपयोग करेंगे, माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करेंगे, बच्चों को संस्कार देंगे, जरूरतमंद की सहायता करेंगे और प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना उत्सव मनाएंगे, क्योंकि सच्ची भक्ति केवल हाथ जोड़ने में नहीं, अपने जीवन और व्यवहार को बेहतर बनाने में भी है।
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