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जिस रात नहीं सोती छत्तीसगढ़ की बेटियां, सुबह कढ़ी-भात से खुलता है आस्था का वो राज!

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अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का विशेष अंक – हरितालिका (तीज) पर्व

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आलेख : प्रदीप मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार

हरितालिका (तीजा)… एक ऐसा पर्व, जिसमें व्रत से ज्यादा रिश्तों की मिठास है

तीजा (हरितालिका) का नाम लेते ही छत्तीसगढ़ के गांवों की वह तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है, जहां घर के आंगन में फूलों की खुशबू होती है, हाथों में मेहंदी की लाली होती है, माथे पर सिंदूर की चमक होती है और चेहरे पर अपने मायके आने की खुशी।
कहीं मां अपनी बेटी के आने का इंतजार करती है, कहीं भाई अपनी बहन को लेने की तैयारी करता है तो कहीं बहनें एक-दूसरे के साथ बैठकर तीजा के गीत गाती हैं।
लेकिन तीजा आखिर इतना खास क्यों है?, क्या यह केवल पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला व्रत है? या फिर इसके भीतर छत्तीसगढ़ की संस्कृति, नारी की तपस्या, परिवार का प्रेम और पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी परंपराएं छिपी हैं, जिनका अर्थ आज भी हमारी जिंदगी को जोड़ता है?
तीजा को जितना करीब से देखिए, उतना ही यह पर्व एक त्योहार से बढ़कर भावनाओं का उत्सव नजर आता है।   

तीजा की शुरुआत व्रत से पहले ही हो जाती है

तीजा का व्रत जिस दिन रखा जाता है, उसकी तैयारी केवल उसी दिन से नहीं होती। इसकी शुरुआत तो एक दिन पहले ही घर-आंगन में दिखाई देने लगती है। व्रत से पूर्व संध्या पर महिलाओं द्वारा पारंपरिक रूप से कड़ू-भात खाने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है। इसमें खास तौर पर करेले की सब्जी बनाई जाती है। इसके साथ खीर और रात में व्रत शुरू करने के पहले कुछ मीठा भी खाया जाता है।
      इसके पीछे लोकपरंपरा का अपना भाव है।
कड़वे करेले से लेकर मीठी खीर तक जैसे जीवन के दोनों रंगों को स्वीकार करने का संदेश दिखाई देता है।
जीवन में सुख भी है और दुख भी।  कड़वाहट भी है और मिठास भी।

शायद हमारी पुरानी परंपराओं ने भोजन के माध्यम से भी जीवन का यही दर्शन समझाने की कोशिश की है। रात में भोजन के बाद महिलाएं मुंह साफ कर व्रत का संकल्प लेती हैं और फिर शुरू होती है वह कठिन साधना, जिसका इंतजार पूरे परिवार को रहता है।

मेहंदी की लाली और सोलह श्रृंगार की चमक

तीजा के पहले से ही बहनों और बेटियों में अलग उत्साह दिखाई देने लगता है। हाथों में मेहंदी रचाई जाती है। नई साड़ी निकाली जाती है। चूड़ियां सजती हैं। माथे पर बिंदी और मांग में सिंदूर सजता है। गले में मंगलसूत्र और अन्य आभूषण पहने जाते हैं। पैरों में बिछिया और पायल की छनक सुनाई देती है। कई महिलाएं अपनी पारंपरिक मान्यता के अनुसार सोलह श्रृंगार करती हैं।
यह केवल सजने-संवरने की बात नहीं है।
इसके पीछे भी एक भाव है, अपने जीवनसाथी, परिवार और अपनी वैवाहिक परंपरा के प्रति सम्मान तथा पर्व की खुशी और जब मायके आई बेटी तैयार होकर घर के आंगन में निकलती है, तो मां की आंखों में शायद सबसे ज्यादा चमक उसी समय दिखाई देती है।

फूलों का फुलहरा और शिव-पार्वती की आराधना

तीजा पर्व की सबसे सुंदर लोकपरंपराओं में से एक है फूलों से फुलहरा बनाना। फूलों और प्राकृतिक सामग्री से सजा फुलहरा घर-आंगन की शोभा बढ़ाता है और इसी के सामने श्रद्धा से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
फूलों की यह सजावट केवल सुंदरता नहीं है। फूल प्रकृति का प्रतीक हैं। फूल जीवन की कोमलता का प्रतीक हैं। और फुलहरा मानो यह संदेश देता है कि भक्ति में भी प्रकृति का अपना स्थान है।
शिव और शक्ति की पूजा करते हुए महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि, पति के स्वास्थ्य, संतान की खुशहाली और घर में शांति की कामना करती हैं।

फिर शुरू होता है पूरा दिन और पूरी रात का कठिन व्रत

पूजा के बाद तीजा का कठिन पक्ष सामने आता है।
कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। न भोजन, न पानी, और फिर केवल एक-दो घंटे नहीं, बल्कि पूरा दिन और पूरी रात अपने संकल्प को निभाने की कोशिश।
यह आसान नहीं है। इसलिए तीजा के व्रत को केवल एक रस्म मानना शायद उन महिलाओं की तपस्या को छोटा करना होगा, जो श्रद्धा और विश्वास के साथ इसे निभाती हैं।
हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि आज के समय में स्वास्थ्य को नजरअंदाज न किया जाए। हर व्यक्ति की शारीरिक क्षमता अलग होती है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या किसी बीमारी से पीड़ित लोगों को कठोर निर्जला व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
आस्था जरूरी है, लेकिन जीवन और स्वास्थ्य उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

जब पूरा गांव सो जाता है, तब जागती है तीजा की रात

तीजा की रात का अपना ही जादू है। कई जगह महिलाएं रातभर जागकर भजन-कीर्तन, तीजा के गीत और धार्मिक कार्यक्रम करती हैं। रात गहराती जाती है। घर की बत्तियां एक-एक करके बंद होती जाती हैं। गांव की गलियों में सन्नाटा बढ़ता जाता है।
लेकिन किसी घर के आंगन से आती ढोलक की थाप और भजन की आवाज बता देती है कि वहां तीजा की रात अभी जाग रही है।
महिलाएं भक्ति में लीन होकर शिव-पार्वती का स्मरण करती हैं। कहीं कथा होती है। कहीं लोकगीत गाए जाते हैं। कहीं हंसी-मजाक के बीच पुरानी यादें ताजा होती हैं।
यही वह क्षण होता है जब तीजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता, बल्कि लोकजीवन की जीवंत तस्वीर बन जाता है।

सुबह का सूरज और कढ़ी-भात का पहला निवाला

पूरी रात जागरण और व्रत के बाद सुबह का इंतजार शायद सबसे कठिन होता है। सुबह होते ही पूजा-अर्चना और पारण की तैयारी होती है।
लोकपरंपरा के अनुसार व्रत के बाद दही से बनी कढ़ी और भात खाकर व्रत समाप्त करने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है।
सोचिए, जिस महिला ने एक दिन और एक रात अपने संकल्प के साथ बिताई, उसके सामने जब सुबह कढ़ी-भात की थाली आती होगी तो वह पहला निवाला उसके लिए कितना भावुक क्षण होगा।
वह सिर्फ भोजन नहीं। वह तपस्या के पूर्ण होने का क्षण है। वह परिवार की मंगलकामना के साथ किए गए संकल्प की पूर्णता है। वह राहत है।
वह संतोष है। और वह मुस्कान है, जिसे शायद वही महसूस कर सकता है जिसने तीजा का व्रत पूरे मन से निभाया हो।

तीजा के बाद मायके की ओर से बेटी के लिए प्यार

छत्तीसगढ़ में तीजा की एक और आत्मीय परंपरा है, मायके से बहन-बेटियों को उपहार देना।
तीजा के अवसर पर कई परिवार अपनी बेटी या बहन को साड़ी, श्रृंगार सामग्री, आभूषण अथवा अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य उपहार देते हैं। कहीं साड़ी होती है तो कहीं चूड़ी। कहीं गहना होता है तो कहीं मिठाई। लेकिन असली उपहार क्या होता है?
मायके का प्यार।
क्योंकि बेटी के लिए मायके से मिली साड़ी केवल कपड़ा नहीं होती। उसमें मां की ममता होती है। भाई का स्नेह होता है। बचपन की यादें होती हैं। और यह एहसास होता है कि शादी के बाद भी मायका उसके लिए उतना ही अपना है।

भाई के लिए तीजा, बहन के लिए मायके की याद

तीजा का एक भावुक पहलू भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा है। भाई अपनी बहन को मायके लाने या उसकी जरूरतों का ध्यान रखने की कोशिश करता है।
बहन मायके आती है तो घर की पुरानी यादें जैसे फिर से लौट आती हैं। मां के हाथ का खाना, बचपन का आंगन, भाई से छोटी-छोटी नोकझोंक, सहेलियों के साथ हंसी, और रात में देर तक चलने वाली बातें
क्या आधुनिक जिंदगी की भागदौड़ में हम इन भावनाओं को बचा पाएंगे? यही सवाल तीजा हमें बार-बार पूछता है।

माता पार्वती की तपस्या और तीजा का आध्यात्मिक रहस्य

हरतालिका तीज का धार्मिक संबंध माता पार्वती और भगवान शिव से माना जाता है।
मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी।
इसलिए तीजा का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि संकल्प, साधना, धैर्य और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है।
पार्वती की कथा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन में किसी लक्ष्य को पाने के लिए दृढ़ इच्छा और धैर्य जरूरी है।
यही कारण है कि विवाहित महिलाएं अपने दांपत्य जीवन की सुख-शांति और पति के स्वास्थ्य-दीर्घायु की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं।

तीजा का वैज्ञानिक पक्ष भी समझिए

व्रत को लेकर धार्मिक मान्यताएं अपनी जगह हैं, लेकिन आधुनिक दृष्टि से देखें तो उपवास शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डाल सकता है।
कुछ प्रकार के उपवासों पर वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं और भोजन के बीच लंबा अंतराल शरीर के चयापचय से जुड़े कुछ बदलाव ला सकता है। लेकिन निर्जला व्रत को सभी लोगों के लिए वैज्ञानिक रूप से लाभकारी बताना उचित नहीं होगा।
इसलिए तीजा की वैज्ञानिकता को सबसे ज्यादा उसके मानसिक अनुशासन, सामाजिक जुड़ाव, सामूहिक गतिविधियों और भावनात्मक स्वास्थ्य के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
जब महिलाएं एक साथ बैठती हैं, गीत गाती हैं, बातें करती हैं, हंसती हैं और अपनी भावनाएं साझा करती हैं, तो सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है। यही तो हमारी लोकसंस्कृति की खूबसूरती है।

इस वर्ष तीजा और गणेश चतुर्थी का विशेष संयोग

इस वर्ष हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का एक ही अंग्रेजी तारीख पर आना इसे और विशेष बना रहा है।
भारतीय पंचांग में पर्व अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख से नहीं बल्कि चंद्र तिथियों के अनुसार निर्धारित होते हैं। इसी कारण इस वर्ष तृतीया और चतुर्थी तिथियों का ऐसा क्रम बन रहा है कि दोनों पर्व एक ही अंग्रेजी तारीख के आसपास/उसी तारीख में आ रहे हैं।
हरतालिका तीज का संबंध माता पार्वती और भगवान शिव से है और गणेश चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित है। अर्थात एक ओर माता पार्वती की तपस्या, दूसरी ओर उनके पुत्र भगवान गणेश की आराधना। यह धार्मिक दृष्टि से बेहद सुंदर संयोग है।

गणेश जी हमें क्या सिखाते हैं?

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। उनका बड़ा सिर बड़ी सोच का संदेश देता है।
बड़े कान कहते हैं पहले सुनो, फिर बोलो। छोटी आंखें एकाग्रता का संदेश देती हैं। और उनका स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में किसी भी बाधा को बुद्धि और धैर्य से पार किया जा सकता है।

इसलिए तीजा और गणेश चतुर्थी का यह संयोग जैसे एक साथ दो संदेश लेकर आता है
माता पार्वती से संकल्प सीखिए और गणेश जी से बुद्धि-विवेक।

क्या तीजा केवल एक दिन का त्योहार है?

नहीं। तीजा उस मां की आंखों में है जो बेटी के आने का इंतजार करती है। तीजा उस भाई की जिम्मेदारी में है जो बहन को मायके लाता है। तीजा उस बेटी की मुस्कान में है जो वर्षों बाद अपने बचपन के आंगन में लौटती है। तीजा उस महिला की तपस्या में है जो अपने परिवार की मंगलकामना के लिए व्रत रखती है। तीजा उस फुलहरा में है जिसमें फूलों के साथ हमारी संस्कृति भी सजी होती है। तीजा उस रात के भजन में है जो गांव के सन्नाटे को तोड़ता है। तीजा उस कढ़ी-भात के पहले निवाले में है, जिससे एक लंबी तपस्या पूरी होती है। और तीजा उस साड़ी और गहने में भी है, जो मायके से बेटी को दिया जाता है और जिसके साथ अनकहा संदेश होता है
“बेटी, तू आज भी हमारे लिए उतनी ही अपनी है, जितनी शादी से पहले थी।”

तीजा बची तो संस्कृति बचेगी

आज समय बदल रहा है। परिवार छोटे हो रहे हैं।बेटियां दूर शहरों में रहने लगी हैं। मोबाइल ने संवाद का तरीका बदल दिया है। लोकगीतों की जगह आधुनिक संगीत ने ले ली है। ऐसे समय में तीजा जैसे पर्व हमारी जड़ों को बचाने का काम करते हैं।
जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम तीजा को दिखावे का पर्व न बनाएं। फूलों का फुलहरा फिर सजे।
लोकगीत फिर गूंजें। बेटियां मायके आएं। मां-बेटी बैठकर बातें करें। भाई-बहन फिर पुराने दिनों को याद करें। बच्चों को बताया जाए कि यह पर्व क्यों मनाया जाता है। और हमारी आने वाली पीढ़ी यह समझे कि संस्कृति केवल किताबों में लिखी चीज नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह परंपरा है जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी महसूस किया जाता है।

तीजा का संदेश

तीजा हमें सिखाता है कि रिश्ते केवल खून से नहीं, समय, सम्मान, विश्वास और प्रेम से जिंदा रहते हैं।
यह पर्व हमें माता पार्वती की तपस्या से धैर्य, भगवान शिव से स्थिरता, गणेश जी से बुद्धि और अपने परिवार से प्रेम करना सिखाता है।
इस तीजा एक संकल्प लें, अपनी बेटियों का सम्मान करेंगे। मां-बाप से जुड़े रहेंगे। पति-पत्नी के रिश्ते में सम्मान और संवाद बनाए रखेंगे। अपनी लोकभाषा, लोकगीत और लोकपरंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएंगे। और सबसे जरूरी आस्था के साथ स्वास्थ्य और विवेक को भी महत्व देंगे।
क्योंकि त्योहार तभी सार्थक है, जब उसके बाद भी हमारे घरों में प्रेम बना रहे।
इस वर्ष तीजा और गणेश चतुर्थी के इस विशेष संयोग पर माता पार्वती और भगवान शिव से परिवार में सुख-शांति की कामना करें और विघ्नहर्ता गणेश जी से जीवन की हर बाधा दूर करने तथा सही मार्ग पर चलने की बुद्धि मांगें।

छत्तीसगढ़ की सभी माताओं, बहनों, बेटियों और समस्त प्रदेशवासियों को हरतालिका तीजा एवं गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं।

तीजा का पर्व आपके जीवन में प्रेम, विश्वास, सुख, समृद्धि और रिश्तों की मिठास लेकर आए।

प्रदीप मिश्रा
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