छत्तीसगढ़ : दक्षिण कोसल से आधुनिक राज्य तक की गौरवगाथा – भाग-2
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
छत्तीसगढ़ की गौरव गाथा : भाग–2
“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की एक विशेष साप्ताहिक श्रृंखला है, जो हर रविवार पाठकों के लिए इतिहास, संस्कृति, विरासत, जनजीवन, पर्यावरण और समसामयिक विषयों पर शोधपरक एवं जनहित के मुद्दों को निष्पक्ष, निर्भीक और सच्चाई के साथ उठाता है, व्यवस्था को आईना दिखाता है और उन सवालों को सामने लाता है जिन पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है।“कलम की धार” केवल शब्दों का मंच नहीं, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों को सामने लाने का प्रयास है जिन्हें अक्सर व्यवस्था की चमक, आंकड़ों की भाषा और भाषणों के शोर में दबा दिया जाता है। यह मंच निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहित की पत्रकारिता के लिए समर्पित है। यहां सत्ता से सवाल भी होंगे, व्यवस्था का विश्लेषण भी होगा विश्लेषणात्मक आलोचनात्मक, सच को उजागर करता भ्रष्टाचार के खिलाफ जनहित कारी लेख प्रस्तुत करती है।
आज के इस विशेष श्रृंखला में हम आपको उस धरती की हजारों वर्षों पुरानी यात्रा पर लेकर चलेंगे, जिसे आज दुनिया छत्तीसगढ़ के नाम से जानती है। यह केवल एक राज्य नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, संघर्ष, अध्यात्म, प्रकृति और जनजातीय गौरव का जीवंत इतिहास है। इस श्रृंखला के आगामी अंकों में हम छत्तीसगढ़ के उन अनछुए पहलुओं से भी आपको परिचित कराएंगे, जिनकी चर्चा सामान्यतः इतिहास की पुस्तकों में बहुत कम मिलती है।
समय की धूल में छिपी एक भूली हुई कहानी
छत्तीसगढ़ की भूमि केवल मिट्टी और जंगलों का विस्तार नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जीवंत गाथा है जो हजारों वर्षों से समय के साथ सांस ले रही है। जब हम इस धरती के इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो हमें केवल राजा-महाराजाओं की कहानियाँ नहीं मिलतीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता मिलती है जिसने नदी, जंगल, पहाड़ और जनजातीय जीवन के बीच संतुलन बनाकर एक अद्भुत सामाजिक संरचना खड़ी की।
भाग–1 में हमने जाना कि कैसे यह भूमि दक्षिण कोसल के रूप में रामायण काल से जुड़ी रही, कैसे सिरपुर ने ज्ञान और संस्कृति का केंद्र बनकर पूरे भारत में अपनी पहचान बनाई।
अब यह कहानी आगे बढ़ती है उस कालखंड की ओर, जहाँ से छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास शुरू होता है, एक ऐसा युग जहाँ सत्ता, संस्कृति और समाज ने मिलकर “गढ़ों की व्यवस्था” को जन्म दिया।
आज का विषय –“हैहयवंश से कलचुरी साम्राज्य और 36 गढ़ों की रहस्यमयी ऐतिहासिक यात्रा
हैहयवंश : जंगलों और नदियों के बीच जन्मी पहली संगठित सत्ता
बहुत पुराने समय की बात है, जब महानदी की लहरें आज की तरह शांत नहीं थीं, बल्कि अपने साथ अनकही कहानियाँ बहाकर ले जाती थीं। उन्हीं किनारों पर एक सत्ता धीरे-धीरे आकार ले रही थी, जिसे इतिहास में हैहयवंश कहा गया। यह केवल एक राजवंश नहीं था, बल्कि उस समय की आवश्यकता से जन्मी एक सामाजिक व्यवस्था थी। जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में शासन करना आसान नहीं था, क्योंकि यहाँ हर दिशा में वन, नदी और जनजातीय जीवन फैला हुआ था।
हैहयवंश के शासकों ने सबसे पहले यह समझा कि इस भूमि को जीतने से अधिक महत्वपूर्ण इसे समझना है। उन्होंने तलवार से अधिक समझदारी को अपनाया। उन्होंने नदियों के किनारे छोटे-छोटे गाँव बसाए, कृषि को प्राथमिकता दी, जनजातीय समुदायों को साथ लेकर शासन चलाया, स्थानीय परंपराओं को सम्मान दिया, धीरे-धीरे यह क्षेत्र एक संगठित समाज में बदलने लगा। कहा जाता है कि हैहयवंश के समय ही “गढ़” जैसी अवधारणा का बीज पड़ा, जो आगे चलकर कलचुरी काल में एक विशाल प्रशासनिक प्रणाली बन गई।यह वह समय था जब छत्तीसगढ़ केवल भूमि नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता बन रहा था।
कलचुरी साम्राज्य : जब छत्तीसगढ़ ने स्वर्ण युग में प्रवेश किया
धीरे धीरे समय बदला, और इतिहास के मंच पर एक नया शक्तिशाली राजवंश आया, कलचुरी वंश।
यह वही समय था जब छत्तीसगढ़ ने अपने इतिहास का सबसे संगठित और स्वर्णिम युग देखा। कलचुरी शासकों ने इस पूरे क्षेत्र को देखकर समझ लिया कि यह भूमि बिखरी हुई नहीं, बल्कि अत्यंत समृद्ध है, बस इसे एक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता है।
उन्होंने शासन की एक अनोखी व्यवस्था बनाई,गढ़ प्रणाली। इस प्रणाली के अंतर्गत पूरा राज्य छोटे-छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटा गया, जिन्हें गढ़ कहा गया।
यह केवल प्रशासन नहीं था, यह एक राजनीतिक दर्शन था, जहाँ हर क्षेत्र को उसकी पहचान दी गई।
कलचुरी काल में,मंदिरों का निर्माण तेज़ी से हुआ, कृषि भूमि का विस्तार हुआ, व्यापारिक मार्ग विकसित हुए, कला और संस्कृति को संरक्षण मिला,रतनपुर इस साम्राज्य की धड़कन बन गया।
रतनपुर : एक राजधानी जो इतिहास की धड़कन बन गई
रतनपुर सिर्फ एक नगर नहीं था, यह उस समय का “दिल” था जहाँ से पूरे छत्तीसगढ़ की सांसें चलती थीं। जब राजा रत्नदेव प्रथम ने इसे राजधानी बनाया, तो यह निर्णय केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि रणनीतिक भी था। रतनपुर पहाड़ियों और जंगलों के बीच स्थित था, जिससे यह सुरक्षित भी था और केंद्र में भी।
यहां विशाल महल बने, मंदिरों की श्रृंखला बनी, व्यापारिक बाजार विकसित हुए, सैनिक छावनियाँ स्थापित हुईं, महामाया देवी मंदिर इस नगर का आध्यात्मिक केंद्र था, जहाँ लोग केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि निर्णयों और न्याय की उम्मीद लेकर भी आते थे। रतनपुर धीरे-धीरे एक ऐसे नगर में बदल गया, जहाँ सत्ता और आस्था एक साथ चलती थी।
36 गढ़ों की रहस्यमयी दुनिया : एक अद्भुत प्रशासनिक चमत्कार
अब कहानी उस हिस्से पर आती है जिसने छत्तीसगढ़ को इतिहास में अलग पहचान दी, 36 गढ़ों की व्यवस्था।
छत्तीसगढ़ के इतिहास में जब भी “36 गढ़ों” की चर्चा होती है, तो यह केवल एक भौगोलिक शब्द नहीं लगता, बल्कि एक ऐसी रहस्यमयी व्यवस्था सामने आती है जो आज भी इतिहासकारों के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है।
कल्पना कीजिए एक ऐसा युग, जब आधुनिक तकनीक नहीं थी, सड़कें सीमित थीं, और सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने में महीनों लग जाते थे। ऐसे समय में पूरे क्षेत्र को एक ही शासन के अंतर्गत चलाना अत्यंत कठिन कार्य था।
कलचुरी शासकों ने इसी समस्या का समाधान निकाला, उन्होंने पूरे राज्य को छोटे-छोटे प्रशासनिक भागों में बाँट दिया, जिन्हें “गढ़” कहा गया। ये गढ़ केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं थीं, बल्कि वे छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य जैसे थे।
हर गढ़ की अपनी सेना, कर प्रणाली, स्थानीय प्रशासन, न्याय व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान थी। यह व्यवस्था इतनी उन्नत थी कि यह आज के “जिला प्रशासन” प्रणाली से भी अधिक संगठित प्रतीत होती है।
गढ़ों का सामाजिक प्रभाव:- गढ़ व्यवस्था ने समाज को स्थिरता दी। किसान अपने खेतों में सुरक्षित थे, व्यापारी मार्गों पर बिना भय के यात्रा कर सकते थे, और स्थानीय लोग अपनी परंपराओं के साथ स्वतंत्र रूप से जीवन जीते थे। यह प्रणाली सत्ता को केंद्रीकृत करने के बजाय विकेंद्रीकृत करती थी, जिससे हर क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व विकसित हुआ।
गढ़ों की सैन्य शक्ति:- हर गढ़ में एक स्थानीय सेना होती थी। यह सेना राजा के अधीन होती थी लेकिन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कार्य करती थी। इससे बाहरी आक्रमणों से रक्षा आसान हो जाती थी।
सांस्कृतिक भूमिका:- गढ़ केवल प्रशासन नहीं थे, वे संस्कृति के केंद्र भी थे। हर गढ़ में लोकगीत, नृत्य, मंदिर, मेले विकसित होते थे। इस प्रकार 36 गढ़ों की व्यवस्था छत्तीसगढ़ को एक “छोटे-छोटे राज्यों का महासंघ” बना देती थी।
प्रमुख गढ़ों का विस्तार : हर गढ़ एक जीवित इतिहास
प्राप्त जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ (परंपरागत ऐतिहासिक सूची+ वर्तमान पहचान)
अवधारणा केवल प्रशासनिक विभाजन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक व्यवस्था है, जिसके अवशेष आज भी कई स्थानों पर मंदिरों, किलों, गढ़ों और पुरातात्विक स्थलों के रूप में देखे जाते हैं।
1. रतनपुर गढ़ – कलचुरी साम्राज्य की राजधानी, महामाया मंदिर, प्राचीन किला अवशेष, छत्तीसगढ़ का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक केंद्र
2. रायपुर गढ़ – वर्तमान राजधानी रायपुर, पुराना किला क्षेत्र (पुरानी बस्ती), महंत घासीदास स्मारक क्षेत्र में ऐतिहासिक संकेत, रायपुर क्षेत्र स्थित चंदखुरी को माता कौशल्या की जन्मस्थली माना जाता है। आज यहां स्थित कौशल्या माता मंदिर देश का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जहां माता कौशल्या की पूजा की जाती है।
3. बिलासपुर गढ़ – कलचुरी काल का प्रमुख केंद्र, (पुरातात्विक स्थल) निकट, प्राचीन मंदिर अवशेष, तालाब, + वर्तमान पहचान न्यायधानी
4. रायगढ़ गढ़ – राजा चक्रधर सिंह की सांस्कृतिक धरोहर, संगीत और नृत्य परंपरा, किले और जमींदारी अवशेष
5. सारंगढ़ गढ़ – सारंगढ़ रियासत, किला और राजमहल अवशेष
6. सक्ती गढ़ – सक्ती रियासत, प्राचीन प्रशासनिक क्षेत्र
7. जांजगीर गढ़ – जाजल्लदेव कालीन शिव मंदिर (जांजगीर-नैला), कलचुरी स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण
8. शिवरीनारायण गढ़ – महानदी-शिवनाथ संगम, शिवरीनारायण मंदिर (विष्णु मंदिर) तीर्थ स्थल
9. मल्हार गढ़ – अत्यंत प्राचीन पुरातात्विक स्थल, मंदिर अवशेष (3-4वीं शताब्दी), बौद्ध और हिंदू दोनों प्रभाव
10. पाली गढ़ – लाफागढ़ किला (पास क्षेत्र), चैतुरगढ़ (माता किला), प्राचीन शिव मंदिर अवशेष
11. खैरागढ़ गढ़ – संगीत विश्वविद्यालय क्षेत्र, खैरागढ़ रियासत, सांस्कृतिक धरोहर
12. कवर्धा गढ़ – भोरमदेव मंदिर समूह (खजुराहो ऑफ छत्तीसगढ़) फणीनाग वंशीय स्थापत्य
13. राजनांदगांव गढ़ – जमींदारी इतिहास, प्राचीन मंदिर और तालाब
14. दुर्ग गढ़ – दुर्ग किला क्षेत्र, भिलाई इस्पात नगरी (आधुनिक विस्तार)
15. भिलाई क्षेत्र – आधुनिक औद्योगिक केंद्र, ऐतिहासिक दृष्टि से दुर्ग गढ़ का हिस्सा
16. बालोद गढ़ – प्राचीन जनजातीय क्षेत्र, मंदिर और प्राकृतिक स्थल
17. धमतरी गढ़ – महानदी बेसिन, प्राचीन व्यापार मार्ग
18. गरियाबंद गढ़ – जंगल और जनजातीय संस्कृति, प्राचीन धार्मिक स्थल
19. महासमुंद गढ़ – सिरपुर क्षेत्र का प्रभाव, बौद्ध और हिंदू पुरातत्व, सिरपुर मंदिर,
20. कांकेर गढ़ – कांकेर रियासत, किला और वन संस्कृति, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
21. बस्तर गढ़ – जनजातीय सभ्यता का केंद्र, प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
22. जगदलपुर गढ़ – बस्तर रियासत की राजधानी, बस्तर दशहरा परंपरा, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
23. दंतेवाड़ा गढ़ – दंतेश्वरी मंदिर, धार्मिक शक्ति केंद्र, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
24. नारायणपुर गढ़ – आदिवासी संस्कृति, प्राचीन परंपराएँ, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
25. कोंडागांव गढ़ – हस्तशिल्प केंद्र, आदिवासी कला,प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
26. बीजापुर गढ़ – माओवादी क्षेत्र (आधुनिक संदर्भ) ऐतिहासिक वन क्षेत्र, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
27. सुकमा गढ़ – घने वन क्षेत्र, जनजातीय संस्कृति, प्राचीन काल दंडकारण्य क्षेत्र माना जाता था
28. कोरिया गढ़ – पहाड़ी क्षेत्र प्राचीन रियासत
29. मनेन्द्रगढ़ गढ़ – व्यापारिक केंद्र, कोरिया राज्य का हिस्सा
30. सूरजपुर गढ़ – प्राकृतिक क्षेत्र, कृषि आधारित जीवन
31. बलरामपुर गढ़ – पहाड़ी और वन क्षेत्रजनजातीय परंपरा
32. अंबिकापुर गढ़ – सरगुजा क्षेत्र की राजधानी, देवी मंदिर और संस्कृति
33. जशपुर गढ़ – जनजातीय संस्कृति, जंगल और पर्वतीय क्षेत्र
34. अभनपुर गढ़ – रायपुर के निकट, प्राचीन ग्रामीण क्षेत्र
35. लोरमी गढ़ – बिलासपुर क्षेत्र, कृषि आधारित क्षेत्र
36. तखतपुर / बेमेतरा गढ़ – कलचुरी प्रभाव क्षेत्र प्राचीन कृषि और प्रशासनिक क्षेत्र
छत्तीसगढ़ के ये 36 गढ़ केवल नाम नहीं हैं, बल्कि यह उस ऐतिहासिक व्यवस्था के जीवित प्रमाण हैं जहाँ प्रशासन विकेन्द्रीकृत था, संस्कृति हर क्षेत्र में अलग-अलग विकसित हुई, यहां स्थित मंदिर, किले और पुरातात्विक स्थल आज भी इतिहास बोलते हैं पाली के चैतुरगढ़, कवर्धा के भोरमदेव, जांजगीर के शिव मंदिर, मल्हार की प्राचीन मूर्तियाँ और बस्तर का दशहरा ये सभी इस व्यवस्था के जीवित प्रमाण हैं।
रामायण और महाभारत काल में छत्तीसगढ़
प्राचीन काल में वर्तमान छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। रामायण के अनुसार यह भगवान श्रीराम की मातृभूमि माना जाता है, क्योंकि माता कौशल्या दक्षिण कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री थीं। इसी कारण छत्तीसगढ़ को भगवान श्रीराम का ननिहाल और माता कौशल्या की जन्मस्थली कहा जाता है। वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने दंडकारण्य क्षेत्र में भ्रमण किया, जिसका बड़ा भाग वर्तमान छत्तीसगढ़ में स्थित माना जाता है।
महाभारत काल में भी दक्षिण कोसल का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि दक्षिण कोसल एक समृद्ध और शक्तिशाली जनपद था, जिसका उल्लेख महाभारत के सभापर्व और भीष्मपर्व में मिलता है। उस समय यह क्षेत्र मध्य भारत की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक इकाइयों में शामिल था। इस प्रकार रामायण और महाभारत दोनों कालों में छत्तीसगढ़ की भूमि भारतीय इतिहास और संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित रही।
क्षेत्रअब हम उन प्रमुख गढ़ों की यात्रा करते हैं, जो इस इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं।
रतनपुर गढ़ : सत्ता और आस्था का केंद्र, रतनपुर केवल राजधानी नहीं था, यह उस समय की “आत्मा” थी। यहाँ राजा रहते थे, लेकिन उनका शासन केवल आदेशों से नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से चलता था। महामाया देवी मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं था, बल्कि न्याय और निर्णय का केंद्र भी था।
रायपुर गढ़ : व्यापार और भविष्य की नींव, रायपुर प्रारंभ में एक छोटा प्रशासनिक केंद्र था, लेकिन इसकी स्थिति इतनी महत्वपूर्ण थी कि यह धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र का व्यापारिक केंद्र बन गया। व्यापारी यहाँ आते, अनाज और वस्त्रों का व्यापार होता, और धीरे-धीरे यह नगर बड़ा होता गया।
बस्तर गढ़ : जंगलों के बीच जीवित सभ्यता, बस्तर का गढ़ एक अलग ही दुनिया थी। यहाँ के जंगल, नदियाँ और जनजातीय समाज ने इसे विशिष्ट बना दिया। यहाँ शासन कठोर नहीं था, बल्कि प्रकृति और समाज के संतुलन पर आधारित था। जो प्राचीन काल में दंडकारों के नाम से प्रचलित था जो रामायण काल में भी रामायण मेंपढ़ा जा सकता है यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में प्रभु श्री राम के वनवास के दौरान यहां रहने की कई सबूत और प्रमाण मिलते हैं
कवर्धा गढ़ : कला और मंदिरों की भूमि, कवर्धा क्षेत्र में भोरमदेव जैसे मंदिर बने, जो आज भी कला का अद्भुत उदाहरण हैं। यह गढ़ स्थापत्य कला का केंद्र था।
रायगढ़ गढ़ : संस्कृति और संगीत का केंद्र, रायगढ़ गढ़ में लोक कला, नृत्य और संगीत की परंपराएँ विकसित हुईं, जो आज भी छत्तीसगढ़ की पहचान हैं।
कलचुरी वंश : शासक नहीं, बल्कि सभ्यता निर्माता, कलचुरी वंश को केवल एक राजवंश कहना उनके योगदान को छोटा करना होगा।
कोकल्ल प्रथम – उन्होंने साम्राज्य की नींव रखी और शासन व्यवस्था को स्थिर किया।
रत्नदेव प्रथम – उन्होंने रतनपुर को राजधानी बनाया और छत्तीसगढ़ को संगठित राज्य का रूप दिया।
पृथ्वीदेव प्रथम – उन्होंने न्याय और प्रशासन को मजबूत किया।
जाजल्लदेव प्रथम – उनके समय में धार्मिक और सांस्कृतिक विकास चरम पर था।
पृथ्वीदेव द्वितीय – उन्होंने साम्राज्य का विस्तार किया।
जाजल्लदेव द्वितीय – वे कलचुरी वंश के अंतिम महान शासकों में से एक थे।
रायपुर का विकास : एक छोटे केंद्र से महान राजधानी तक
रायपुर की कहानी एक साधारण गांव से शुरू होकर एक महान राजधानी तक पहुँचने की यात्रा है।शुरुआत में यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था। यहाँ छोटे-छोटे गांव थे और स्थानीय लोग कृषि और वन संसाधनों पर निर्भर थे।
जब कलचुरी शासन ने इस क्षेत्र को अपने अधीन लिया, तब उन्होंने इसकी भौगोलिक स्थिति को समझा, यह स्थान व्यापार और प्रशासन दोनों के लिए आदर्श था। धीरे-धीरे यहाँ बाजार विकसित हुआ। दूर-दूर से व्यापारी आने लगे। नमक, अनाज, वस्त्र और धातुओं का व्यापार बढ़ने लगा। समय के साथ यह स्थान एक प्रशासनिक केंद्र बन गया।
यहाँ कर वसूली केंद्र, सैनिक चौकी, बाजार, और प्रशासनिक कार्यालय स्थापित हुए। रायपुर धीरे-धीरे इतना महत्वपूर्ण बन गया कि इसे बाद में राज्य की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
बस्तर और काकतीय राजवंश : जंगलों की स्वतंत्र सभ्यता
बस्तर का इतिहास भारत के सबसे अनोखे इतिहासों में से एक है। यह क्षेत्र घने जंगलों, पहाड़ियों और नदियों से घिरा हुआ था। यहाँ जीवन आसान नहीं था, लेकिन बेहद प्राकृतिक और संतुलित था।काकतीय वंश के संस्थापक अन्नमदेव ने इस क्षेत्र में शासन की शुरुआत की। लेकिन उनका शासन अन्य राजाओं की तरह नहीं था। उन्होंने यहाँ के जनजातीय समाज को समझा और उन्हें शासन में शामिल किया। बस्तर में शासन प्रकृति के नियमों के अनुसार चलता था।
बस्तर दशहरा – यह केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि पूरे समाज का उत्सव था, जिसमें राजा भी भाग लेते थे और जनता भी। यह परंपरा आज भी जीवित है।
समाज और संस्कृति : एक जीवंत सभ्यता का निर्माण
कलचुरी और गढ़ व्यवस्था के समय छत्तीसगढ़ केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध था। यहाँ, करमा नृत्य, सुआ नृत्य, पंथी गीत, लोककथाएँ, समाज को जोड़ने का कार्य करती थीं। कृषि जीवन का आधार थी और समाज में सहयोग की भावना सबसे बड़ी शक्ति थी।
इतिहास जो आज भी जीवित है – छत्तीसगढ़ का मध्यकाल केवल अतीत नहीं है, यह आज भी इस भूमि की परंपराओं, मंदिरों, लोकगीतों और लोगों के जीवन में सांस लेता है। 36 गढ़ों की व्यवस्था, कलचुरी साम्राज्य की शक्ति और बस्तर की जनजातीय संस्कृति, यह सब मिलकर छत्तीसगढ़ को एक अनोखी पहचान देते हैं।
क्रमशः…
अगले अंक में पढ़ें : भाग–3“प्रागैतिहासिक छत्तीसगढ़ से मौर्य साम्राज्य तक : जअगले अंक में हम आपको लेकर चलेंगे उस समय में जब इतिहास की किताबें लिखी भी नहीं गई थीं। हम जानेंगे कि छत्तीसगढ़ में मानव सभ्यता के सबसे पुराने प्रमाण कहां मिले, सीताबेंगा और जोगीमारा गुफाएं क्यों पूरी दुनिया के इतिहासकारों को आकर्षित करती हैं, मौर्य साम्राज्य और सम्राट अशोक का इस क्षेत्र से क्या संबंध था, और कैसे दक्षिण कोसल धीरे-धीरे भारत की महान सांस्कृतिक शक्तियों में शामिल हुआ।
(जारी…)
प्रदीप मिश्रा (संपादक)। निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर। जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
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