बुनकरों की कमी से दम तोड़ रही हथकरघा परंपरा, संकट में सदियों पुराना हुनर
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मुंगेली, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
बुनकरों के लगातार घटने से हथकरघा समितियां बंद होने की कगार पर, परंपरागत व्यवसाय को बचाने के लिए सरकार और समाज से ठोस पहल की मांग।
मुंगेली, ACGN। छत्तीसगढ़ की समृद्ध हथकरघा परंपरा आज अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी गांव-गांव में करघों की गूंज से जीवंत रहने वाला बुनकर समाज अब घटती आमदनी, बढ़ती महंगाई और युवाओं की घटती रुचि के कारण गंभीर संकट का सामना कर रहा है। प्रदेश की कई हथकरघा सहकारी समितियां बंद हो चुकी हैं, जबकि अनेक समितियां सीमित संख्या में बुनकरों के सहारे किसी तरह संचालित हो रही हैं।
जानकारी के अनुसार पहले हथकरघा समितियों में सैकड़ों बुनकर कार्यरत रहते थे, लेकिन समय के साथ रोजगार के अन्य विकल्प मिलने और पारंपरिक बुनाई से पर्याप्त आय नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में बुनकर खेती, मजदूरी और अन्य व्यवसायों की ओर रुख कर चुके हैं। इसका सीधा असर हथकरघा उद्योग पर पड़ा है और अनेक करघे आज उपयोग के अभाव में बंद पड़े हैं।
हालांकि संबंधित विभाग समय-समय पर कच्चा माल उपलब्ध कराने तथा समितियों को पुनर्जीवित करने के प्रयास कर रहा है, लेकिन नई पीढ़ी का इस व्यवसाय की ओर आकर्षण कम होने से अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। बुनकरों का कहना है कि दिनभर मेहनत करने के बाद भी इतनी आय नहीं हो पाती कि परिवार का सम्मानजनक ढंग से पालन-पोषण किया जा सके। यही कारण है कि युवा इस पारंपरिक कला को अपनाने के बजाय अन्य रोजगारों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हथकरघा उद्योग केवल इतिहास बनकर रह जाएगा। इससे न केवल हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक शिल्पकला को भी गहरा नुकसान पहुंचेगा।
सोशल मीडिया प्रचारक कोमल देवांगन ने कहा कि बुनकर समाज की असली पहचान उसकी कला, मेहनत और परंपरा है। यदि आज इस उद्योग को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी पहल नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियां हथकरघा बुनाई को केवल पुस्तकों में पढ़ेंगी। उन्होंने सरकार से बुनकरों के लिए विशेष प्रोत्साहन योजनाएं, आधुनिक प्रशिक्षण, बेहतर विपणन व्यवस्था, उचित पारिश्रमिक तथा युवाओं को इस व्यवसाय से जोड़ने के लिए आकर्षक योजनाएं शुरू करने की मांग की।
उन्होंने समाज से भी अपील की कि स्थानीय स्तर पर हाथ से बने वस्त्रों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए, ताकि बुनकरों को नियमित रोजगार और सम्मानजनक आय मिल सके। उनका कहना है कि हथकरघा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक है। इसे बचाना सरकार, समाज और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। समय रहते सार्थक प्रयास किए गए तो बंद पड़े करघों पर फिर से बुनाई की मधुर आवाज गूंजेगी और बुनकर परिवारों के जीवन में खुशहाली लौट सकेगी।
प्रदीप मिश्रा
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