सरगुजा विवाद, नार्को टेस्ट की मांग और लोकतंत्र में बढ़ते टकराव के बीच उठते बड़े सवाल
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सरगुजा छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009

सुशासन, संवाद और सत्ता का संतुलन
अंबिकापुर:- सरगुजा में विधायक और नायब तहसीलदार के बीच सामने आया विवाद अब केवल एक प्रशासनिक या राजनीतिक घटनाक्रम नहीं रह गया है। यह मामला लोकतंत्र की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक स्वतंत्रता, राजनीतिक मर्यादा, संगठनात्मक अनुशासन और कानून के समान अनुपालन पर एक गंभीर बहस का विषय बन चुका है। एक ओर नायब तहसीलदार द्वारा मारपीट और दबाव के आरोप लगाए गए हैं, तो दूसरी ओर जनप्रतिनिधि पक्ष और अन्य संबंधित लोगों द्वारा भी अपनी बातें सामने रखी जा रही हैं। विधायक की बहन सीमा धनिक सहित एक अन्य महिला द्वारा नायब तहसीलदार पर लगाए गए आरोपों की भी चर्चा है, जिन्हें नायब तहसीलदार ने सिरे से खारिज करते हुए सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने सभी संबंधित पक्षों के नार्को टेस्ट की मांग कर दी है। यहां तक कि उन्होंने स्वयं का नार्को टेस्ट पहले कराने की बात भी कही है।
एक शासकीय अधिकारी द्वारा सार्वजनिक रूप से इस प्रकार की चुनौती देना सामान्य बात नहीं है। यदि कोई अधिकारी इतनी बड़ी बात कह रहा है, तो यह भी जांच और विचार का विषय है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि किसी पक्ष को सही या गलत मान लिया जाए। लोकतंत्र में सत्य का निर्धारण आरोपों, नारों और सोशल मीडिया की बहसों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और वैधानिक प्रक्रिया से होना चाहिए।
संवाद की जगह टकराव क्यों?
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और अधिकारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं को शासन तक पहुंचाते हैं और अधिकारी उन समस्याओं के समाधान के लिए नीतियों और नियमों के अनुरूप कार्य करते हैं। लेकिन जब संवाद की जगह टकराव, सहयोग की जगह दबाव और संस्थागत प्रक्रिया की जगह सार्वजनिक विवाद लेने लगें, तब व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
यदि किसी अधिकारी से असहमति थी तो शिकायत, जांच और विभागीय प्रक्रिया के रास्ते उपलब्ध थे। यदि किसी जनप्रतिनिधि को न्याय नहीं मिल रहा था तो उसके लिए भी संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है। लेकिन जब विवाद इस स्तर तक पहुंच जाए कि कर्मचारी संगठन कामबंद आंदोलन पर उतर आएं, नार्को टेस्ट की मांग होने लगे और पूरा प्रशासनिक वातावरण प्रभावित हो जाए, तब यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं रह जाता, बल्कि शासन व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न खड़े करता है। इन सबके बीच जनता कही नहीं सिर्फ अधिकारी और संगठन के कार्यकर्ता और चाटुकार सामने आ रहे है और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपने पक्ष को सही ठहराने में लगे हैं, जनता सिर्फ देख और समझ रही है
सुशासन तिहार के दौरान बढ़ते विवाद क्या संकेत देते हैं?
यह भी संयोग नहीं माना जा सकता कि सुशासन तिहार जैसे कार्यक्रमों के दौरान प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से कई विवाद सामने आए हैं। कहीं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच तीखी बहस हुई, कहीं सार्वजनिक मंचों पर विवाद चर्चा का विषय बने और कुछ स्थानों पर चाकूबाजी जैसी घटनाएं भी सामने आईं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या जमीनी स्तर पर संवाद और समन्वय की कमी बढ़ रही है?
सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा या शिकायतों का निराकरण नहीं है। सुशासन का वास्तविक अर्थ है कि जनता, जनप्रतिनिधि, संगठन और प्रशासन के बीच सम्मानजनक संवाद बना रहे। यदि यह संवाद कमजोर पड़ता है तो सुशासन की अवधारणा भी प्रभावित होती है।
सत्ता के साथ बढ़ता प्रभाव प्रदर्शन भी चिंता का विषय
इस पूरे घटनाक्रम ने एक और गंभीर विषय को उजागर किया है। आज कई स्थानों पर यह देखा जाता है कि राजनीतिक दलों, प्रकोष्ठों और विभिन्न संगठनों से जुड़े कुछ पदाधिकारी अपने पद और नेताओं से निकटता का प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं। वाहनों पर बड़े-बड़े बोर्ड, प्रभाव दिखाने वाले पदनाम, नियमों के विपरीत नंबर प्लेट, काली फिल्म और राजनीतिक पहचान का प्रदर्शन कई बार आम नागरिकों के बीच एक अलग संदेश देता है।
सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र का अर्थ प्रभाव दिखाना है या सेवा करना?
कई बार देखा गया है कि कुछ लोग अपने पद का नाम बड़े अक्षरों में और संगठन का नाम छोटे अक्षरों में लिखवाकर चलते हैं। कुछ लोग अपने राजनीतिक संपर्कों का उपयोग प्रभाव स्थापित करने के लिए करते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा परिचय जनता के बीच किया गया कार्य होता है, न कि वाहन पर लगा बोर्ड।
कानून सबके लिए समान होना चाहिए
प्रशासन को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि कोई वाहन नियमों का उल्लंघन कर रहा है, चाहे वह किसी अधिकारी का हो, किसी जनप्रतिनिधि का हो, किसी राजनीतिक संगठन के पदाधिकारी का हो या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का हो, तो उसके विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि अटल जी ने कहा था सरकार आते जाते रहती हैं, यह बात सत्य है कि सरकारी आती जाती रहती हैं जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं पर प्रशासन और प्रशासनिक अधिकारी जनता के असल सेवक है जो उनकी समस्याओं का हल करते हैं कानून एवं शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन करते हैं
कानून की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता है। यदि कार्रवाई केवल आम नागरिकों पर हो और प्रभावशाली लोगों को छूट मिलती दिखाई दे, तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है। प्रशासन का दायित्व है कि वह कानून के दायरे में रहकर बिना किसी पक्षपात के कार्य करे और गैर-कानूनी तथा अवैधानिक गतिविधियों पर समान रूप से कार्रवाई सुनिश्चित करे।
सम्मान केवल पद का नहीं, व्यक्ति का भी होना चाहिए
यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि चाहे कोई अधिकारी हो, कर्मचारी हो, राजनीतिक कार्यकर्ता हो, संगठन पदाधिकारी हो या जनप्रतिनिधि सभी सबसे पहले एक नागरिक हैं। सभी मतदान करते हैं, समाज में रहते हैं, परिवार रखते हैं और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा एवं मान-मर्यादा रखते हैं।
जिस प्रकार अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनता के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें, उसी प्रकार जनप्रतिनिधियों और संगठनात्मक पदों पर बैठे लोगों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों की गरिमा का सम्मान करें। किसी की वैचारिक या प्रशासनिक असहमति का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि उसकी व्यक्तिगत गरिमा को चोट पहुंचाई जाए।
लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन अपमान कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता।
सभी पक्षों को जरूरत है सिर्फ आत्ममंथन की
इस पूरे घटनाक्रम में केवल प्रशासन को ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों, संगठन पदाधिकारियों और सामाजिक संगठनों को भी आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। यदि कोई अधिकारी अपनी सीमा लांघता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कोई जनप्रतिनिधि या संगठन पदाधिकारी अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
लोकतंत्र में किसी भी पक्ष को विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन उन अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी दी हैं। फिर चाहे संवैधानिक पद पर बैठे मंत्री विधायक हो या उच्च पद पर बैठे अधिकारी या आम जनता
सरगुजा विवाद का अंतिम सत्य जांच और वैधानिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न अवश्य खड़ा किया है, क्या हम लोकतंत्र को संवाद, मर्यादा और संवैधानिक प्रक्रियाओं से मजबूत कर रहे हैं, या प्रभाव, दबाव और टकराव की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं?
आज आवश्यकता किसी पक्ष का अंध समर्थन करने की नहीं है। आवश्यकता निष्पक्षता, संयम और जवाबदेही की है। जनप्रतिनिधि हों, अधिकारी हों या संगठन पदाधिकारी सभी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद जनता का विश्वास है। उस विश्वास को बनाए रखने के लिए एक-दूसरे की मान-मर्यादा का सम्मान करना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है।
विशेष : यह लेख किसी व्यक्ति, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, राजनीतिक दल या संगठन पर दोषारोपण करने अथवा किसी जांच, निर्णय या कार्रवाई को प्रभावित करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक मर्यादा, संगठनात्मक अनुशासन, कानून के समान अनुपालन और जनहित से जुड़े विषयों पर आधारित एक विचारात्मक, विश्लेषणात्मक एवं समीक्षात्मक लेख है। किसी भी आरोप, दावे या घटना की सत्यता का अंतिम निर्धारण केवल सक्षम जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।
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