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सच की तह तक

“बिजली संयंत्रों में टेंडर का तिलिस्म – छोटे ठेकेदारों की रोजी छीनकर किसे मिल रहा फायदा?”

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कोरबा छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

टेंडर, एक्सटेंशन और बाहरी कंपनियों का खेल? बिजली संयंत्रों में स्थानीय रोजगार पर मंडराता संकट
छोटे ठेकेदारों का आरोप – छोटे कार्यों को जोड़कर बड़े टेंडर, बाहरी कंपनियों को फायदा और स्थानीय युवाओं की बेरोजगारी बढ़ने का खतरा
कोरबा। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के संयंत्रों में टेंडर प्रक्रिया और प्रशासनिक फैसलों को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। वर्षों से छोटे-छोटे कार्य कर संयंत्रों के संचालन में योगदान देने वाले स्थानीय एमएसएमई पंजीकृत ठेकेदारों ने प्रबंधन की नीतियों पर तीखा सवाल उठाया है। उनका आरोप है कि छोटे कार्यों को जोड़कर वृहद निविदा तैयार करने की प्रक्रिया से न केवल छोटे ठेकेदारों को बाहर किया जा रहा है बल्कि स्थानीय युवाओं के रोजगार पर भी सीधा असर पड़ रहा है।


दर्री प्रेस क्लब में आयोजित ठेकेदार एसोसिएशन की प्रेस वार्ता में ठेकेदारों ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी मड़वा संयंत्र, डीएसपीएम संयंत्र और हसदेव थर्मल विद्युत संयंत्र में लगभग डेढ़ सौ से अधिक स्थानीय ठेकेदार पिछले 30 से 50 वर्षों से छोटे-छोटे कार्य करते आ रहे हैं। इन ठेकेदारों के साथ करीब पांच से सात हजार स्थानीय मजदूर जुड़े हुए हैं जिनके परिवारों का भरण-पोषण इन्हीं कार्यों पर निर्भर है।
लेकिन अब प्रबंधन द्वारा कई छोटे कार्यों को जोड़कर उन्हें बड़े टेंडर के रूप में जारी करने की तैयारी की जा रही है। ठेकेदारों का कहना है कि यदि ऐसा हुआ तो छोटे और मध्यम स्तर के ठेकेदार उस निविदा प्रक्रिया में भाग ही नहीं ले पाएंगे और हजारों मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो जाएगा।
         स्थानीय युवाओं के रोजगार पर सीधा असर
ठेकेदारों ने कहा कि पहले ही आधुनिक संयंत्रों में आधे से अधिक कार्य मशीनों के माध्यम से होने लगे हैं, जिससे रोजगार के अवसर सीमित हो गए हैं। अब यदि बड़े टेंडर बाहरी कंपनियों को दिए जाते हैं और वे अपने साथ बाहर से श्रमिक तथा अपने सहायक ठेकेदार लेकर आती हैं तो स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाएं और भी कम हो जाएंगी।
ठेकेदारों का कहना है कि वर्तमान में छ.ग.रा.वि. उत्पा. क. मर्या. द्वारा बाहर के बड़ी-बड़ी कंपनियों को कार्य दिया जा रहा है जिससे मंडल को करोड़ों रूपये का नुकसान हो रहा क्योंकि बड़ी कंपनिया ज्यादा लाभप्रतिशत में कार्य करते है एवं स्थानीय एवं छोटे ठेकेदार कम लाभ प्रतिशत में कार्य करते आ रहे है। कभी-कभी तो यह स्थिति बनती है कि बाहर से आई कंपनियां अपने भुगतान प्राप्त कर काम अधूराछोड़ कर चली जाती है जिस समय पर हमारे द्वारा ही पूर्ण किया जाता है उन्होंने कहा कि हम यहां कार्य कर यहां प्रदूषण झेल रहे हैं और बाहर बैठी कंपनियां यहां लाभ कमा रही है यह उचित नहीं है ठेकेदारों का कहना है कि पहले छोटे कार्यों के माध्यम से स्थानीय ठेकेदारों और मजदूरों को रोजगार मिलता था, लेकिन अब बाहर की कंपनियों को बड़े पैमाने पर काम दिए जाने से स्थानीय लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो रहा है।


             आपात स्थिति में कौन करेगा काम?
प्रेस वार्ता में ठेकेदारों ने यह भी कहा कि विद्युत संयंत्रों में कई बार ऐसी आपात परिस्थितियां बनती हैं जब तत्काल कार्य शुरू करना आवश्यक होता है। पहले ऐसी स्थिति में स्थानीय ठेकेदारों को तुरंत काम दे दिया जाता था जिससे संयंत्र का संचालन प्रभावित नहीं होता था।
उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले राखड़ डैम में संकट की स्थिति बनने पर स्थानीय ठेकेदारों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर कार्य प्रारंभ किया था और संभावित बड़े खतरे को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ठेकेदारों ने सवाल उठाया कि यदि सभी कार्य बाहरी कंपनियों को सौंप दिए जाएंगे तो क्या वे कंपनियां ऐसी आपात स्थिति में तुरंत कार्य प्रारंभ कर पाएंगी?
मुख्यमंत्री और विभाग को लिखी चिट्ठी, नहीं मिला समाधान

मुख्यमंत्री एवं ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष को दिया गया पत्र

ठेकेदारों ने बताया कि उन्होंने अपनी समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री, ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष और उद्योग मंत्री को लिखित रूप से पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग की है।

स्थानीय प्रबंधन को दिया गया पत्र

लेकिन जब कहीं से कोई ठोस पहल या समाधान की उम्मीद नजर नहीं आई तो अंततः उन्हें मीडिया का सहारा लेना पड़ा और अपनी समस्याओं को सार्वजनिक करना पड़ा।

छत्तीसगढ़ शासन के उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन को दिया पत्र

                       आंदोलन की चेतावनी
ठेकेदारों ने साफ तौर पर कहा है कि यदि छोटे ठेकेदारों और स्थानीय मजदूरों के हितों की अनदेखी जारी रही और इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया तो आने वाले समय में स्थानीय बेरोजगार युवाओं, मजदूरों और ठेकेदारों द्वारा उग्र आंदोलन भी किया जा सकता है।

वर्षों से एक ही पद पर जमे अधिकारी भी सवालों के घेरे में
प्राप्त जानकारी के अनुसार कंपनी में कुछ अधिकारियों को वर्षों से एक ही पद पर बनाए रखा गया है और एक ही व्यक्ति को बार-बार निदेशक पद पर कार्यकाल विस्तार दिया जा रहा है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छत्तीसगढ़ में योग्य और अनुभवी अभियंताओं की कमी हो गई है जो इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी संभाल सकें? या फिर अपने चहेते लोगों को लंबे समय तक पद पर बनाए रखने के पीछे कोई और कारण है?
            क्या टेंडर प्रक्रिया के पीछे कोई बड़ा खेल?
छोटे कार्यों को जोड़कर बड़े टेंडर बनाना, बाहरी कंपनियों को काम मिलना, कुछ अधिकारियों का वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ रहना और निदेशक पद पर बार-बार कार्यकाल विस्तार  इन सभी बातों ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं यह सब कमीशन के खेल, चहेती कंपनियों को लाभ पहुंचाने या किसी प्रकार के राजनैतिक दबाव का परिणाम तो नहीं है।
                        उठ रहे हैं तीखे सवाल
क्या छोटे कार्यों को जोड़कर बड़े टेंडर बनाना स्थानीय ठेकेदारों को हटाने की रणनीति है?
क्या बाहरी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए यह पूरी प्रक्रिया अपनाई जा रही है?
क्यों कुछ अधिकारियों को वर्षों से एक ही पद पर बनाए रखा गया है?
क्या स्थानीय युवाओं की बेरोजगारी बढ़ने की चिंता किसी को है?
यदि हजारों मजदूर बेरोजगार हुए तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब नजर शासन और ऊर्जा विभाग के फैसले पर टिकी है। क्योंकि यह मामला केवल टेंडर प्रक्रिया का नहीं बल्कि हजारों स्थानीय परिवारों की रोजी-रोटी और क्षेत्र के रोजगार भविष्य से जुड़ा हुआ है।
जब प्रदेश में बेरोजगारी कम करने की बातें की जाती हैं, तब यदि स्थानीय काम ही बाहरी कंपनियों को सौंप दिए जाएंगे और वे अपने साथ मजदूर भी बाहर से लेकर आएंगी, तो आखिर स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार बचेगा कहां?

प्रदीप मिश्रा (संपादक)

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