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ड्यूटी से ‘तलाक’, सरकारी जमीन से ‘निकाह’: प्रधान आरक्षक पर गंभीर आरोप, प्रशासन ने तुरंत रोक लगाई

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अम्बिकापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़

संवाददाता: सौरभ साहू

सरगुजा संभाग में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस और प्रशासन दोनों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है। प्रधान आरक्षक रविन्द्र भारती पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी वर्दी को कानून लागू करने का माध्यम मानने के बजाय सरकारी भूमि पर ‘साम्राज्य’ बनाने का लाइसेंस समझ लिया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रधान आरक्षक का तबादला एमसीबी जिले में हुआ था, लेकिन वे कथित तौर पर सूरजपुर पुलिस लाइन में अटैच रहे। आरोप है कि पिछले लगभग एक महीने से वे नियमित ड्यूटी से भी गायब हैं। विभागीय स्तर पर वेतन रोकने की चर्चा है, लेकिन इसी बीच सरकारी जमीन पर उनके द्वारा कथित कब्जे की शिकायत ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया।
अजीरमा में ‘भारती साम्राज्य’ का आरोप
शिकायतकर्ता जितेन्द्र कुमार जायसवाल के अनुसार, पटवारी हल्का नंबर-56 के ग्राम अजीरमा में स्थित खसरा नंबर 74/1, जो शासकीय भूमि है और जिसका रकबा लगभग 2.480 हेक्टेयर है, उसके करीब 0.700 हेक्टेयर हिस्से पर प्रधान आरक्षक द्वारा शेड निर्माण, बाउंड्री (प्रिकार) निर्माण और मक्का फसल बोने जैसी गतिविधियां की जा रही थीं।
शिकायत में यह भी कहा गया कि संबंधित कर्मचारी गांव के मूल निवासी नहीं हैं, फिर भी सरकारी भूमि का निजी उपयोग किया जा रहा था।
प्रशासन की तत्काल कार्रवाई
अतिरिक्त तहसीलदार न्यायालय, अम्बिकापुर-02 ने 6 मार्च 2026 को आदेश जारी करते हुए निर्माण कार्य तत्काल बंद करने के निर्देश दिए। साथ ही, रविन्द्र भारती को 9 मार्च 2026 को न्यायालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष और दस्तावेज पेश करने का नोटिस दिया गया। अनुपस्थिति में एकपक्षीय कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।
पुलिस और राजस्व अमले को निर्देश
जारी आदेश में प्रशासन ने विभिन्न अधिकारियों को भी निर्देश दिए:
थाना प्रभारी गांधीनगर को आदेश का पालन सुनिश्चित करना।
राजस्व निरीक्षक और हल्का पटवारी को निर्माण रोकने और पालन प्रतिवेदन देने की जिम्मेदारी।संबंधित व्यक्ति को नोटिस की तामील कराना।
कानून बनाम वर्दी
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों पर कार्रवाई होती है। लेकिन जब आरोप किसी वर्दीधारी कर्मचारी पर लगे, तो मामला और गंभीर हो जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सरकारी कर्मचारी ही सरकारी जमीन पर कब्जा करने लगें, तो आम नागरिकों को कानून का पालन कराना कितना उचित होगा?
अब बड़ा सवाल
क्या प्रशासन इस मामले में सख्त कार्रवाई करेगा, क्या अवैध निर्माण हटाया जाएगा और विभागीय स्तर पर अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएंगे, या यह मामला केवल कागजों में ही निपट जाएगा?
सरगुजा में यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था और कानून की विश्वसनीयता का भी परीक्षण बन गया है।

प्रदीप मिश्रा
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