13 माह की मासूम की मौत ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें, सवालों के घेरे में मेडिकल कॉलेज
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
सर्दी-बुखार से भर्ती हुई बच्ची, इंजेक्शन के बाद बिगड़ी हालत, चार दिन बाद मौत, जवाबदेही तय करने की मांग तेज
कोरबा – ACGN:- जिले के स्वर्गीय बिसाहू दास महंत स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, कोरबा में 13 माह की मासूम वानिया केवट की मौत ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक साधारण सर्दी-बुखार से शुरू हुआ इलाज आखिर कैसे मौत में बदल गया, यह सवाल अब हर किसी की जुबान पर है।
20 फरवरी को परिजन मासूम को हल्के सर्दी-बुखार की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे। प्राथमिक जांच के बाद भाप और मालिश की सलाह दी गई, लेकिन बार-बार आने-जाने की परेशानी के कारण बच्ची को भर्ती करा दिया गया। भर्ती के दौरान ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ ने केनुला लगाकर इंजेक्शन लगाया। परिजनों का आरोप है कि इंजेक्शन लगाते समय बच्ची असामान्य रूप से रो रही थी और मां के अनुरोध के बावजूद उसे शांत किए बिना इंजेक्शन दे दिया गया। उसके बाद आखिर ऐसा क्या हुआ यह इंजेक्शन लगते ही बच्ची की सांसें अटकने लगीं, शरीर शिथिल पड़ गया और वह अचेत हो गई।

यह अब जांच का विषय है, लेकिन परिजनों का कहना है कि इंजेक्शन लगाने वाली युवती अनुभवहीन प्रतीत हो रही थी। उनका आरोप है कि अस्पताल में बड़ी संख्या में प्रशिक्षु डॉक्टरों और सीमित अनुभव वाले स्टाफ के भरोसे इलाज किया जा रहा है। यदि गंभीर मरीजों का उपचार अनुभवहीन हाथों में होगा तो जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है।

बच्ची की हालत कब और कैसे बिगड़ी यह भी परिवार ने स्पष्ट किया है। 20 फरवरी को इंजेक्शन के तुरंत बाद बच्ची को गहन चिकित्सा कक्ष में ले जाया गया। चार दिनों तक वह अचेत अवस्था (कोमा) में रही। चिकित्सकीय प्रयास जारी रहे, लेकिन 24 फरवरी की रात लगभग साढ़े नौ बजे डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया।
क्यों यह स्थिति बनी इसका आधिकारिक उत्तर अभी तक सामने नहीं आया है। हालांकि अस्पताल प्रबंधन का कहना है की बच्ची को निमोनिया की शिकायत थी जिसमें बुखार पूरे शरीर में तेजी से फैलता है इसके इलाज के लिए बच्ची को आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया था बच्ची के मृत्यु उपरांत परिजनों के हंगामा के पश्चात अस्पताल प्रबंधन ने परिजनो की सहमति पर बच्ची के शव का पोस्टमार्टम कराने बात कही और इस पर प्रबंधन ने तीन डॉक्टरों की टीम बनाई और शव का पोस्टमार्टम किया,
मेडिकल कॉलेज के सुपरिंटेंडेंट डॉ गोपाल कंवर ने बताया कि निमोनिया से पीड़ित 13 माह की बच्ची का इलाज अस्पताल में चल रहा था जहां इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई डॉक्टरों ने बच्ची को बचाने का पूरा प्रयास किया है इसमें किसी तरह की लापरवाही नहीं बरती गई है पीएम रिपोर्ट आने के बाद आगे की जांच की जाएगी

परिजनों का कहना है कि बच्ची को दी गई यदि दवा सही थी तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए और यदि कोई अनियमितता है तो जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई हो। परिजनों का आरोप है कि यदि समय रहते सतर्कता और गंभीरता दिखाई जाती तो शायद बच्ची की जान बच सकती थी।
घटना के बाद अस्पताल परिसर में भारी आक्रोश देखने को मिला। परिजनों ने अस्पताल अधीक्षक को घेर लिया और मुख्य द्वार के सामने धरने पर बैठ गए। उनका कहना है कि जब तक जिम्मेदार डॉक्टरों और स्टाफ पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, वे मासूम का शव परीक्षण नहीं कराएंगे।
अब इस पूरे मामले में एक और गंभीर सवाल खड़ा होता गया है। यदि मान भी लिया जाए कि बच्ची दवाइयां चिकित्सकीय प्रक्रिया के अनुसार ही दी गई थीं, तो क्या उनकी गुणवत्ता की जांच हुई थी। क्या इंजेक्शन की मात्रा गलत थी, क्या दवा उपयुक्त नहीं थी, क्या एलर्जी की जांच नहीं की गई, या फिर आपातकालीन प्रतिक्रिया में देरी हुई, कहीं ऐसा तो नहीं कि दवाइयां नकली थीं या उनकी अवधि समाप्त हो चुकी थी। क्या दवा की बैच संख्या, निर्माण तिथि और उपयोग की अंतिम तिथि की पुष्टि की गई थी। क्या दवा उचित तापमान पर सुरक्षित रखी गई थी। इन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है, क्योंकि कई बार दवा की गुणवत्ता में गड़बड़ी भी मरीज की हालत बिगाड़ सकती है। क्या पोस्टमार्टम के समय वीडियो ग्राफी की गई इन सभी प्रश्नों का उत्तर जांच में सामने आएगा।

यह घटना केवल एक परिवार का व्यक्तिगत दुख नहीं है, बल्कि जिला स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। मेडिकल कॉलेज बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब बेहतर उपचार मिलेगा, विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होंगे और गंभीर मामलों में तत्काल प्रभावी इलाज होगा। यदि इसके बावजूद ऐसी घटनाएं सामने आती हैं तो यह शासन, प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन तीनों के लिए चिंतन का विषय है।

स्वास्थ्य सेवा केवल इमारत और उपकरणों से नहीं चलती, बल्कि प्रशिक्षित मानव संसाधन, अनुशासन, सतर्कता और जवाबदेही से चलती है। यदि अस्पताल में निगरानी व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, दवाओं और उपचार की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई नहीं होगी, तो आम जनता का भरोसा डगमगाना तय है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी, क्या जिम्मेदारी तय होगी और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। मासूम की मौत ने पूरे जिले को झकझोर दिया है और लोग उत्तर की प्रतीक्षा में हैं।
प्रदीप मिश्रा
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