नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , जटगा से पसान तक सड़क नहीं, शासन-प्रशासन की चुप्पी और विभाग की लापरवाही का खतरनाक रास्ता – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

जटगा से पसान तक सड़क नहीं, शासन-प्रशासन की चुप्पी और विभाग की लापरवाही का खतरनाक रास्ता

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

कोरबा छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

जटगा से पसान तक टूटा मार्ग नहीं, उजागर होती शासन-प्रशासन की लापरवाही की पूरी कहानी, कर्ज में डूबी जनता और अफसरों की खामोशी पर उठते तीखे सवाल

कोरबा। कोरबा जिले में सड़कों की बदहाली अब किसी तकनीकी खामी या बजट संकट की कहानी नहीं रह गई है। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक संवेदनहीनता, लापरवाही और जवाबदेही से बचने की आदत का परिणाम बन चुकी है। कटघोरा–पेंड्रा मार्ग हो या श्यांग से कोरबा और आसपास के ग्रामीण रास्ते जिले की कई सड़कें इस हद तक जर्जर हो चुकी हैं कि यहां सफर करना जरूरत नहीं, मजबूरी में उठाया गया जानलेवा जोखिम बन गया है। अब सवाल यह नहीं है कि सड़कें खराब क्यों हैं, असली सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए भी जिम्मेदार अधिकारी चुप क्यों हैं।

कटघोरा–पेंड्रा मार्ग, जो जटगा से लैंगा और पसान घाट जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाके से होकर गुजरता है, आज दुर्घटनाओं का स्थायी केंद्र बन चुका है। खासकर रात के समय रोज हादसे हो रहे हैं, लेकिन न तो PWD के अधिकारी मौके पर नजर आते हैं और न ही परिवहन या पुलिस विभाग की कोई सख्त निगरानी दिखाई देती है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि दीपका कोयला खदान से जैतहरी माउजर बीयर पावर प्लांट की ओर जाने वाले ओवरलोड कोयला ट्रक दिन-रात तेज रफ्तार में इस सड़क को रौंद रहे हैं। तय क्षमता से कई गुना ज्यादा वजन लेकर चलने वाले ये वाहन न केवल सड़क को तोड़ रहे हैं, बल्कि हर गुजरने वाले की जान खतरे में डाल रहे हैं।
ग्रामीणों का दर्द सिर्फ हादसों तक सीमित नहीं है। उनका कहना है

“हम खेत-किसानी और रोज़गार के लिए बड़ी मेहनत से कर्ज लेकर नई गाड़ियां, बाइक या छोटी मालवाहक वाहन खरीदते हैं। लेकिन इस मार्ग पर चलने के बाद एक महीने में ही हमारी गाड़ियां कंडम हो जाती हैं। शॉकर, टायर, सस्पेंशन सब जवाब दे देता है। बैंक का कर्ज अलग, मरम्मत का खर्च अलग लेकिन शासन-प्रशासन को हमारी परेशानी दिखाई ही नहीं देती।”

एक अन्य ग्रामीण ने गुस्से में कहा “अगर सड़क ऐसी ही रहनी थी तो हमें कर्ज लेने की जरूरत ही क्या थी? गाड़ी खरीदी नहीं कि टूटने लगती है। नुकसान हमारा होता है, लेकिन जिम्मेदारी किसी की नहीं।”

ग्रामीण बताते हैं कि रोज इसी रास्ते से बाजार, अस्पताल और स्कूल जाना पड़ता है। गड्ढों से बचते-बचाते कब हादसा हो जाए, पता नहीं चलता। रात के समय हालात और भी डरावने हो जाते हैं। एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा “एम्बुलेंस आती है तो मरीज आधे रास्ते में ही ज्यादा तकलीफ में आ जाता है। सड़क नहीं, यह तो सजा बन चुकी है।”

बता दें कुछ महीने पहले इसी मार्ग पर PWD द्वारा लाखों रुपये खर्च कर टचिंग-पैचिंग कराई गई। सरकारी कागजों में सड़क दुरुस्त दिखाई गई और भुगतान भी हो गया, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि सड़क कुछ ही समय में फिर उखड़ गई। घटिया सामग्री, कमजोर बेस और लगभग शून्य निगरानी ने मरम्मत को केवल औपचारिकता बना दिया। आज गहरे गड्ढे, उभरी गिट्टियां और टूटी सतह से गुजरना दोपहिया सवारों, छोटे वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए भी जानलेवा चुनौती बन चुका है। ग्रामीण साफ पूछ रहे हैं कि जब लाखों रुपये खर्च हुए, तो सड़क टिक क्यों नहीं पाई और इस लापरवाही की जिम्मेदारी आखिर किस पर तय होगी।

यह बदहाली केवल कटघोरा–पेंड्रा मार्ग तक सीमित नहीं है। श्यांग से कोरबा तक के ग्रामीण रास्ते और आसपास के कई गांवों की सड़कें भी इसी दुर्दशा का शिकार हैं। बारिश में जलभराव, किनारों का धंसना और बार-बार टूटती सड़कें साफ बता रही हैं कि निर्माण और मरम्मत दोनों में गुणवत्ता से गंभीर समझौता किया गया है। महिलाएं रोजमर्रा की जरूरतों के लिए, बच्चे स्कूल जाने के लिए और बुजुर्ग इलाज के लिए हर दिन जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं।

PWD और प्रशासन की ओर से हर बार वही रटा-रटाया जवाब सामने आता है मरम्मत के प्रस्ताव भेज दिए गए हैं, बजट प्रक्रिया में है। कहीं-कहीं अस्थायी पैचवर्क कर दिया जाता है, जो पहली बारिश और पहले ओवरलोड ट्रक के साथ ही जवाब दे देता है। अब यह सवाल टालना मुश्किल हो गया है कि क्या प्रशासन जानबूझकर स्थायी समाधान से बच रहा है या फिर लापरवाही को ही अपनी कार्यप्रणाली बना चुका है।

जब दूसरे राज्यों में तकनीकी रोड ऑडिट, मजबूत सब-बेस, सही ड्रेनेज और नियमित निगरानी से सड़कें सालों तक टिक सकती हैं, तो कोरबा में ऐसा क्यों नहीं हो रहा। न ओवरलोड वाहनों पर सख्ती है, न घाट जैसे संवेदनशील इलाकों में चेतावनी संकेत, स्पीड कंट्रोल या सुरक्षा व्यवस्था दिखाई देती है। मरम्मत का मतलब केवल फाइलों में काम पूरा दिखाना रह गया है, जबकि सच्चाई हर दिन किसी न किसी दुर्घटना और ग्रामीणों के बढ़ते नुकसान के रूप में सामने आ रही है।

अब सवाल बिल्कुल साफ है। अगर किसी बड़े हादसे की जिम्मेदारी तय करनी होगी, तो यह पूछा जाएगा कि जब हालात सबके सामने थे, तब जिम्मेदार अफसर चुप क्यों थे। कोरबा की जनता अब आश्वासन नहीं, सीधे जवाब चाहती है

कब होगी स्थायी मरम्मत ? कब ओवरलोड वाहनों पर सख्त कार्रवाई होगी? और कब जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?

इतिहास यह नहीं पूछेगा कि सड़क क्यों टूटी थी। इतिहास यह जरूर पूछेगा कि जब सिस्टम टूट रहा था, तब उसे संभालने वाले कहां थे।

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now