हरेली तिहार : छत्तीसगढ़ की माटी, हरियाली और लोकजीवन का पहला उत्सव
|
😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊
|
हरियाली पर्व विशेष
संपादकीय
By ACGN- 7647981711, 9303948009
12 अगस्त को छत्तीसगढ़ में मनाया जा रहा है हरेली पर्व
छत्तीसगढ़ की पहचान केवल यहां के घने जंगलों, नदियों, पहाड़ों और धान के कटोरे से नहीं है, बल्कि इसकी असली आत्मा उन लोकपरंपराओं में बसती है, जिन्हें यहां की पीढ़ियों ने अपने श्रम, प्रकृति और विश्वास के साथ संजोकर रखा है। इन्हीं लोकपर्वों की श्रृंखला की पहली कड़ी है हरेली तिहार। 12 अगस्त को पूरा छत्तीसगढ़ हरेली के रंग में रंगा हुआ है। सावन की अमावस्या और चारों ओर फैली हरियाली के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व खेती-किसानी, पशुधन, प्रकृति, लोकविश्वास, खेल और सामाजिक एकता का अनूठा संगम है। छत्तीसगढ़ सरकार ने हरेली के अवसर पर आज सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया है, जिससे इस लोकपर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व और अधिक स्पष्ट होता है।
हरेली को छत्तीसगढ़ का पहला तिहार कहा जाता है। इसके बाद प्रदेश के लोकजीवन में आने वाले अनेक पर्वों की सांस्कृतिक यात्रा आगे बढ़ती है। हरेली का हरापन केवल खेतों और पेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ी जीवन, संस्कार, लोकगीत, खेल और सामुदायिक भावना में भी दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग से जुड़े प्रकाशित विशेष आलेखों में भी हरेली को प्रदेश के प्रथम पारंपरिक लोकपर्व के रूप में रेखांकित किया गया है।
हरियाली अमावस्या से जुड़ा हरेली का रिश्ता
हरेली सावन माह की अमावस्या के अवसर पर मनाया जाता है। देश के कई हिस्सों में इसी तिथि को हरियाली अमावस्या के रूप में जाना जाता है, जबकि छत्तीसगढ़ ने इसे अपनी विशिष्ट कृषि और लोकसंस्कृति से जोड़कर हरेली तिहार का स्वरूप दिया है। यह वह समय होता है जब मानसून के कारण धरती पर हरियाली छाने लगती है, खेतों में धान की फसल आकार लेने लगती है और गांवों का पूरा परिवेश जीवन से भर उठता है। इसलिए हरेली का अर्थ केवल हरियाली देखना नहीं, बल्कि हरियाली के पीछे मौजूद प्रकृति, वर्षा, मिट्टी, किसान और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।
यही वजह है कि हरेली को केवल धार्मिक पर्व कहना इसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा। यह मूल रूप से प्रकृति और कृषि आधारित लोकजीवन का उत्सव है।
जब किसान अपने औजारों को देवता मानकर पूजा करता है
हरेली के दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की साफ-सफाई करता है और उनकी पूजा करता है। हल, फावड़ा, कुदाल, हंसिया सहित खेती में उपयोग होने वाले दूसरे पारंपरिक औजारों को इस दिन विशेष सम्मान दिया जाता है। इस परंपरा के पीछे बहुत गहरा भाव छिपा है।
किसान जानता है कि उसकी आजीविका केवल उसकी मेहनत पर नहीं, बल्कि उसके औजारों, मिट्टी, पानी और प्रकृति के सहयोग पर भी निर्भर है। इसलिए जिस हल से खेत की मिट्टी पलटी जाती है, जिस फावड़े से खेत तैयार होता है और जिन साधनों से अन्न पैदा होता है, उन्हें हरेली के दिन सम्मान दिया जाता है। आज भले ही खेती में ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों का उपयोग बढ़ गया हो, लेकिन इस परंपरा का मूल संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, श्रम का सम्मान करो और श्रम के साधनों का भी सम्मान करो।
पशुधन के बिना किसान की कहानी अधूरी है
हरेली में गाय और बैलों का विशेष महत्व है। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कृषि व्यवस्था में बैल किसान के सबसे बड़े सहयोगियों में रहे हैं। खेत की जुताई से लेकर कृषि कार्यों के अनेक हिस्सों में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हरेली के अवसर पर पशुओं को नहलाया-धुलाया जाता है, उनकी सेवा की जाती है और उन्हें विशेष आहार दिया जाता है। कई क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से औषधीय वनस्पतियों से जुड़े स्थानीय ज्ञान के आधार पर पशुओं को कुछ मिश्रण खिलाने की परंपरा भी रही है। इस लोकज्ञान को आधुनिक पशु चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि ग्रामीण समाज ने पशुधन के स्वास्थ्य को हमेशा अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
हरेली हमें यह भी सिखाती है कि जिस पशु ने किसान के जीवन और खेती में साथ दिया है, उसके प्रति केवल उपयोग की भावना नहीं, बल्कि कृतज्ञता और संवेदना भी होनी चाहिए।
गेड़ी – हरेली की सबसे जीवंत पहचान
हरेली का नाम आते ही छत्तीसगढ़ के गांवों की एक तस्वीर आंखों के सामने उभरती है, बांस की गेड़ी पर चढ़े बच्चे और युवा। गेड़ी चढ़ना हरेली की सबसे लोकप्रिय परंपराओं में से एक है।
बांस के मजबूत डंडों और पांव रखने के लिए बनाए गए आधार से तैयार गेड़ी पर चढ़कर बच्चे गांव की गलियों में चलते, दौड़ते और तरह-तरह के खेल करते हैं। बारिश के मौसम में गांवों की गलियां कीचड़ और पानी से भर जाती थीं। ऐसे वातावरण में ऊंचाई पर चलने की उपयोगिता से जुड़ी लोकपरंपरा धीरे-धीरे मनोरंजक खेल का रूप लेती गई। आज गेड़ी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
गेड़ी केवल खेल नहीं है। इसमें शरीर का संतुलन, पैरों की शक्ति, ध्यान, साहस और शरीर के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है।
आज जब बच्चों का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल की दुनिया में व्यस्त है, तब गेड़ी हमें यह याद दिलाती है कि हमारी पारंपरिक खेल संस्कृति में शरीर और मन दोनों को सक्रिय रखने की क्षमता थी।
नारियल फेंक प्रतियोगिता में दिखता है उत्साह
हरेली का उत्सव केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहता। गांवों और कई स्थानों पर नारियल फेंक प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती है। पूजा के बाद युवा और ग्रामीण उत्साह के साथ इस पारंपरिक खेल में हिस्सा लेते हैं। कई जगह गेड़ी दौड़ सहित अन्य पारंपरिक खेल भी आयोजित किए जाते हैं।
नारियल फेंकने की प्रतियोगिता में खेल भावना, शारीरिक शक्ति, निशाना साधने की क्षमता और सामुदायिक उत्साह देखने को मिलता है। गांव का चौक, मैदान या कोई खुला स्थान देखते ही देखते उत्सव स्थल बन जाता है।
यही हरेली की खूबसूरती है, यहां पूजा के साथ खेल है, आस्था के साथ आनंद है और परंपरा के साथ सामुदायिक सहभागिता है।
नीम की पत्तियां और लोकविश्वास
हरेली के अवसर पर कई ग्रामीण क्षेत्रों में घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियां या टहनियां लगाने की परंपरा रही है। लोकमान्यता में इसे नकारात्मक शक्तियों और बीमारियों से बचाव से जोड़ा जाता है।
इसके पीछे आधुनिक दृष्टि से देखें तो नीम भारतीय लोकजीवन में लंबे समय से औषधीय और कीट-नियंत्रण संबंधी उपयोगों के लिए जाना जाता रहा है। हालांकि किसी भी बीमारी के उपचार के लिए केवल लोकपरंपरा पर निर्भर रहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है, फिर भी ऐसी परंपराएं यह बताती हैं कि ग्रामीण समाज ने अपने आसपास उपलब्ध वनस्पतियों के गुणों का अनुभव के आधार पर उपयोग किया था। यानी हरेली में आस्था और लोकज्ञान एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते।
हरेली में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की खुशबू
किसी भी छत्तीसगढ़ी तिहार की कल्पना स्वाद के बिना अधूरी है। हरेली के अवसर पर घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। गुड़हा चीला, अईरसा, चौसेला, बोबरा, गुलगुला भजिया, सोहारी, बड़ा, ठेठरी और खुरमी जैसे व्यंजन कई परिवारों में बनाए जाते हैं।
इन पकवानों में केवल स्वाद नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की घरेलू खाद्य परंपरा की झलक भी मिलती है। परिवार के लोग मिलकर पकवान बनाते हैं और पर्व का आनंद साझा करते हैं। यही सामूहिकता किसी लोकपर्व को केवल धार्मिक आयोजन से उठाकर सामाजिक उत्सव बनाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से हरेली
हरेली का आध्यात्मिक संदेश बहुत सरल लेकिन गहरा है, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहो।
भारतीय परंपरा में धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश को जीवन के मूल तत्व माना गया है। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और पशुओं के प्रति सम्मान की परंपरा इसी सोच से जुड़ी रही है।
श्रावण मास स्वयं शिव आराधना से जुड़ा हुआ है। ऐसे समय में जब वर्षा धरती को नया जीवन देती है, हरेली मनुष्य को अपने जीवन के मूल स्रोतों की ओर वापस देखने का अवसर देती है।
हरेली के दिन हल की पूजा करना दरअसल उस अन्न के स्रोत को प्रणाम करना है, जो हमारे जीवन का आधार है। पशु की सेवा करना उस साथी के प्रति कृतज्ञता है, जिसने किसान के साथ खेत में श्रम किया।
पेड़-पौधों और हरियाली का सम्मान करना उस प्रकृति के प्रति आभार है, जिसके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं।
पौराणिकता से अधिक लोकआस्था का पर्व
हरेली से जुड़ी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग लोकमान्यताएं मिलती हैं। इसलिए इसकी कोई एक सर्वमान्य पौराणिक कथा बताकर पूरे पर्व की व्याख्या करना उचित नहीं होगा।
इस पर्व का वास्तविक स्वरूप छत्तीसगढ़ की लोकआस्था, कृषि परंपरा और प्रकृति के साथ सदियों से बने रिश्ते में दिखाई देता है।
यह वही लोकसंस्कृति है जिसमें खेत केवल उत्पादन का स्थान नहीं, बल्कि जीवन का आधार है; पशु केवल संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा है और औजार केवल उपकरण नहीं, बल्कि श्रम के साथी हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है हरेली
हरेली उस मौसम में आती है जब वर्षा के कारण वातावरण में नमी बढ़ती है और खेतों में कृषि गतिविधियां तेज होती हैं। इस समय कृषि उपकरणों की देखभाल, पशुओं की स्वच्छता, घर-आंगन की सफाई और जलस्रोतों की देखरेख व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
हमारे पूर्वजों ने इन कार्यों को अलग-अलग वैज्ञानिक शब्दों में नहीं बांटा था। उन्होंने इन्हें परंपरा और त्योहार का हिस्सा बना दिया। यही लोकसंस्कृति की खूबसूरती है। जहां आधुनिक विज्ञान किसी प्रक्रिया का कारण समझाता है, वहीं लोकपरंपरा उसे पीढ़ियों तक व्यवहार में बनाए रखने का काम करती है।
हालांकि हर पारंपरिक मान्यता को वैज्ञानिक सत्य मान लेना उचित नहीं है, लेकिन हरेली की कई सामाजिक और पर्यावरणीय परंपराएं आज भी आधुनिक जीवन के लिए उपयोगी संदेश देती हैं।
हरेली और पर्यावरण संरक्षण
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, घटते वनक्षेत्र और जल संकट की चिंता कर रही है। ऐसे समय में हरेली का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि हरियाली हमारे जीवन का आधार है तो केवल एक दिन हरियाली का उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है।
हरेली का आधुनिक संकल्प होना चाहिए कि हम पेड़ लगाएं और उन्हें बचाएं, वर्षाजल को रोकें, तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखें, खेत की मिट्टी को बचाएं और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलें। हरेली केवल हरियाली देखने का पर्व नहीं, हरियाली बचाने की जिम्मेदारी याद दिलाने वाला पर्व भी है।
सरकार ने अवकाश देकर लोकसंस्कृति को दिया सम्मान
हरेली को छत्तीसगढ़ की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान में विशेष स्थान प्राप्त है। राज्य सरकार ने इस पर्व पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। आज 12 अगस्त को प्रदेश में शासकीय कार्यालयों सहित विभिन्न संस्थानों में अवकाश है। इससे यह स्पष्ट होता है कि हरेली केवल गांवों तक सीमित लोकपर्व नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।
सरकारी स्तर पर पारंपरिक खेलों और लोकसंस्कृति को प्रोत्साहन देने से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर भी मिलता है। हरेली के अवसर पर गेड़ी दौड़ और अन्य पारंपरिक खेलों का आयोजन इसी दिशा में महत्वपूर्ण है।
मोबाइल के दौर में गेड़ी की आवाज क्यों जरूरी है?
आज गांव भी तेजी से बदल रहे हैं। बच्चों के हाथ में बांस की गेड़ी की जगह मोबाइल फोन आ गया है। मैदान की जगह स्क्रीन ने ले ली है और सामूहिक खेलों की जगह व्यक्तिगत मनोरंजन ने ले ली है।
ऐसे समय में हरेली की गेड़ी हमें एक महत्वपूर्ण सवाल पूछती है, क्या विकास के साथ हम अपनी खेल परंपराओं को भी बचा पाएंगे?
हमें आधुनिकता से पीछे नहीं हटना है, लेकिन अपनी जड़ों को भी नहीं छोड़ना है। बच्चा मोबाइल भी चलाए, लेकिन गेड़ी पर भी चढ़े।
वह आधुनिक खेल भी खेले, लेकिन अपने गांव के पारंपरिक खेलों को भी जाने।
वह डिजिटल दुनिया से जुड़े, लेकिन मिट्टी से उसका रिश्ता भी बना रहे।
यही संतुलन हमारी संस्कृति को जीवित रख सकता है।
हरेली की असली कहानी
हरेली की असली कहानी किसी एक ग्रंथ में नहीं मिलती। यह कहानी उस किसान के हाथों में है, जो बारिश के बीच खेत में उतरता है। उस बैल की आंखों में है, जो किसान के साथ खेत तक जाता है। उस मां के हाथों में है, जो घर में गुड़हा चीला और दूसरे पारंपरिक पकवान बनाती है। उस बच्चे की हंसी में है, जो गेड़ी पर चढ़कर गांव की गलियों में दौड़ता है। उस युवा की ताकत में है, जो नारियल फेंक प्रतियोगिता में अपना कौशल दिखाता है। और यह कहानी उस बुजुर्ग की स्मृतियों में है, जो नई पीढ़ी को बताता है कि हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान है।
क्या सिखाती है हमे हरेली?
हरेली हमें सिखाती है कि अन्न पैदा करने वाले किसान का सम्मान होना चाहिए। यह सिखाती है कि पशु हमारे जीवन के साथी हैं। प्रकृति से जितना लें, उतना ही उसे लौटाने की कोशिश करें। हमारे पारंपरिक खेल हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना जरूरी है। और सबसे बढ़कर यह सिखाती है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है। वह प्रकृति का ही एक हिस्सा है।
हरेली केवल एक दिन नहीं, जीवन का संदेश है
हरेली का पर्व समाप्त हो जाएगा, गेड़ी उतारकर रख दी जाएगी, नारियल फेंक प्रतियोगिता खत्म हो जाएगी, पूजा के बाद कृषि उपकरण फिर खेतों में चले जाएंगे और पकवानों की खुशबू भी धीरे-धीरे घरों से चली जाएगी। लेकिन हरेली का संदेश समाप्त नहीं होना चाहिए। पेड़ बचाने का संकल्प पूरे साल रहना चाहिए। किसान के सम्मान की भावना पूरे साल रहनी चाहिए। पशुओं के प्रति संवेदना पूरे साल रहनी चाहिए। पानी बचाने की चिंता पूरे साल रहनी चाहिए। और अपनी लोकसंस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी पूरे साल रहनी चाहिए। यही हरेली की आत्मा है।
छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जब पहली बारिश की बूंद गिरती है, तो धरती केवल भीगती नहीं, बल्कि जीवंत हो उठती है। खेतों में हरियाली आती है, किसान के चेहरे पर उम्मीद लौटती है और गांव की गलियों में लोकजीवन फिर से मुस्कुराने लगता है।
इसी उम्मीद, इसी हरियाली और इसी लोकजीवन का उत्सव है हरेली तिहार।
यह पर्व हमें बताता है कि हमारी समृद्धि केवल शहरों की ऊंची इमारतों में नहीं, बल्कि खेत की मेड़, किसान के पसीने, पशुधन की सेवा, पेड़ की छांव और गांव के सामूहिक जीवन में भी छिपी है।
हरेली छत्तीसगढ़ की माटी का उत्सव है। हरेली किसान के श्रम का सम्मान है, पशुधन के प्रति कृतज्ञता है, प्रकृति के प्रति आस्था है, हमारी लोकसंस्कृति की पहचान है, और हरेली आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों को बचाए रखने का संदेश है।
आइए, इस हरेली पर केवल पर्व न मनाएं, बल्कि इसके मूल संदेश को अपने जीवन में उतारें, धरती को बचाएं, पानी को बचाएं, पेड़ों को बचाएं, पशुधन का सम्मान करें, किसान का सम्मान करें और छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
हरेली तिहार की यही सच्ची हरियाली है और यही छत्तीसगढ़ की असली खुशहाली है।
प्रदीप मिश्रा
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ हम लाते हैं निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबरें।
अपने क्षेत्र लोक परंपरा एवं पर्व से जुड़े समाचार, क्षेत्र की घटना दुर्घटना और भ्रष्टाचार जनहित से जुड़ी समस्याएं शासन, प्रशासन तक मीडिया के माध्यम से पहुचाने हमें संपर्क करे
7647981711, 9303948009
|
Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें |
Advertising Space
आणखी कथा


