जब दीये बुझ गए, तब सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ… आखिर यह रोशनी किसके लिए थी?
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की ‘कलम की धार’ हर सप्ताह सत्ता, व्यवस्था और समाज से जुड़े उन सवालों को सामने लाने का प्रयास करती है, जिन पर चर्चा जरूरी है। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, दल या संस्था पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि उन विषयों पर जनता और जिम्मेदार व्यवस्था का ध्यान आकर्षित करना है, जिनका सीधा संबंध जनहित, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से है।
✍️ प्रदीप मिश्रा
आज का विषय – सेवा, संकल्प और जनभागीदारी के नाम पर देशभर में जले करोड़ों दीये, लेकिन असली सवाल यह है कि इन दीयों की रोशनी बुझने के बाद जनता के जीवन में कितना उजाला बचा?
सेवा संकल्प अभियान’ ‘आशीर्वाद का दीया’
17 सितंबर 2026 को देश के अलग-अलग हिस्सों में ‘सेवा संकल्प अभियान’ और ‘आशीर्वाद का दीया’ के नाम से बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित हुए। यह अभियान 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलने की बात कही गई है और इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष तथा उनके 76वें जन्मदिन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। हरियाणा सरकार की ओर से जारी जानकारी में भी इसे राष्ट्रीय स्तर के अभियान के रूप में बताया गया, जिसमें सेवा, जनभागीदारी और विकसित भारत 2047 से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ में भी इसका व्यापक स्वरूप दिखाई दिया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार प्रदेशभर में गांव से शहर तक 1.50 करोड़ से अधिक दीये जलाए गए। प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी, महिलाओं, युवाओं, किसानों, श्रमिकों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की भागीदारी की बात सामने आई। प्रशासनिक स्तर पर भी कार्यक्रम की तैयारियों को लेकर बैठकें हुईं। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने 15 सितंबर को जिला पंचायत अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अभियान को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने की बात कही थी।
दृश्य निश्चित रूप से आकर्षक था। अंधेरे में हजारों-लाखों दीयों का एक साथ जलना हमारी सांस्कृतिक परंपरा में प्रकाश, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन पत्रकारिता का काम केवल दृश्य दिखाना नहीं है। कैमरे के सामने दिखाई देने वाली रोशनी के पीछे छिपे सवालों को भी देखना जरूरी है।
करोड़ों दीयों की रोशनी के बीच पहला सवाल – सेवा किसे कहते हैं?
यदि किसी अभियान का नाम ‘सेवा संकल्प अभियान’ है तो स्वाभाविक रूप से जनता यह जानना चाहेगी कि सेवा का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या सेवा केवल एक दिन दीया जलाने, कार्यक्रम आयोजित करने और तस्वीर खिंचवाने तक सीमित है? या फिर सेवा का अर्थ उस व्यक्ति तक पहुंचना भी है, जिसे आज अस्पताल में रक्त चाहिए, जिसके घर में पीने का पानी नहीं है, जिसका बच्चा शिक्षा से वंचित है, जिसे रोजगार चाहिए, जिसे पेंशन या राशन की समस्या है, जिसकी सड़क वर्षों से खराब है या जिसका परिवार इलाज के खर्च से परेशान है?
सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण शायद वही होगा, जो आयोजन समाप्त होने के बाद भी जनता के जीवन में दिखाई दे।
दीया एक रात जलकर बुझ सकता है, लेकिन यदि उसी दिन किसी जरूरतमंद को रक्त मिल जाए, किसी गरीब परिवार का इलाज हो जाए, किसी बच्चे की फीस भर जाए, किसी बेरोजगार को रोजगार का रास्ता मिले, किसी गांव में पानी पहुंचे या किसी जरूरतमंद को सरकारी योजना का लाभ मिल जाए, तो उस सेवा की रोशनी लंबे समय तक दिखाई दे सकती है।
रक्तदान की रोशनी भी जरूरतमंद तक पहुंचे
आज लगभग हर बड़े सामाजिक, धार्मिक या सेवा कार्यक्रम में रक्तदान शिविर आयोजित होते हैं। बड़ी संख्या में लोग उत्साह के साथ रक्तदान भी करते हैं। रक्तदान निस्संदेह एक महत्वपूर्ण मानवीय सेवा है। लेकिन यहां भी एक सवाल समाज और व्यवस्था दोनों के सामने रखा जा सकता है, क्या रक्तदान केवल एक दिन का आयोजन है, या जरूरत की घड़ी में किसी की जिंदगी बचाने तक पहुंचने वाली निरंतर जिम्मेदारी?
कई बार रक्तदान शिविर में रक्त जमा हो जाता है, लेकिन बाद में किसी जरूरतमंद मरीज के परिवार को रक्त की व्यवस्था के लिए अस्पताल और ब्लड बैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं। अलग-अलग परिस्थितियों में मरीज के परिजनों पर रक्त की व्यवस्था, जांच, आने-जाने या अन्य आवश्यक खर्च का बोझ भी पड़ सकता है। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि कोई व्यक्ति रक्तदान करता है, तो क्या उस सेवा को जरूरतमंद तक जोड़ने की कोई मजबूत व्यवस्था भी हो सकती है?
क्यों न रक्तदाता, अपनी सहमति और स्वास्थ्य पात्रता के अनुसार, अधिकृत अस्पताल या ब्लड बैंक के माध्यम से अपना संपर्क उपलब्ध कराए, ताकि जरूरत पड़ने पर उससे संपर्क किया जा सके? यदि वह उस समय रक्तदान करने की स्थिति में हो, तो वह तत्काल आगे आए और जरूरतमंद के साथ खड़ा हो। जहां संभव हो, सेवा भावना से मरीज के परिवार की उचित सहायता में भी सहयोग किया जाए। तब रक्तदान केवल एक कार्यक्रम की तस्वीर नहीं रहेगा, बल्कि किसी अनजान व्यक्ति के जीवन की कठिन घड़ी में वास्तविक सहारा बन सकता है।
यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए, रक्त की जांच, संग्रह, प्रसंस्करण और वितरण अधिकृत ब्लड बैंक तथा चिकित्सकीय नियमों के अनुसार ही होना चाहिए। रक्तदान को किसी निजी लेन-देन या व्यापार का विषय नहीं, बल्कि सुरक्षित और पारदर्शी मानवीय सेवा की व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।
रक्तदान की असली सफलता उस दिन होगी, जब किसी अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे मरीज के लिए यह रक्त समय पर उपलब्ध हो और उसके परिवार को केवल व्यवस्था के अभाव में दर-दर भटकना न पड़े।
दीया जलाने के बाद कुम्हार के घर कितना उजाला पहुंचा?
‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान का एक सकारात्मक पहलू स्थानीय कुम्हारों और मिट्टी के दीये बनाने वाले छोटे कारोबारियों से भी जुड़ता है। इतने बड़े पैमाने पर दीयों की मांग पैदा होना निश्चित रूप से स्थानीय कारीगरों के लिए बाजार उपलब्ध कराने का अवसर बन सकता है।
लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल है – क्या कुम्हार को केवल एक आयोजन के लिए बाजार मिलेगा या पूरे वर्ष उसके उत्पादों के लिए बाजार तैयार किया जाएगा?
यदि सेवा और स्थानीय स्वावलंबन वास्तव में उद्देश्य हैं, तो स्थानीय कारीगरों को केवल एक दिन की मांग नहीं, बल्कि स्थायी बाजार, सरकारी मेलों, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, पर्यटन स्थलों, धार्मिक आयोजनों और अन्य अवसरों से जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा सकता है। एक दिन लाखों दीये बिकना अच्छी बात हो सकती है, लेकिन यदि उसके बाद कुम्हार फिर अपने पुराने संघर्ष में लौट जाए तो उस आर्थिक रोशनी को स्थायी कैसे माना जाए?
सवाल दीये का नहीं, उसके पीछे लगे संसाधनों का है
जब लाखों-करोड़ों दीये जलते हैं तो उनके साथ तेल, बाती, परिवहन, वितरण, आयोजन स्थल, सफाई और कार्यक्रम के बाद बची सामग्री का प्रबंधन भी जुड़ता है। इन सबके पीछे किसी न किसी रूप में संसाधन लगते हैं।
यहां सवाल किसी एक कार्यक्रम को कटघरे में खड़ा करने का नहीं है। सवाल केवल इतना है कि यदि कहीं सार्वजनिक संसाधन, सरकारी संस्थान या प्रशासनिक मशीनरी जुड़ी हो, तो उसकी भूमिका और खर्च की जानकारी पारदर्शी क्यों नहीं होनी चाहिए?
छत्तीसगढ़ में इसी विषय को लेकर राजनीतिक स्तर पर सवाल भी उठे। विपक्ष के नेता भूपेश बघेल ने दीये, बाती और तेल के खर्च के मद को लेकर प्रश्न उठाया। यह एक राजनीतिक सवाल है, इसे खर्च में अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उपलब्ध जानकारी में प्रदेशभर के कुल वास्तविक खर्च का कोई समेकित, आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं मिला है। इसलिए किसी निश्चित राशि का अनुमान लगाकर उसे वास्तविक खर्च बताना उचित नहीं होगा।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना अपने आप में गलत नहीं है। यदि खर्च सार्वजनिक धन से हुआ है तो उसका विवरण जनता के सामने आना पारदर्शिता की सामान्य अपेक्षा है। यदि किसी संगठन, दानदाता या निजी सहयोग से हुआ है तो उसकी प्रकृति और व्यवस्था भी स्पष्ट हो सकती है। और यदि नागरिकों ने स्वेच्छा से सहयोग किया है तो उस सहयोग का सम्मान और उपयोग दोनों पारदर्शी होने चाहिए।
एक दिन का उत्सव या लंबे समय की सेवा?
गुजरात में रिपोर्टों के अनुसार 18,500 से अधिक स्थानों पर 88 लाख से अधिक मिट्टी के दीये जलाए गए। इसके साथ रक्तदान और स्वास्थ्य शिविर जैसी गतिविधियां भी हुईं। उत्तर प्रदेश में 5.90 करोड़ से अधिक दीयों के साथ रक्तदान और ‘सेवा सेतु’ जैसे कार्यक्रमों की जानकारी सामने आई। मध्यप्रदेश में 3.55 करोड़ दीये जलाने की रिपोर्टें आईं और उज्जैन में शिप्रा तथा महाकाल लोक क्षेत्र में 33 लाख से अधिक दीयों का आयोजन बताया गया। दिल्ली में कर्तव्य पथ पर 1.25 लाख दीये जलाए गए। इन आंकड़ों से साफ है कि अभियान का स्वरूप केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई राज्यों में अलग-अलग रूपों में दिखाई दिया।
कहीं स्वास्थ्य शिविर जुड़े, कहीं रक्तदान हुआ, कहीं सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की बात हुई। यही वह बिंदु है जहां ‘सेवा संकल्प’ का अर्थ और अधिक सार्थक हो सकता है।
क्योंकि दीया जलाना प्रतीक है, लेकिन किसी परिवार के जीवन में स्थायी बदलाव लाना परिणाम है।
प्रशासन की भागीदारी और राजनीतिक-सामाजिक भूमिका के बीच वह महीन रेखा
इस पूरे अभियान का एक महत्वपूर्ण प्रश्न संस्थागत भूमिका से जुड़ा है। यदि कोई कार्यक्रम मूल रूप से सामाजिक या राजनीतिक संगठन की पहल है और उसका उद्देश्य किसी सार्वजनिक व्यक्तित्व के जन्मदिन या सार्वजनिक जीवन के अवसर को सम्मान देना है, तो उसकी प्रकृति स्पष्ट रहनी चाहिए।
दूसरी ओर, यदि वही कार्यक्रम प्रशासनिक स्तर पर आयोजित होता है, सरकारी संस्थानों की भागीदारी होती है और उसे सेवा, सुशासन तथा जनकल्याण के अभियान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो जनता यह जानना चाहेगी कि उसकी प्रशासनिक भूमिका और सामाजिक-राजनीतिक भूमिका की सीमाएं किस तरह तय की गई हैं।
दोनों भूमिकाएं अपने-अपने स्थान पर हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में भूमिका की स्पष्टता और संसाधनों की पारदर्शिता महत्वपूर्ण होती है।
जब सोशल मीडिया ने कहानी को दूसरी दिशा दे दी
इतने बड़े आयोजन के बाद सोशल मीडिया पर अनेक वीडियो, तस्वीरें और दावे तेजी से प्रसारित हुए। कुछ वीडियो को कार्यक्रम से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, कुछ पर सवाल उठे और कुछ को लेकर लोगों ने अपनी-अपनी व्याख्या की।
यहीं पत्रकारिता और सोशल मीडिया के बीच का अंतर समझना जरूरी है। कोई वीडियो वायरल हो जाना उसके सही होने का प्रमाण नहीं है। उदाहरण के लिए दीयों से तेल इकट्ठा करते लोगों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस तरह प्रसारित हुआ कि उसे ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम से जोड़ दिया गया, जबकि फैक्ट-चेक में उसके संदर्भ को अलग पाया गया। इसलिए किसी वायरल सामग्री को तथ्य मानने से पहले उसका स्रोत, समय और स्थान जांचना आवश्यक है।
सच्ची पत्रकारिता का धर्म यही है कि वायरल होने से पहले सत्यापन हो और सनसनी से पहले तथ्य।
रोशनी के साथ पर्यावरण का सवाल भी क्यों नहीं?
मिट्टी के दीये अपेक्षाकृत पारंपरिक और स्थानीय उत्पाद हैं, लेकिन जब उनकी संख्या करोड़ों में पहुंचती है तो आयोजन के बाद बची मिट्टी, तेल, बाती, पैकेजिंग और अन्य सामग्री के प्रबंधन का सवाल भी सामने आता है।
क्या बचे हुए दीयों को दोबारा उपयोग किया जा सकता है? क्या तेल और अन्य सामग्री को इस तरह प्रबंधित किया जा सकता है कि नालियों, जलस्रोतों या सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी न फैले? क्या आयोजनों के बाद सफाई की जिम्मेदारी पहले से तय की जाती है?
सेवा का अर्थ केवल आयोजन स्थल को सजाना नहीं, बल्कि आयोजन समाप्त होने के बाद उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ छोड़ना भी होना चाहिए।
आस्था और राजनीति के बीच वह महीन रेखा
इस पूरे विमर्श के बीच सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में राजनीतिक व्यक्तित्वों को धार्मिक प्रतीकों और देवस्वरूपों से जोड़कर प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति पर भी चर्चा दिखाई देती है। कहीं किसी नेता को शिव स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है, कहीं राम की उपमा दी जाती है और कहीं विश्वकर्मा जैसे धार्मिक प्रतीकों से जोड़ने वाली प्रस्तुतियां दिखाई देती हैं।
यह विषय अत्यंत संवेदनशील है और इसे सम्मान तथा आस्था के साथ समझने की जरूरत है। सनातन परंपरा में भगवान केवल किसी राजनीतिक व्यक्तित्व की प्रशंसा के प्रतीक नहीं हैं। शिव आस्था के विषय हैं, राम मर्यादा और आदर्श के प्रतीक हैं तथा भगवान विश्वकर्मा सृजन, निर्माण और शिल्प परंपरा से जुड़े पूज्य देवता हैं।
किसी राजनीतिक नेता के प्रति सम्मान या प्रशंसा व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन उसे धार्मिक आस्था के समान मानना आवश्यक नहीं है। लोकतंत्र में नेता का सम्मान उसके सार्वजनिक कार्यों, नीतियों और योगदान की चर्चा से भी किया जा सकता है।
नेता का सम्मान लोकतंत्र की भाषा हो सकता है, लेकिन भगवान के प्रति श्रद्धा आस्था की भाषा है।
असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब दीये बुझ जाते हैं
कार्यक्रम समाप्त हो गया। दीये बुझ गए। तस्वीरें सोशल मीडिया पर आ गईं। मंच सज गया, भाषण हुए, भीड़ जुटी और कई स्थानों पर हजारों-लाखों लोगों ने भाग लिया।
लेकिन अगले दिन क्या हुआ?
क्या कुम्हार के घर लगातार काम पहुंचा?, क्या रक्तदान करने वाले लोगों से जरूरत के समय संपर्क की व्यवस्था बनी?, क्या किसी गरीब मरीज को रक्त समय पर मिला?, क्या स्वास्थ्य शिविर में मिले मरीजों की आगे की जांच और उपचार की व्यवस्था हुई?, क्या सरकारी योजनाओं से वंचित परिवारों को वास्तव में लाभ मिला?, क्या किसी बेरोजगार युवा के हाथ में रोजगार आया?, क्या किसी गांव में पानी, सड़क या बिजली की समस्या का स्थायी समाधान हुआ?, क्या स्कूल में बच्चों की शिक्षा बेहतर हुई?, क्या आयोजन के बाद सार्वजनिक स्थान पहले से अधिक स्वच्छ हुए?
यही वे सवाल हैं, जो किसी भी सेवा अभियान की वास्तविक प्रभावशीलता को समझने में मदद कर सकते हैं।
जब दीये बुझ गए, तब सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ आखिर यह रोशनी किसके लिए थी?
कुछ घंटों की रोशनी या वर्षों तक याद रहने वाला काम?
एक सवाल यह भी है कि यदि इतने बड़े आयोजन में लगे संसाधनों का कुछ हिस्सा अस्पतालों की सफाई, मरीजों के लिए स्वच्छ चादर-तकिए, गांवों की बदहाल सड़कों, मोहल्लों को जोड़ने वाले रास्तों या पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतों पर लगाया जाता, तो उसका लाभ कितने समय तक दिखाई देता? अस्पताल में गंदगी और बदबू से जूझते मरीजों को स्वच्छ वातावरण मिलता, जरूरतमंद को बिना चादर-तकिए के रहने की मजबूरी कम होती और गांवों में सड़क-पानी जैसी समस्याओं पर स्थायी काम हो सकता था। दीया जलाना भी अपनी जगह एक प्रतीक है, लेकिन यदि वह कुछ घंटों बाद बुझ जाए और लोग अपने-अपने घर लौट जाएं, जबकि दीये वहीं पड़े रह जाएं और बाद में लोग उन्हें चुनते या बचा हुआ तेल इकट्ठा करते दिखाई दें, तो सवाल उठता है, क्या ऐसी सेवा नहीं हो सकती थी जिसकी रोशनी बुझने के बाद भी वर्षों तक दिखाई देती? एक स्वच्छ अस्पताल, एक पक्की सड़क, एक जल व्यवस्था या किसी गरीब के जीवन की वास्तविक समस्या का समाधान शायद ऐसा उजाला होता, जिसे लोग लंबे समय तक याद रखते।
जनता भी केवल दर्शक न बने
लोकतंत्र में जिम्मेदारी केवल सरकार या राजनीतिक दलों की नहीं होती। समाज की भी अपनी जिम्मेदारी है।
यदि हम किसी आयोजन में दीया जलाते हैं तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि उसके पीछे की भावना क्या है। यदि रक्तदान करते हैं तो यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए कि हमारा रक्त सुरक्षित व्यवस्था के माध्यम से जरूरतमंद तक कैसे पहुंचेगा। यदि कुम्हार से दीया खरीदते हैं तो उसके स्थानीय श्रम का सम्मान करें। यदि सरकारी योजना का लाभ लेते हैं तो दूसरों को भी जानकारी दें। यदि किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होते हैं तो उसके बाद स्वच्छता बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाएं।
सेवा केवल मंच पर दिखाई देने वाली गतिविधि नहीं है। सेवा वह है जो किसी दूसरे इंसान के जीवन में कठिन समय में काम आए।
सवाल करोड़ों दीयों का नहीं, उस रोशनी के बाद का है
देशभर में करोड़ों दीये जलाना एक बड़ा दृश्य हो सकता है। यह सांस्कृतिक उत्साह और जनभागीदारी का प्रतीक भी हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र की असली कसौटी दृश्य की विशालता नहीं, परिणाम की स्थायित्व है।
एक रात में करोड़ों दीये जल सकते हैं, लेकिन करोड़ों परिवारों के जीवन में स्थायी उजाला लाने के लिए लगातार काम करना पड़ता है।
एक दिन रक्तदान शिविर लगाया जा सकता है, लेकिन जरूरत के समय रक्त उपलब्ध कराने के लिए मजबूत व्यवस्था चाहिए।
एक दिन कुम्हार से हजारों दीये खरीदे जा सकते हैं, लेकिन उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने के लिए सालभर बाजार चाहिए।
एक दिन सफाई अभियान चलाया जा सकता है, लेकिन स्वच्छता के लिए रोज की आदत और व्यवस्था चाहिए।
एक दिन गरीब के घर भोजन पहुंचाया जा सकता है, लेकिन गरीबी कम करने के लिए रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की मजबूत व्यवस्था चाहिए।
यही अंतर आयोजन और सेवा के बीच है।
जब दीया बुझता है, तभी पता चलता है कि रोशनी कितनी थी
‘आशीर्वाद का दीया’ और ‘सेवा संकल्प अभियान’ ने देशभर में बड़े पैमाने पर जनभागीदारी का दृश्य प्रस्तुत किया। कहीं लाखों दीये जले, कहीं रक्तदान हुआ, कहीं स्वास्थ्य शिविर लगे, कहीं सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने की पहल हुई। इन गतिविधियों के सकारात्मक पहलुओं को स्वीकार करते हुए भी सवाल पूछना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। क्योंकि किसी भी अभियान का मूल्य केवल इस बात से नहीं तय होता कि उसमें कितने लोग शामिल हुए, कितने दीये जले या कितनी तस्वीरें सामने आईं।
मूल सवाल यह है कि उसके बाद कितने जीवन बदले?
जब अंतिम दीया बुझ गया, तब अंधेरे में एक सवाल अब भी खड़ा है
क्या यह रोशनी केवल कुछ घंटों के लिए थी, या इससे किसी गरीब के घर, किसी मरीज के जीवन, किसी कुम्हार की रोजी, किसी बेरोजगार के भविष्य और किसी जरूरतमंद के अधिकार तक भी उजाला पहुंचा?
शायद आने वाले समय में इसी सवाल का जवाब इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी तस्वीर बनेगा।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की अपील
यह लेख किसी व्यक्ति, राजनीतिक दल, सरकार या संगठन के पक्ष अथवा विपक्ष में नहीं है। इसका उद्देश्य केवल सेवा, जनभागीदारी, सार्वजनिक संसाधनों, पारदर्शिता, रक्तदान, स्थानीय कारीगरों, पर्यावरण और जनहित से जुड़े सवालों पर स्वस्थ सार्वजनिक चर्चा को आगे बढ़ाना है। किसी भी आयोजन की उपलब्धियों का सम्मान करते हुए उसके परिणाम और व्यवस्था पर सवाल पूछना लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है।
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प्रदीप मिश्रा
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