स्वास्थ्य का सच :आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी – भाग–4 : एलोपैथी का चमत्कार, लेकिन महंगा इलाज
<p>संपादकीय By ACGN 7647981711, 9303948009 अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक ✍️ कलम की धार…</p>
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संपादकीय
By ACGN 7647981711, 9303948009
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
“निष्पक्ष लेखनी • निर्भीक विश्लेषण • विश्वसनीय तथ्य • जनहित की सच्ची आवाज़” हर रविवार आपके बीच
आलेख : प्रदीप मिश्रा
स्वास्थ्य का सच :आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी,आखिर आदमी बीमार क्यों पड़ता है? (भाग–4)
‘कलम की धार’ अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेष स्तंभ है, जो प्रत्येक रविवार प्रकाशित होता है। इसका उद्देश्य जनहित, जनजागरूकता और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों की तथ्यपरक, निष्पक्ष एवं विश्लेषणात्मक प्रस्तुति करना है।
इस स्तंभ में समय-समय पर राजनीतिक, सामाजिक, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, संस्कृति, पर्व-त्योहार और समसामयिक विषयों पर आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक विशेष लेख प्रकाशित किए जाते हैं, ताकि पाठकों तक सच्चाई और संतुलित दृष्टिकोण पहुंच सके।
आज का विषय – भाग–4 : एलोपैथी का चमत्कार, लेकिन महंगा इलाज और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियां क्यों बढ़ रही हैं?
बीमारी आखिर आदमी को क्यों घेरती है? इस सवाल से शुरू हुई ‘कलम की धार’ की स्वास्थ्य यात्रा अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सवाल केवल बीमारी का नहीं, बल्कि इलाज की व्यवस्था का है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने गंभीर से गंभीर बीमारी में जीवन बचाने की उम्मीद पैदा की है, लेकिन दूसरी ओर महंगा इलाज, बढ़ती मरीज संख्या, डॉक्टरों की कमी और सरकारी अस्पतालों पर बढ़ता दबाव आम आदमी के सामने नई चुनौती बनकर खड़ा है।
भाग–4 में ‘कलम की धार’ इसी सवाल को सामने रखती है—अगर इलाज जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा सहारा है, तो यह सहारा हर आम आदमी की पहुंच में क्यों नहीं होना चाहिए?
सरकार की स्वास्थ्य योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनके साथ मजबूत सरकारी अस्पताल, पर्याप्त संख्या में योग्य चिकित्सक, जरूरी जांच, दवाइयां और ईमानदार स्वास्थ्य सेवाएं भी उतनी ही जरूरी हैं,क्योंकि स्वास्थ्य केवल एक योजना नहीं,हर नागरिक का जीवन और अधिकार है।
बीमारी से लड़ना ही नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा
किसी भी देश की असली ताकत उसके बड़े भवनों, चौड़ी सड़कों या बढ़ती अर्थव्यवस्था से ही नहीं मापी जाती। किसी देश की वास्तविक तस्वीर तब सामने आती है, जब उसके अस्पताल के दरवाजे पर एक गरीब परिवार अपने बीमार सदस्य को लेकर पहुंचता है।
उस समय उस परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि देश कितना विकसित हो गया है। उसके सामने सिर्फ एक सवाल होता है
क्या इलाज मिल जाएगा?
क्या डॉक्टर समय पर मिलेंगे?
क्या जरूरी जांच हो पाएगी?
क्या अस्पताल में दवा उपलब्ध होगी?
क्या आपातकालीन स्थिति में बिस्तर मिलेगा?
और सबसे बड़ा सवाल,क्या इलाज के लिए परिवार को अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी गंवानी पड़ेगी?
स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। भोजन, पानी, आवास और शिक्षा के साथ स्वास्थ्य ऐसी सुविधा है, जिसके बिना व्यक्ति अपने जीवन की दूसरी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर सकता, इसीलिए सरकारों की स्वास्थ्य योजनाएं निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन योजनाओं के साथ-साथ यह भी उतना ही जरूरी है कि सरकारी अस्पताल इतने सक्षम, सुविधायुक्त और भरोसेमंद हों कि आम नागरिक को इलाज के लिए मजबूरी में निजी अस्पताल की ओर न देखना पड़े।
यही सवाल हमारी आज की ‘कलम की धार’ का केंद्र है।
एलोपैथी : आधुनिक चिकित्सा का चमत्कार या आम आदमी पर बढ़ता आर्थिक बोझ?
यदि आज किसी व्यक्ति को अचानक हार्ट अटैक आ जाए, सड़क दुर्घटना हो जाए, मस्तिष्काघात हो जाए, अत्यधिक रक्तस्राव हो या शरीर में गंभीर संक्रमण फैल जाए, तो परिवार का पहला कदम क्या होगा? कोई जड़ी-बूटी खोजने नहीं जाएगा, घरेलू नुस्खा नहीं ढूंढेगा, अधिकांश लोग तुरंत एंबुलेंस बुलाएंगे या निकटतम अस्पताल पहुंचेंगे।
यही आधुनिक चिकित्सा, यानी एलोपैथी की सबसे बड़ी ताकत है, आपातकालीन परिस्थितियों में जीवन बचाने की क्षमता।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जिस तेजी से विकास किया है, उसने मानव जीवन को बचाने की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा दिया है।
आधुनिक चिकित्सा ने दुनिया बदल दी
पिछली दो शताब्दियों में चिकित्सा विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है।
आज एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई, अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी, एंजियोग्राफी, रोबोटिक शल्य चिकित्सा, अंग प्रत्यारोपण, कृत्रिम हृदय वाल्व, डायलिसिस, गहन चिकित्सा कक्ष और कृत्रिम श्वसन यंत्र जैसी सुविधाओं ने ऐसे मरीजों को भी जीवन दिया है, जिन्हें कभी बचाना लगभग असंभव माना जाता था।
कभी साधारण संक्रमण भी जानलेवा साबित हो जाता था। आज अनेक संक्रमणों का प्रभावी उपचार उपलब्ध है।
प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं से मातृ मृत्यु के जोखिम में कमी आई है। बच्चों के टीकाकरण ने अनेक गंभीर संक्रामक रोगों से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह सब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धियां हैं।
कोरोना महामारी ने क्या सिखाया?
साल 2020 में कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को एक ऐसी चुनौती के सामने खड़ा कर दिया, जिसकी कल्पना आधुनिक पीढ़ी ने शायद ही कभी की थी।
डॉक्टर, नर्स, तकनीकी कर्मचारी, सफाईकर्मी और अन्य स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात अस्पतालों में डटे रहे।
ऑक्सीजन, गहन चिकित्सा कक्ष, कृत्रिम श्वसन यंत्र और आधुनिक उपचार व्यवस्था ने गंभीर रूप से बीमार अनेक लोगों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड समय में टीके विकसित किए। टीकाकरण ने गंभीर बीमारी और मृत्यु के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
कोरोना ने दुनिया को एक और बड़ा सबक दिया,मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था किसी भी देश की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है।
लेकिन इलाज महंगा क्यों होता जा रहा है?
यहीं से दूसरा सवाल शुरू होता है, जब एक सामान्य परिवार किसी निजी अस्पताल में भर्ती होता है, तो चिंता केवल बीमारी की नहीं रहती। चिंता इलाज के खर्च की भी होती है।
जांचें, महंगी दवाइयां, शल्य चिकित्सा, गहन चिकित्सा कक्ष, कमरे का किराया, विशेषज्ञ, चिकित्सक की फीस और कुछ ही दिनों में लाखों रुपये का बिल।
हर परिवार ऐसा खर्च उठाने की स्थिति में नहीं होता।
यही वह स्थिति है, जहां बीमारी शरीर के साथ-साथ परिवार की आर्थिक व्यवस्था को भी प्रभावित करने लगती है।
आर्थिक बीमारी, जो शरीर की बीमारी से बड़ी हो जाती है
भारत में बड़ी आबादी निम्न और मध्यम आय वर्ग से आती है, ऐसे परिवार वर्षों की मेहनत से बच्चों की पढ़ाई, घर, विवाह, खेती, व्यवसाय और भविष्य के लिए कुछ धन बचाते हैं, लेकिन यदि परिवार का कोई सदस्य गंभीर बीमारी की चपेट में आ जाए, तो वर्षों की जमा पूंजी कुछ ही दिनों में समाप्त हो सकती है।
कई परिवार कर्ज लेते हैं,कुछ को जमीन बेचनी पड़ती है, कुछ लोग अपने आभूषण गिरवी रखते हैं, कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बीमारी के बाद वर्षों तक सामान्य नहीं हो पाती।
इसलिए स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का विषय नहीं है। यह आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय का भी विषय है।
सरकार को योजनाओं के साथ अस्पतालों की मजबूती पर भी ध्यान देना होगा
सरकारें स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनेक योजनाएं चला रही हैं। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को उपचार उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से सहायता दी जा रही है।
इन योजनाओं से लोगों को लाभ भी मिला है।
लेकिन कलम की धार का सवाल योजनाओं के विरोध का नहीं, बल्कि उनकी जमीनी उपयोगिता को और मजबूत करने का है।
क्योंकि किसी परिवार के पास उपचार योजना का कार्ड तो हो, लेकिन अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध न हो..जरूरी जांच की मशीन काम न कर रही हो..दवा उपलब्ध न हो..बिस्तर न मिले या विशेषज्ञ चिकित्सक के लिए लंबा इंतजार करना पड़े तो कागज पर मौजूद सुविधा और जमीन पर उपलब्ध सुविधा के बीच अंतर रह जाता है।
सरकार को चाहिए कि स्वास्थ्य को केवल योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि अस्पताल में उपलब्ध वास्तविक सुविधा से मापा जाए।
एक ऐसा सरकारी अस्पताल जहां मरीज को सम्मान मिले, डॉक्टर उपलब्ध हों, जरूरी जांच समय पर हो, दवाइयां मिलें और आपातकाल में तत्काल उपचार मिले,वह अपने आप में सबसे बड़ी जनकल्याणकारी योजना है।
सरकारी अस्पताल : उम्मीद भी, चुनौती भी
देश के अनेक सरकारी अस्पताल गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जीवनरेखा हैं, इन अस्पतालों में ऐसे डॉक्टर और कर्मचारी भी हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद दिन-रात मरीजों की सेवा करते हैं।
लेकिन मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जनसंख्या बढ़ रही है, बीमारियों का स्वरूप बदल रहा है, नई चिकित्सा तकनीकें सामने आ रही हैं, ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव भी बढ़ना स्वाभाविक है।
कहीं डॉक्टरों की कमी दिखाई देती है, कहीं विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है, कहीं नर्सिंग और तकनीकी कर्मचारियों की आवश्यकता है, कहीं जांच की सुविधा सीमित है, कहीं मरीजों की संख्या उपलब्ध संसाधनों से कहीं अधिक है।
इन चुनौतियों का समाधान केवल नई योजना घोषित करने से नहीं होगा।
इसके लिए सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में योग्य और शिक्षित चिकित्सकों की भर्ती, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्ति और आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की नियमित व्यवस्था जरूरी है।
लेकिन यहां एक दूसरी जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
डॉक्टरों की भर्ती हो, लेकिन व्यवस्था और नियमों के साथ
सरकार को योग्य डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए भर्ती प्रक्रिया को मजबूत करना चाहिए,लेकिन भर्ती केवल संख्या बढ़ाने के लिए नहीं होनी चाहिए।
योग्यता, पारदर्शिता, नियम और आवश्यकता – इन चारों का संतुलन जरूरी है।
जिस क्षेत्र में जिस विशेषज्ञ की जरूरत है, वहां उसी विशेषज्ञ की नियुक्ति हो। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए दीर्घकालीन नीति बनाई जाए।
क्योंकि केवल बड़े शहरों में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने से पूरे प्रदेश या देश की स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होगी।
दूरदराज के गांव में रहने वाला व्यक्ति भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना महानगर में रहने वाला नागरिक।
डॉक्टर की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है
यह बात सरकार की जिम्मेदारी के साथ-साथ चिकित्सकों की जिम्मेदारी पर भी लागू होती है।
डॉक्टर केवल एक नौकरी करने वाला कर्मचारी नहीं है।
वह उस व्यक्ति के सामने खड़ा होता है, जो बीमारी और भय के बीच उससे उम्मीद लगाए बैठा है।
सरकार यदि डॉक्टर को वेतन, सुविधा और सम्मान देती है, तो बदले में डॉक्टर से भी अपेक्षा होती है कि वह अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाए।
समय पर अस्पताल पहुंचना..मरीज को उचित समय देना..जरूरी जांच और उपचार की प्रक्रिया समझाना..गरीब मरीज के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना..आपातकाल में संवेदनशीलता दिखाना..और अपनी ड्यूटी को केवल औपचारिकता न समझना..
ये बातें किसी नियम पुस्तिका से अधिक मानवीय जिम्मेदारी का हिस्सा हैं। अधिकांश चिकित्सक पूरी निष्ठा से काम करते हैं और कठिन परिस्थितियों में भी मरीजों की सेवा करते हैं। ऐसे चिकित्सकों का सम्मान होना चाहिए।
लेकिन जहां कहीं लापरवाही, ड्यूटी से अनुपस्थिति या मरीजों के साथ अनुचित व्यवहार की शिकायत सामने आती है, वहां निष्पक्ष जांच और आवश्यक कार्रवाई भी होनी चाहिए।
अधिकार और जिम्मेदारी हमेशा साथ-साथ चलते हैं।
दवाइयां : वरदान भी, सावधानी भी
एलोपैथी की दवाइयां वैज्ञानिक परीक्षण और चिकित्सा संबंधी प्रमाणों के आधार पर उपयोग में लाई जाती हैं। दर्द निवारक दवाएं, संक्रमणरोधी दवाएं, इंसुलिन, रक्तचाप नियंत्रित करने वाली दवाएं और अनेक अन्य औषधियां करोड़ों लोगों के जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
लेकिन हर दवा का उचित उपयोग आवश्यक है।
बिना चिकित्सकीय सलाह के बार-बार संक्रमणरोधी दवाएं लेना दवा प्रतिरोध जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।
कुछ दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक अनियंत्रित उपयोग गुर्दे या पेट पर प्रभाव डाल सकता है।
स्टेरॉयड कुछ परिस्थितियों में जीवनरक्षक हो सकते हैं, लेकिन बिना आवश्यकता या गलत तरीके से लंबे समय तक लेने पर गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
इसलिए दवा स्वयं समस्या नहीं है।
समस्या दवा का गलत या अनियंत्रित उपयोग है।
क्या इलाज सेवा है या व्यवसाय?
यही वह प्रश्न है जो आज समाज में सबसे अधिक चर्चा का विषय है। एक ओर निजी अस्पतालों का तर्क है कि आधुनिक मशीनें, विशेषज्ञ डॉक्टर, प्रशिक्षित कर्मचारी, चौबीस घंटे की सेवाएं और उच्च तकनीक अत्यधिक खर्चीली हैं।
दूसरी ओर आम नागरिक चाहता है कि स्वास्थ्य सेवा उसकी पहुंच में रहे और इलाज का खर्च उसे आर्थिक रूप से बर्बाद न करे।
सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
अच्छे अस्पताल चलाने में खर्च होता है। आधुनिक चिकित्सा उपकरणों का रखरखाव महंगा होता है।
विशेषज्ञ चिकित्सकों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।
लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि स्वास्थ्य सेवा में पारदर्शिता और मरीज का हित सर्वोच्च हो।
जहां कहीं अनावश्यक जांच, अनावश्यक उपचार या अनुचित शुल्क संबंधी शिकायतें सामने आएं, वहां प्रभावी निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है।
स्वास्थ्य सेवा को केवल बाजार की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
क्योंकि यहां ग्राहक नहीं, एक मरीज और उसका जीवन सामने होता है।
क्या केवल दवा से स्वास्थ्य मिलेगा?
आधुनिक चिकित्सा स्वयं भी यह मानती है कि केवल दवा पर्याप्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति दवा ले रहा है, लेकिन लगातार तनाव में है, धूम्रपान करता है, शराब का सेवन करता है, व्यायाम नहीं करता, पर्याप्त नींद नहीं लेता और असंतुलित भोजन करता है, तो लंबे समय तक स्वस्थ रहना कठिन हो सकता है।
इसलिए स्वस्थ जीवन के लिए संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण और नशीले पदार्थों से दूरी भी जरूरी है।
अर्थात चिकित्सा व्यवस्था का उद्देश्य केवल बीमारी आने के बाद उपचार करना नहीं, बल्कि बीमारी से बचाव और स्वस्थ जीवन की आदतों को बढ़ावा देना भी होना चाहिए।
कलम की धार : सबसे जरूरी सुविधा कौन-सी?
हम अक्सर विकास की चर्चा करते हैं। नई सड़कें चाहिए। नई इमारतें चाहिए। नई योजनाएं चाहिए।
नई परियोजनाएं चाहिए।
लेकिन जब किसी परिवार का सदस्य अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी और मौत से जूझता है, तब परिवार को सड़क नहीं, डॉक्टर चाहिए। उसे घोषणा नहीं, इलाज चाहिए। उसे कागज पर योजना नहीं, अस्पताल में सुविधा चाहिए। उसे केवल आश्वासन नहीं, समय पर चिकित्सा चाहिए।
इसलिए सरकार को चाहिए कि स्वास्थ्य व्यवस्था को सबसे प्राथमिक सुविधाओं में रखा जाए।
सरकारी अस्पतालों को मजबूत किया जाए।
जहां मरीजों की संख्या बढ़ रही है, वहां उसी अनुपात में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई जाए।
विशेषज्ञ चिकित्सकों की भर्ती की जाए।
नर्सिंग और तकनीकी कर्मचारियों की कमी दूर की जाए।
आवश्यक जांच सुविधाएं बढ़ाई जाएं।
दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
आपातकालीन सेवाओं को मजबूत किया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण – सरकारी अस्पतालों में मरीज को यह भरोसा मिले कि पैसे की कमी उसके इलाज में सबसे बड़ी बाधा नहीं बनेगी।
योजनाओं से आगे बढ़कर स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने का समय
सरकार की योजनाएं जरूरी हैं। लेकिन योजनाओं की सफलता का अंतिम प्रमाण सरकारी कागज नहीं, अस्पताल का मरीज होता है।
यदि मरीज को समय पर डॉक्टर मिल गया..जरूरी जांच हो गई..दवा उपलब्ध हो गई..उचित उपचार मिल गया..और परिवार आर्थिक संकट में जाने से बच गया..तभी स्वास्थ्य योजना की वास्तविक सफलता मानी जाएगी।
सरकार को चाहिए कि नई-नई घोषणाओं के साथ पहले से मौजूद सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की क्षमता भी लगातार बढ़ाई जाए। पुराने अस्पतालों का उन्नयन हो। जहां भवन हैं वहां डॉक्टर हों। जहां डॉक्टर हैं वहां आवश्यक उपकरण हों। जहां उपकरण हैं वहां प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी हों। और जहां पूरी व्यवस्था है, वहां उसकी निगरानी भी हो। स्वास्थ्य व्यवस्था एक कड़ी है। इसकी एक भी कमजोर कड़ी पूरे तंत्र को प्रभावित कर सकती है।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” का शासन से अपील
स्वस्थ नागरिक ही मजबूत राष्ट्र की नींव एलोपैथी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। इसने असंख्य लोगों की जान बचाई है और आज भी बचा रही है।
लेकिन आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धियों का वास्तविक लाभ तभी आम आदमी तक पहुंचेगा, जब स्वास्थ्य सेवा उसकी आर्थिक पहुंच में होगी।
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मजबूत और सुलभ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था बनाए। डॉक्टरों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी ड्यूटी ईमानदारी और संवेदनशीलता से निभाएं।
मरीज की जिम्मेदारी है कि वह चिकित्सकीय सलाह का पालन करे और बिना सलाह दवाइयों का अनियंत्रित उपयोग न करे।
समाज की जिम्मेदारी है कि वह स्वास्थ्य को केवल बीमारी के समय याद न करे, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली को अपनी आदत बनाए।
सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि किसी गरीब पिता को अपने बच्चे के इलाज के लिए खेत न बेचना पड़े.. किसी मां को दवा खरीदने और घर का राशन चलाने में से एक को न चुनना पड़े..किसी बुजुर्ग को पैसों की कमी के कारण अपना इलाज अधूरा न छोड़ना पड़े..और किसी मरीज को केवल इसलिए बेहतर इलाज से वंचित न होना पड़े क्योंकि उसके पास पर्याप्त पैसा नहीं है।
यही वह स्वास्थ्य व्यवस्था होगी, जहां चिकित्सा केवल सेवा नहीं, संवेदना बनेगी।
क्योंकि अंततः अस्पताल की सबसे बड़ी सफलता उसकी महंगी मशीन नहीं, बल्कि वह बची हुई जिंदगी है जो इलाज के बाद अपने घर लौटती है।
एक स्वस्थ नागरिक ही स्वस्थ परिवार बनाता है।
स्वस्थ परिवार ही मजबूत समाज बनाता है। और स्वस्थ समाज ही मजबूत राष्ट्र की नींव रखता है।
यही स्वास्थ्य का सच है।
यही ‘कलम की धार’ का सवाल है। और शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
क्रमशः…
भाग–5 (अंतिम भाग) में पढ़िए :
आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी का तुलनात्मक विश्लेषण—तीनों चिकित्सा पद्धतियों की वास्तविक भूमिका क्या है? आम आदमी को क्या समझना और क्या अपनाना चाहिए? भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी होनी चाहिए? और ‘कलम की धार’ का अंतिम संपादकीय निष्कर्ष क्या कहता है?
प्रदीप मिश्रा
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