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सच की तह तक

जब देश का भविष्य सड़क पर बैठा हो, तब सवाल छात्रों से नहीं, व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए।

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विशेष संपादकीय

दिल्ली
By ACGN 7647981711, 9303948009

“जंतर-मंतर की खामोशी में आखिर ऐसा कौन-सा सच छिपा है… जिससे सत्ता भी असहज दिख रही है?”

दिल्ली का जंतर-मंतर केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की वह पहचान है जहाँ वर्षों से देश का आम नागरिक अपनी आवाज़ लेकर पहुँचता रहा है। किसानों ने यहीं अपनी बात रखी, पूर्व सैनिकों ने भी, महिलाओं ने भी और अब देश का भविष्य कहे जाने वाले लाखों युवाओं ने भी इसी स्थान को चुना। लेकिन इस बार जंतर-मंतर पर केवल एक प्रदर्शन नहीं हुआ, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रणाली और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए।

छात्रों के इस आंदोलन की पृष्ठभूमि कोई एक दिन की नहीं थी। वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, विभिन्न परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, भर्तियों का लंबा इंतजार और लाखों युवाओं के भविष्य पर छाई अनिश्चितता ने धीरे-धीरे असंतोष को जन्म दिया। जब संवाद से समाधान नहीं मिला, तब अनेक छात्र और अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पहुँचे। उनका कहना था कि वे किसी सरकार के विरोध में नहीं, बल्कि अपने भविष्य के पक्ष में खड़े हैं।


छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आईं। इसके बाद सोशल मीडिया पर अनेक वीडियो वायरल हुए। कुछ वीडियो में छात्र-छात्राएँ हाथ जोड़कर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करते दिखाई दिए। कुछ वीडियो में पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। कुछ वीडियो में महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित अभद्र व्यवहार के आरोप भी लगाए गए। इन वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि कहीं कानून की सीमाओं का उल्लंघन हुआ है, तो लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि निष्पक्ष जाँच हो और सच्चाई सामने आए।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ जनप्रतिनिधियों के कथित विवादित बयान भी चर्चा का विषय बने। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो व्यापक रूप से साझा किए गए जिनमें दावा किया गया कि प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए अत्यंत कठोर और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया।

“सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो व्यापक रूप से साझा किए गए हैं, जिनमें दावा किया गया कि कुछ जनप्रतिनिधियों ने प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए अत्यंत कठोर और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। इन वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी सांसद या जनप्रतिनिधि ने वास्तव में छात्रों के लिए ‘इनका करियर खत्म कर दो’, ‘इन्हें लटका दो’ या इसी प्रकार के अमर्यादित और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बयान दिए हैं, तो यह केवल राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि संसदीय गरिमा का प्रश्न भी होगा।”
“भारत की संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे संविधान की मर्यादा, लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करें। यदि कोई जनप्रतिनिधि अपने पद की गरिमा के विपरीत आचरण करता है या हिंसा, दमन अथवा नागरिक अधिकारों के हनन को बढ़ावा देने वाला वक्तव्य देता है, तो उससे जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि आरोप सत्य सिद्ध हों, तो संसद की आचार समिति तथा सक्षम संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से उचित कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए।”
“लोकतंत्र में छात्रों से असहमति हो सकती है, उनकी मांगों से भी असहमति हो सकती है, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक समाज में युवाओं के लिए हिंसक, अपमानजनक या दमनकारी भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती। जनप्रतिनिधियों के शब्द केवल राजनीतिक बयान नहीं होते, वे लोकतंत्र की संस्कृति को भी आकार देते हैं।”

इन दावों की भी पुष्टि आवश्यक है। यदि किसी जनप्रतिनिधि ने वास्तव में ऐसा कहा है, तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा और संसदीय गरिमा का विषय है। संसद जनता की सर्वोच्च संस्था है और उसके सदस्यों से अपेक्षा होती है कि वे असहमति का उत्तर तर्क से दें, अपमान से नहीं।
लोकतंत्र में छात्रों से असहमति हो सकती है, उनकी मांगों से भी असहमति हो सकती है, लेकिन किसी भी छात्र को केवल इसलिए अपमानित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने अपने भविष्य पर सवाल उठाए हैं। जो युवा आज सड़क पर हैं, वही कल इस देश के शिक्षक, वैज्ञानिक, चिकित्सक, सैनिक, न्यायाधीश, पत्रकार और प्रशासनिक अधिकारी बनेंगे। यदि उनकी आवाज़ को सुनने के बजाय उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत होगा।
सरकार से भी कुछ सीधे प्रश्न पूछे जाने चाहिए। यदि लाखों युवा लगातार परीक्षा प्रणाली और भर्ती प्रक्रिया को लेकर असंतोष जता रहे हैं, तो क्या केवल आश्वासन पर्याप्त है? क्या युवाओं का विश्वास केवल घोषणाओं से लौट आएगा? क्या परीक्षा सुधार और भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध बनाना अब भी प्राथमिकता नहीं होना चाहिए? क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध को पहले संवाद और फिर समाधान से नहीं संभाला जाना चाहिए?


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया है। सरकार ने भी सुधारों का आश्वासन दिया है। अब देश के युवाओं की अपेक्षा यह है कि ये घोषणाएँ धरातल पर दिखाई दें। क्योंकि विश्वास शब्दों से नहीं, परिणामों से बनता है।
आज यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन जनता और संविधान स्थायी रहते हैं। चुनाव के समय हर नेता जनता के बीच जाता है, समर्थन मांगता है, हाथ जोड़ता है और सेवा का वादा करता है। इसलिए सत्ता में आने के बाद जनता के प्रश्नों को असुविधा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी समझना चाहिए।
जो लोग आज छात्रों की आवाज़ को कमतर आँक रहे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि हर छात्र किसी परिवार का बेटा या बेटी है। उनके माता-पिता ने वर्षों तक संघर्ष कर उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया है। उनके सपनों की रक्षा करना केवल परिवार की नहीं, राष्ट्र की भी जिम्मेदारी है।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि सरकार कितनी मजबूत है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह अपने सबसे कठोर आलोचक की बात भी धैर्य से सुन सके। यदि छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं, तो उन्हें सुना जाना चाहिए। यदि प्रशासन पर सवाल उठते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। यदि नेताओं की भाषा पर आपत्ति होती है, तो सार्वजनिक जीवन की मर्यादा के अनुरूप जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
जंतर-मंतर की यह कहानी केवल एक आंदोलन की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है जो टूट भी सकता है और फिर से बनाया भी जा सकता है। यह उस लोकतंत्र की परीक्षा है जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है।

अंत में केवल एक प्रश्नक्या देश अपने युवाओं की आवाज़ सुनेगा, या आने वाली पीढ़ियाँ भी अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर बैठने को मजबूर होंगी?

प्रदीप मिश्रा
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