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पुराने कागजों से डिजिटल रिकॉर्ड तक… अब राजस्व दफ्तरों के चक्कर खत्म करने की तैयारी, ‘वसुंधरा’ बदलेगी व्यवस्था का चेहरा

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रायपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनादि पांडेय रायपुर 

12.89 करोड़ पृष्ठों के राजस्व अभिलेख होंगे डिजिटल, AI और ब्लॉकचेन से सुरक्षित होंगे रिकॉर्ड; नकल के लिए दिनों का इंतजार खत्म कर कुछ मिनटों में मिलेगी प्रमाणित प्रति

रायपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ में राजस्व अभिलेखों से जुड़ी सेवाओं को तेज, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने डिजिटल बदलाव की बड़ी तैयारी शुरू की है। राजस्व, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग की ‘वसुंधरा’ परियोजना के जरिए प्रदेश के पुराने और वर्तमान राजस्व अभिलेखों का डिजिटलीकरण, संरक्षण और प्रमाणीकरण किया जाएगा। परियोजना का उद्देश्य नागरिकों को बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम करना और भूमि संबंधी दस्तावेजों को अधिक सुरक्षित एवं आसानी से उपलब्ध बनाना है।
       दंतेवाड़ा के प्रयोग से पूरे प्रदेश तक पहुंची पहल
‘वसुंधरा’ परियोजना की कार्ययोजना के पीछे दंतेवाड़ा जिले में किए गए प्रयोग को महत्वपूर्ण आधार माना गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दंतेवाड़ा में पिछले एक वर्ष के दौरान 12 हजार से अधिक नागरिकों ने कियोस्क सेवाओं का लाभ उठाया, जबकि 15 हजार से अधिक जाति प्रमाण-पत्र एक से दो दिनों में जारी किए गए। इसके साथ ही सैकड़ों विवादित मामलों के त्वरित निराकरण की बात भी सामने आई है। परियोजना से जुड़े विवरण के अनुसार अभिलेखों में छेड़छाड़ का कोई मामला सामने नहीं आया।
     12 करोड़ 89 लाख पृष्ठों का विशाल डिजिटल रिकॉर्ड
दंतेवाड़ा के अनुभव के आधार पर अब प्रदेशभर के लगभग 12 करोड़ 89 लाख पृष्ठों के विभिन्न राजस्व अभिलेखों को डिजिटल स्वरूप देने की योजना तैयार की गई है। इसमें 22.72 करोड़ रुपए की लागत से 5.68 करोड़ पृष्ठ खसरा पांचसाला, 11.77 करोड़ रुपए की लागत से 2.94 करोड़ पृष्ठ बी-1 रिकॉर्ड, 9.98 करोड़ रुपए की लागत से 2.49 करोड़ पृष्ठ नामांतरण एवं संशोधन पंजी, 2.13 करोड़ रुपए की लागत से 53.16 लाख पृष्ठ मिसल पंजी तथा 1.89 करोड़ रुपए की लागत से 47.29 लाख पृष्ठ अधिकार अभिलेखों को डिजिटल किया जाएगा।
इसके अलावा निस्तार पत्रक, वाजिब-उल-अर्ज, रीनंबरिंग सूची, साधारण खसरा, नजूल शीट और व्यवर्तन पंजी जैसे महत्वपूर्ण राजस्व दस्तावेज भी डिजिटल रूप से सुरक्षित किए जाएंगे। पुराने कागजी अभिलेखों को सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड में बदलने से इनके संरक्षण के साथ भविष्य में रिकॉर्ड खोजने और सत्यापन की प्रक्रिया को भी आसान बनाने का लक्ष्य है।
65.41 करोड़ रुपए का पूंजीगत ढांचा, एक वर्ष में काम पूरा करने की तैयारी
परियोजना के लिए 65.41 करोड़ रुपए की कुल एकमुश्त पूंजीगत लागत यानी CAPEX और 50 लाख रुपए प्रतिवर्ष का परिचालन व्यय यानी OPEX निर्धारित किया गया है। इसकी वित्तीय व्यवस्था राज्य के अधोसंरचना मद और केंद्र सरकार की DILRMP 3.0 योजना के माध्यम से किए जाने की बात कही गई है।
योजना के अनुसार राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र यानी NIC के सहयोग से अगले तीन महीनों के भीतर ‘वसुंधरा’ पोर्टल और मोबाइल ऐप तैयार किया जाएगा। इसके बाद कार्यदायी एजेंसियों का चयन कर एक वर्ष के भीतर राजस्व अभिलेखों के डिजिटलीकरण और सत्यापन का कार्य पूरा करने की योजना है।
   AI से खोज आसान, ब्लॉकचेन से रिकॉर्ड की सुरक्षा
‘वसुंधरा’ परियोजना में आधुनिक तकनीक को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। AI आधारित OCR तकनीक के जरिए पुराने दस्तावेजों को डिजिटल टेक्स्ट में बदलने, डॉक्यूमेंट क्लासिफिकेशन के जरिए रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने और स्मार्ट सर्च इंजन के माध्यम से पुराने अभिलेखों को तेजी से खोजने की व्यवस्था प्रस्तावित है।
अभिलेखों में हेरफेर और धोखाधड़ी की संभावना को कम करने के लिए ब्लॉकचेन आधारित सुरक्षा, डिजिटल हस्ताक्षर तथा यूनिक QR और बारकोड प्रणाली लागू किए जाने की योजना है। इससे किसी दस्तावेज की प्रमाणिकता जांचने और उसके डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने में तकनीकी सहायता मिलेगी।
तीन से सात दिन का इंतजार घटकर कुछ मिनटों तक पहुंचाने का लक्ष्य
परियोजना पूरी तरह लागू होने के बाद वर्तमान में नकल प्राप्त करने में लगने वाले तीन से सात दिनों के समय को घटाकर कुछ मिनटों तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। प्रस्तावित व्यवस्था में नागरिकों को यह सुविधा 24 घंटे उपलब्ध कराने की योजना है।
वेब पोर्टल, मोबाइल ऐप, लोक सेवा केंद्र और कियोस्क के माध्यम से नागरिक घर बैठे प्रमाणित राजस्व अभिलेख प्राप्त कर सकेंगे। ऑनलाइन पेमेंट गेटवे और अधिकारियों के लिए रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी सुविधाओं को भी इस डिजिटल व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाएगा।
     जमीन के कागजों से जुड़ी व्यवस्था में बड़ा बदलाव
राजस्व अभिलेख किसी भी भूमि व्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारभूत कड़ी होते हैं। ऐसे में करोड़ों पृष्ठों के पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित करने और उन्हें सत्यापित डिजिटल व्यवस्था से जोड़ने की पहल का असर केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नागरिकों के लिए रिकॉर्ड तक पहुंच, दस्तावेजों के संरक्षण और उनकी प्रमाणिकता की जांच की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास किया जाएगा।
‘वसुंधरा’ परियोजना का वास्तविक प्रभाव हालांकि इसके क्रियान्वयन, रिकॉर्ड की गुणवत्ता, डिजिटलीकरण की शुद्धता, सत्यापन की मजबूती और नागरिकों तक डिजिटल सेवाओं की पहुंच पर निर्भर करेगा। योजना के अनुसार यदि निर्धारित समयसीमा और तकनीकी सुरक्षा मानकों के साथ इसका क्रियान्वयन होता है, तो छत्तीसगढ़ में राजस्व अभिलेखों से जुड़ी सेवाओं को पारंपरिक कागजी व्यवस्था से डिजिटल और अधिक सुलभ व्यवस्था की ओर ले जाने में यह परियोजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


प्रदीप मिश्रा
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