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स्वास्थ्य का सच : आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी — आखिर आदमी बीमार क्यों पड़ता है?

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संपादकीय

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आइए जानते है 5 भागो में “आखिर आदमी बीमार क्यों पड़ता है?  आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी का वह सच, जिसे हर परिवार को जानना चाहिए।”

आज का विषय – स्वास्थ्य का सच : आखिर आदमी बीमार क्यों पड़ता है? – जीवनशैली, खान-पान और मन का गहरा संबंध

आलेख : प्रदीप मिश्रा

बीमार शरीर की कहानी, बेचैन मन की जुबानी

सुबह के छह बजे हैं। अलार्म बजता है। आंखें खुलती हैं, लेकिन शरीर उठना नहीं चाहता। रात भर करवटें बदलने के बाद भी नींद पूरी नहीं हुई। उठते ही सिर भारी है, मुंह का स्वाद बिगड़ा हुआ है, पेट साफ नहीं हुआ, गैस बन रही है, सीने में जलन है, कमर में दर्द है और मोबाइल पर पहले से ही अस्पतालों, दवाइयों और जांचों के विज्ञापन दिखाई दे रहे हैं।

यह केवल किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की दिनचर्या बन चुकी है।

आज घर-घर में कोई न कोई व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित है, कोई उच्च रक्तचाप की दवा खा रहा है, कोई थायरॉयड की गोली रोज ले रहा है, किसी को जोड़ों का दर्द है, कोई मानसिक तनाव से जूझ रहा है, कोई नींद की गोलियों पर निर्भर है और कोई बार-बार अस्पतालों के चक्कर लगा रहा है।

एक समय था जब गांवों में सौ वर्ष तक जीवित रहने वाले बुजुर्ग मिल जाते थे। खेतों में काम करने वाले किसान, जंगलों में रहने वाले आदिवासी, मिट्टी के घरों में रहने वाले परिवार और सादा भोजन करने वाले लोग आज की तुलना में कई मायनों में अलग जीवन जीते थे। उस समय आधुनिक अस्पताल नहीं थे, महंगी मशीनें नहीं थीं, लेकिन लोग प्रकृति के अधिक निकट थे। इसका अर्थ यह नहीं कि उस समय कोई बीमार नहीं पड़ता था, बल्कि यह कि जीवनशैली, वातावरण और चिकित्सा व्यवस्था अलग थी।

आज की बदलती जीवनशैली में खान-पान भी शारीरिक बीमारियों का एक बड़ा कारण बनकर सामने आया है। पहले लोग घर का ताजा, सादा और मौसमी भोजन करते थे, लेकिन अब उसकी जगह फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों ने ले ली है। मोमोज, मंचूरियन, चाउमीन, पिज्जा, बर्गर और अन्य तले-भुने व्यंजन आज बच्चों से लेकर युवाओं तक की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। इनमें अक्सर मैदे, अधिक तेल, नमक, कृत्रिम स्वाद बढ़ाने वाले पदार्थों तथा कई प्रकार के सॉस और गाढ़ी ग्रेवी का उपयोग किया जाता है। कई स्थानों पर ग्रेवी को गाढ़ा करने के लिए अरारोट या अन्य पदार्थ भी मिलाए जाते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों का बार-बार और अधिक मात्रा में सेवन पाचन संबंधी समस्याओं, मोटापे तथा मधुमेह और हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोगों के जोखिम को बढ़ाने वाले कारणों में माना जाता है। इसी प्रकार मांसाहारी भोजन को अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए अत्यधिक मसालों, तेल और तली हुई विधियों का उपयोग भी कई लोगों की पाचन क्षमता और समग्र स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, विशेषकर जब उसका सेवन संतुलित मात्रा से अधिक किया जाए।

इसके साथ ही हमारी भोजन संस्कृति भी तेजी से बदल रही है। प्रकृति ने प्रत्येक मौसम के अनुसार अलग-अलग फल, सब्जियां और अनाज उपलब्ध कराए हैं, ताकि शरीर को उसी मौसम के अनुरूप आवश्यक पोषण मिल सके। पहले आम केवल गर्मियों में, संतरा सर्दियों में और अनेक साग-सब्जियां अपने निर्धारित मौसम में ही मिलती थीं। आज आधुनिक खेती, भंडारण और परिवहन की सुविधाओं के कारण लगभग 12 माह हर मौसम में हर प्रकार के अधिकांश फल और सब्जियां बाजार में उपलब्ध हैं। अधिक उत्पादन और शीघ्र लाभ की होड़ में कई बार रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा अन्य कृषि रसायनों का अत्यधिक उपयोग किए जाने की चिंताएं भी सामने आती रहती हैं। यदि इनका उपयोग सुरक्षित मानकों के अनुरूप न हो, तो यह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। विशेषज्ञ आज भी मौसमी, ताजा, संतुलित और प्राकृतिक भोजन को बेहतर स्वास्थ्य का आधार मानते हैं। जब मनुष्य प्रकृति की लय से दूर होकर केवल स्वाद, सुविधा और त्वरित लाभ को प्राथमिकता देने लगता है, तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे शरीर पर दिखाई देने लगता है। यही छोटी-छोटी आदतें समय के साथ अनेक शारीरिक बीमारियों की पृष्ठभूमि तैयार कर सकती हैं।

आज विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। हृदय प्रत्यारोपण से लेकर रोबोटिक सर्जरी तक, कृत्रिम अंगों से लेकर जीन अनुसंधान तक, चिकित्सा विज्ञान लगातार आगे बढ़ रहा है। फिर भी एक सवाल पहले से अधिक बड़ा होकर सामने खड़ा है

आखिर क्यों पड़ता है आदमी बीमार ?

क्या बीमारी केवल शरीर में पैदा होती है?

क्या उसकी शुरुआत पेट से होती है?

क्या मन भी शरीर को बीमार कर सकता है?

क्या हमारी बदलती जीवनशैली ही सबसे बड़ी बीमारी बन चुकी है?

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए हमें तीन प्रमुख चिकित्सा पद्धतियों -आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी – को समझना होगा।

रोग आखिर आता कहां से है?

दुनिया की लगभग सभी चिकित्सा पद्धतियां इस बात से सहमत हैं कि कोई भी बीमारी अचानक नहीं आती। उसके पीछे कई कारण होते हैं।

शरीर महीनों और वर्षों तक संकेत देता रहता है। कभी भूख कम लगती है, कभी नींद खराब होती है, कभी पाचन बिगड़ता है, कभी बार-बार थकान महसूस होती है, कभी चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। अधिकांश लोग इन संकेतों को नजरअंदाज करते रहते हैं। धीरे-धीरे यही छोटी-छोटी समस्याएं बड़ी बीमारियों का रूप ले सकती हैं।

 क्या कहता है आयुर्वेद ?

आयुर्वेद के अनुसार अधिकांश रोगों की जड़ कमजोर पाचन शक्ति (अग्नि) और वात, पित्त तथा कफ के असंतुलन में मानी जाती है।

जब भोजन समय पर नहीं होता, अत्यधिक तला-भुना, बासी या असंतुलित भोजन लिया जाता है, पर्याप्त नींद नहीं मिलती और दिनचर्या बिगड़ जाती है, तब पाचन शक्ति प्रभावित हो सकती है।

आयुर्वेद के अनुसार इससे ‘आम’ नामक अवस्था बन सकती है, अर्थात भोजन का पूर्ण पाचन न होना। आयुर्वेद मानता है कि यह शरीर के संतुलन को प्रभावित कर विभिन्न रोगों के विकास में भूमिका निभा सकती है।

क्या है वात, पित्त और कफ ?

आयुर्वेद शरीर को तीन मूलभूत कार्यात्मक सिद्धांतों “वात, पित्त और कफ” के संतुलन पर आधारित मानता है।

वात – वात को शरीर की गति का आधार माना गया है। श्वास लेना, रक्त का प्रवाह, नसों के संदेश, मांसपेशियों की गतिविधि, मल-मूत्र का निष्कासन इन सभी कार्यों को आयुर्वेद वात से जोड़कर देखता है।

जब वात असंतुलित होता है तो गैस, कब्ज, जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, घुटनों की समस्या, अनिद्रा, चिंता, हाथ-पैरों में झुनझुनी और शरीर में सूखापन जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं।

पित्त – पित्त को शरीर की पाचन और चयापचय प्रक्रिया से जोड़ा जाता है। भोजन को ऊर्जा में बदलना, शरीर का तापमान नियंत्रित रखना और पाचन क्रिया में सहायता करना पित्त के कार्य माने जाते हैं।

इसके असंतुलन से अम्लता, सीने में जलन, मुंह के छाले, त्वचा की कुछ समस्याएं और अधिक चिड़चिड़ापन जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

कफ – कफ शरीर को मजबूती, स्थिरता और पोषण देने वाला तत्व माना जाता है। कफ बढ़ने पर शरीर में भारीपन, आलस्य, मोटापा, बलगम, बार-बार सर्दी-जुकाम और कुछ प्रकार की एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

आयुर्वेद का मानना है कि जब तक वात, पित्त और कफ संतुलित रहते हैं, शरीर स्वस्थ रहता है।

क्या केवल पेट से ही बीमारी शुरू होती है?

आयुर्वेद पाचन तंत्र को स्वास्थ्य का केंद्र मानता है।

दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक विज्ञान भी आज गट हेल्थ (आंतों के स्वास्थ्य) को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। शोध बताते हैं कि आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीव पाचन, प्रतिरक्षा प्रणाली और स्वास्थ्य के कई पहलुओं को प्रभावित करते हैं।

हालांकि आधुनिक चिकित्सा यह नहीं मानती कि सभी बीमारियां केवल पेट से ही शुरू होती हैं। संक्रमण, आनुवंशिक कारण, हार्मोन, प्रदूषण, उम्र, जीवनशैली और अन्य कई कारण भी रोगों के विकास में भूमिका निभाते हैं।

बीमार शरीर से पहले बीमार होता है मन

एक व्यक्ति दिनभर खुश रहता है, समय पर भोजन करता है, हंसता है, परिवार के साथ समय बिताता है और रात को गहरी नींद सो जाता है।

दूसरा व्यक्ति हर समय तनाव में रहता है। उसे कर्ज की चिंता, नौकरी का दबाव, बच्चों का भविष्य, महंगाई, मोबाइल की लत, देर रात तक जागना, सुबह बिना नाश्ता किए घर से निकल जाना।

मोबाइल का बढ़ता नशा : हथेली में सिमटती दुनिया, बिगड़ता स्वास्थ्य

मोबाइल की बढ़ती लत भी आज एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौती बन चुकी है। यह समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में भी बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों तक तेजी से फैल रही है। घंटों तक लगातार मोबाइल देखने से आंखों पर दबाव, गर्दन और कमर में दर्द, सिरदर्द, अनिद्रा, मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी, याददाश्त पर असर और शारीरिक गतिविधियां घटने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत शरीर की जैविक घड़ी को भी प्रभावित करती है, जिससे कई लोगों में मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। यदि समय रहते इस आदत पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह आने वाली पीढ़ियों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

क्या यह सब केवल मन को प्रभावित करता है? नहीं।

लगातार तनाव शरीर में हार्मोनल बदलाव ला सकता है, नींद खराब कर सकता है, रक्तचाप बढ़ा सकता है और पाचन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।

आज डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि दवा के साथ-साथ तनाव कम करना, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन भी अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।

बीमारी केवल शरीर में अचानक पैदा नहीं होती, बल्कि हमारी दिनचर्या, खान-पान, मानसिक तनाव, प्रकृति से बढ़ती दूरी और जीवनशैली में आए बदलाव धीरे-धीरे उसके लिए जमीन तैयार करते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने उपचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं, वहीं आयुर्वेद हजारों वर्षों से स्वस्थ जीवनशैली और रोगों की रोकथाम पर बल देता आया है। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि स्वस्थ रहने के लिए केवल दवाइयों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं, बल्कि संतुलित भोजन, नियमित दिनचर्या, मानसिक शांति और प्रकृति के साथ सामंजस्य भी उतना ही जरूरी है।

(क्रमशः – अगले अंक भाग 2 में पढ़िए)

आयुर्वेद का 5000 वर्षों का इतिहास, भगवान धन्वंतरि, महर्षि चरक और सुश्रुत, जड़ी-बूटियों का अद्भुत संसार, गिलोय से लेकर अश्वगंधा तक, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता, पंचमहाभूत, अग्नि, आम और आयुर्वेद क्यों आज भी पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रहा है।

प्रदीप मिश्रा

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