केवड़े का सुगंधित पौधा मानव सभ्यता से भी पुराना, हिमालय के निर्माण से पहले से भारत में मौजूद होने के मिले प्रमाण
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नई दिल्ली
By ACGN 7647981711, 9303948009
असम के माकुम कोयला क्षेत्र से मिले 2.4 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्मों ने खोला प्राचीन वनस्पति इतिहास का नया अध्याय, भारत को बताया गया उष्णकटिबंधीय पौधों का महत्वपूर्ण शरणस्थल
नई दिल्ली ACGN:- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, अपनी मनमोहक सुगंध, धार्मिक महत्व और औषधीय उपयोगों के लिए प्रसिद्ध केवड़े का पौधा भारतीय उपमहाद्वीप में कम से कम 2.4 करोड़ वर्ष (24 मिलियन वर्ष) से मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पौधा न केवल मानव सभ्यता से लाखों वर्ष पुराना है, बल्कि हिमालय के निर्माण से पहले भी भारत की धरती पर मौजूद था। यह महत्वपूर्ण खोज पूर्वोत्तर राज्य असम के माकुम कोयला क्षेत्र से प्राप्त जीवाश्म पत्तियों के अध्ययन के बाद सामने आई है।

यह अध्ययन प्राचीन पादप वंशों के संरक्षण, वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौरान जैव विविधता के विकास तथा भविष्य में पारिस्थितिकी तंत्रों की संभावित प्रतिक्रियाओं को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत ने करोड़ों वर्षों तक ऐसे अनेक प्राचीन पौधों को सुरक्षित रखने वाले प्राकृतिक शरणस्थल की भूमिका निभाई है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन को अंजाम दिया। शोधकर्ता हर्षिता भाटिया और गौरव श्रीवास्तव ने असम के माकुम कोयला क्षेत्र की टिका पर्वत संरचना से लगभग 24 मिलियन वर्ष पुराने चार अत्यंत संरक्षित जीवाश्म पत्तों को एकत्रित किया। इन जीवाश्मों का विस्तृत रूपात्मक तथा सूक्ष्मदर्शी विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि ये जीवाश्म आधुनिक केवड़ा पौधे की पत्तियों से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाते हैं। इनमें लंबी तलवार जैसी पत्तियां, समानांतर शिराएं, किनारों पर नुकीले कांटे तथा पैंडानेसी कुल की अन्य सभी विशिष्ट विशेषताएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। वैज्ञानिकों ने इनकी तुलना हर्बेरियम में सुरक्षित आधुनिक केवड़ा प्रजातियों तथा विश्व के विभिन्न देशों से प्राप्त जीवाश्म अभिलेखों से भी की। विस्तृत तुलना के बाद पुष्टि हुई कि ये जीवाश्म वास्तव में पैंडानेसी कुल के ही हैं।

कुल की विशेषताएँ सीमांत कांटे (काले तीर), एम-आकार का अनुप्रस्थ काट और मध्य शिरा (पीले तीर) दिखाई दे रहे हैं। स्केल बार: 1 सेमी, जब तक अन्यथा निर्दिष्ट न हो।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह खोज इस बात का प्रमाण है कि केवड़ा परिवार के पौधे मनुष्यों के पृथ्वी पर आने से लाखों वर्ष पहले भारत में विकसित हो चुके थे। इस अध्ययन में भूविज्ञान, पुरावनस्पति विज्ञान और प्राचीन जलवायु संबंधी साक्ष्यों को एक साथ जोड़कर इस पौधे के विकासवादी इतिहास तथा उस समय के पर्यावरण का पुनर्निर्माण भी किया गया।

वैज्ञानिकों ने बताया कि वर्तमान समय में पैंडनस (केवड़ा) मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित है। हालांकि, यूरोप और उत्तरी अमेरिका से प्राप्त 8.5 करोड़ से 6.6 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म प्रमाण बताते हैं कि यह पौधा कभी पूरे उत्तरी गोलार्ध में व्यापक रूप से फैला हुआ था। लगभग 3.4 करोड़ वर्ष पहले वैश्विक जलवायु में ठंड बढ़ने के बाद यह पौधा धीरे-धीरे अनेक क्षेत्रों से समाप्त हो गया और अंततः केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित रह गया।

असम से प्राप्त नए जीवाश्म इस धारणा को और मजबूत करते हैं कि भारत उस समय इन प्राचीन पौधों के लिए एक सुरक्षित शरणस्थल था, जहां यह वंश जीवित रहा जबकि दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों से विलुप्त हो गया। यह खोज यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पुराने जीवाश्म अभिलेखों तथा उष्णकटिबंधीय एशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के नए अभिलेखों के बीच महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कड़ी भी स्थापित करती है।

यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जियोबियोस में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से उष्णकटिबंधीय पौधों के विकास, भारतीय जैव विविधता के इतिहास तथा अतीत में जलवायु परिवर्तन के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया को समझने में नई दिशा मिलेगी। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि केवड़ा भारतीय वनस्पति का हालिया हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप की जैविक विरासत का अभिन्न अंग रहा है।
प्रदीप मिश्रा
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