आवंटन की जमीन पर बाहरी कब्जा, पुनर्वास योजना बनी मुनाफे का जरिया
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रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
By ACGN | 7647981711, 9303948009
संवाददाता संजय जेठवानी
दुर्गापुर खदान क्षेत्र में विस्थापितों की भूमि के नामांतरण और उपयोग परिवर्तन को लेकर उठे संदेह
धरमजयगढ़ क्षेत्र से सामने आई यह कहानी केवल जमीन के लेन-देन की नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की परतें खोलती है जिसमें गरीब विस्थापितों के हक की जमीन अब प्रभावशाली और बाहरी लोगों के हाथों में पहुंचती जा रही है। जिन खेतों को कभी बंगाली शरणार्थियों को उनकी रोजी-रोटी और सम्मानजनक जीवन के लिए दिया गया था, वही आज सौदेबाजी और मुनाफे का माध्यम बनते दिखाई दे रहे हैं।
सरकार ने धरमजयगढ़, बायसी, शाहपुर, सागरपुर और बायसी कॉलोनी जैसे इलाकों में विस्थापित परिवारों को बसाने के उद्देश्य से जमीन आवंटित की थी। यह जमीनें सिर्फ खेती और जीविकोपार्जन के लिए थीं, ताकि शरणार्थी परिवार आत्मनिर्भर बन सकें। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था कमजोर पड़ती गई और अब स्थिति यह है कि जिन लोगों के नाम पर जमीन थी, उनके स्थान पर दूसरे लोगों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो चुके हैं।
उपलब्ध जानकारी और स्थानीय स्रोतों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार, इन आवंटित जमीनों में से कुछ पर अब मूल लाभार्थियों के स्थान पर अन्य व्यक्तियों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज होने की बात सामने आई है। उल्लेखनीय है कि आवंटन की शर्तों के अनुसार ऐसी भूमि न तो बेची जा सकती है और न ही किसी अन्य के नाम स्थानांतरित की जा सकती है। यदि लाभार्थी भूमि का उपयोग नहीं करता या क्षेत्र छोड़ देता है, तो संबंधित भूमि शासन के खाते में वापस समाहित की जानी चाहिए।
इसी संदर्भ में बायसी क्षेत्र की कुछ विशिष्ट जमीनों का उल्लेख किया जा रहा है। उदाहरण स्वरूप, खसरा नंबर 80/1/क/26 (रकबा लगभग 0.4850 हेक्टेयर) तथा खसरा नंबर 80/1/क/23 (रकबा लगभग 0.809 हेक्टेयर) के संबंध में यह जानकारी सामने आई है कि इन पर वर्तमान में अन्य व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं। इन नामांतरणों की प्रक्रिया, वैधानिकता और संबंधित अभिलेखों की स्थिति की पुष्टि राजस्व अभिलेखों एवं सक्षम अधिकारियों द्वारा जांच के उपरांत ही स्पष्ट हो सकेगी।
मामले को और गंभीर बनाता है तमनार क्षेत्र के बजरमुड़ा गांव से जुड़े नामों का सामने आना। जानकारी के अनुसार, बजरमुड़ा के कुछ लोगों ने धरमजयगढ़ की आवंटन भूमि को अपने नाम करवा लिया। बायसी क्षेत्र की जमीन, जो कभी विस्थापितों के हिस्से में थी, अब युगेश कुमार नायक और चुन्नीलाल पटेल जैसे लोगों के नाम दर्ज हो चुकी है। यह नामांतरण कैसे हुआ, क्या विधिवत रजिस्ट्री के जरिए या प्रशासनिक स्तर पर सीधे, यह अब जांच का विषय बन गया है।
यह क्षेत्र एसईसीएल की दुर्गापुर कोल माइंस परियोजना के प्रभाव क्षेत्र में आता है, जिसके कारण भूमि के उपयोग और मूल्य में समय के साथ परिवर्तन हुआ है। ऐसे परिदृश्य में भूमि से संबंधित गतिविधियों पर प्रशासनिक सतर्कता अपेक्षित होती है।
राजस्व विभाग की भूमिका यहां सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। नियम स्पष्ट कहते हैं कि आवंटन भूमि को न तो बेचा जा सकता है और न ही बिना अनुमति के किसी अन्य व्यक्ति के नाम किया जा सकता है। यदि मूल लाभार्थी उस क्षेत्र को छोड़ देता है, तो जमीन शासन के खाते में वापस जानी चाहिए। लेकिन धरमजयगढ़ में इन नियमों को दरकिनार कर दिया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि केवल नामांतरण ही नहीं हुआ, बल्कि इन जमीनों का डायवर्सन भी करा लिया गया। यानी जो जमीन खेती के लिए दी गई थी, उसे औद्योगिक उपयोग के लिए परिवर्तित कर दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया बिना प्रशासनिक मिलीभगत के संभव नहीं मानी जा रही।
सूत्र बताते हैं कि यह मामला केवल एक-दो लोगों तक सीमित नहीं है। लैलूंगा और आसपास के क्षेत्रों के कुछ अन्य लोगों के नाम भी इन आवंटन जमीनों पर दर्ज किए गए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह एक सुनियोजित पैटर्न का हिस्सा हो सकता है।
धरमजयगढ़ में सामने आया यह घटनाक्रम अब एक संभावित भू-अर्जन घोटाले का रूप लेता दिख रहा है, जहां नियमों की अनदेखी कर सरकारी जमीन को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया। इस पूरे मामले ने न केवल प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि किस तरह से कमजोर वर्गों के अधिकार धीरे-धीरे खत्म किए जा रहे हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी, क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सामने आएगी और क्या उन विस्थापित परिवारों को उनका हक वापस मिल पाएगा जिनके नाम पर यह जमीन कभी दी गई थी।
अभी के लिए इतना साफ है कि धरमजयगढ़ की यह जमीन केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था की सच्चाई का आईना बन चुकी है, और इस आईने में जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह बेहद चिंताजनक है।
जनहित को ध्यान में रखते हुए अपेक्षा की जा रही है कि संबंधित प्रकरणों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जाए, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके और यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके। साथ ही, मूल लाभार्थियों के अधिकारों की स्थिति का भी परीक्षण किया जाना आवश्यक माना जा रहा है।
यह समाचार उपलब्ध जानकारी, स्थानीय चर्चाओं एवं प्रारंभिक तथ्यों पर आधारित है। अंतिम स्थिति संबंधित विभागीय जांच और आधिकारिक अभिलेखों के परीक्षण के पश्चात ही स्पष्ट होगी।
जांच जारी है, और जांच के उपरांत ही तथ्यात्मक स्थिति सामने आएगी।
प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित में समर्पित पत्रकारिता अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
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