“पोस्टर, प्रचार और चापलूसी की राजनीति में दबती कार्यकर्ताओं की मेहनत”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ साप्ताहिक विशेषांक
✍️ ‘कलम की धार’ ✍️
By ACGN 7647981711, 9303948009
जनहित, तथ्य और साहस का साप्ताहिक मंच-जहाँ सच कहा जाता है, सवाल पूछे जाते हैं, और कीमत जानकर भी कलम नहीं रुकती।
‘कलम की धार’ कोई औपचारिक कॉलम नहीं, बल्कि व्यवस्था के मौन को तोड़ने वाली आवाज़ है।पत्रकारिता का उद्देश्य केवल घटनाओं की सूचना देना नहीं होता, बल्कि समय-समय पर समाज और राजनीति के सामने सच्चाई का आईना भी रखना होता है। इसी सोच के साथ अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार” उन विषयों को उठाता है जिन पर अक्सर चर्चा कम होती है, लेकिन जिनका प्रभाव लोकतंत्र और समाज पर गहरा पड़ता है।
आज की “कलम की धार” राजनीति के भीतर उभरती एक ऐसी प्रवृत्ति पर केंद्रित है, जिसे जमीनी कार्यकर्ता हर दिन महसूस करते हैं
आज का विषय :- “राजनीति में कार्यकर्ता बनाम चापलूस संस्कृति : पोस्टर, प्रचार और जनसेवा के बीच की सच्चाई”
आलेख प्रदीप मिश्रा
राजनीति का मूल उद्देश्य
राजनीति का मूल अर्थ है जनसेवा, समाज सेवा और राष्ट्र सेवा, यह वह मार्ग है जहां व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज के लिए काम करता है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी इसी सिद्धांत पर खड़ी है कि जनता की आवाज़ सत्ता तक पहुंचे और समाज का विकास हो। लेकिन वर्तमान समय में राजनीति के भीतर कुछ ऐसी प्रवृत्तियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं जो इस मूल भावना को कमजोर करती नजर आती हैं।
क्या आज की राजनीति सच में जनसेवा, समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के मूल उद्देश्य पर चल रही है, या फिर स्वार्थ और दिखावे की बढ़ती प्रवृत्तियाँ इस मूल भावना को धीरे-धीरे कमजोर कर रही हैं?
राजनीति की असली ताकत : जमीनी कार्यकर्ता
किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके बड़े नेता नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ता होते हैं, ये वही कार्यकर्ता होते हैं जो विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति से जुड़ते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, पार्टी की नीतियों को जनता तक पहुंचाते हैं, जनता की समस्याओं को नेतृत्व तक पहुंचाते हैं, ये लोग मंच पर कम दिखाई देते हैं, लेकिन संगठन की रीढ़ इन्हीं के कंधों पर टिकी होती है। गांवों की गलियों में, छोटे कस्बों के चौक-चौराहों पर, जनसभाओं में व्यवस्था संभालते हुए, यही कार्यकर्ता राजनीति की असली तस्वीर होते हैं।
क्या आज के नेता वास्तव में जमीनी कार्यकर्ताओं की बात सुनते हैं, या फिर मंच और प्रचार की भीड़ में वही कार्यकर्ता अनदेखे रह जाते हैं जिनके कंधों पर संगठन की असली ताकत टिकी होती है?
विचारधारा से प्रेरित समर्पित कार्यकर्ता
एक सच्चा कार्यकर्ता केवल पद या पहचान के लिए काम नहीं करता,वह काम करता है क्योंकि उसे पार्टी की विचारधारा पर विश्वास होता है, उसे समाज के विकास की चिंता होती है, उसे अपने क्षेत्र और देश के भविष्य की परवाह होती है ऐसे कार्यकर्ता हमेशा तन, मन और धन से संगठन के लिए समर्पित रहते हैं, वे अपने समय, अपनी मेहनत और कई बार अपनी निजी सुविधा तक का त्याग कर देते हैं, ताकि पार्टी मजबूत हो और जनता तक उसकी नीतियां पहुंच सकें।
जब विचारधारा से प्रेरित समर्पित कार्यकर्ता तन-मन-धन से संगठन के लिए काम करते हैं और अपनी निजी सुविधाओं का त्याग कर पार्टी की नीतियों को जनता तक पहुँचाते हैं, तो क्या राजनीतिक दल और उनका शीर्ष नेतृत्व ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ताओं के त्याग, मेहनत और समर्पण को वास्तव में पहचानते और सम्मान देते हैं?
जनता और नेतृत्व के बीच सेतु
समर्पित कार्यकर्ता केवल प्रचारक नहीं होते, बल्कि वे जनता और नेतृत्व के बीच एक सेतु होते हैं,वे गांवों और मोहल्लों में जाकर लोगों की समस्याएं सुनते हैं, वे गरीब, मजदूर और आम नागरिक की आवाज बनते हैं, कई बार जनता अपनी समस्याएं सीधे नेताओं तक नहीं पहुंचा पाती, ऐसे में वही कार्यकर्ता उन समस्याओं को आगे बढ़ाते हैं, यानी लोकतंत्र में कार्यकर्ता केवल संगठन का हिस्सा नहीं, बल्कि जनता की आवाज का प्रतिनिधि होता है।
जब जमीनी कार्यकर्ता ही जनता और नेतृत्व के बीच सबसे महत्वपूर्ण सेतु होते हैं, तो क्या राजनीतिक दल और नेता वास्तव में उनकी बात और उनके माध्यम से उठाई गई जनता की समस्याओं को गंभीरता से सुनते और समाधान करते हैं?
जब चापलूसी सक्रियता पर भारी पड़ने लगे
समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी
किसी भी राजनीतिक संगठन की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं। यही वे लोग हैं जो वर्षों तक बिना किसी पद, पहचान या प्रचार की इच्छा के संगठन की विचारधारा को समाज तक पहुंचाते हैं। वे गांव-गांव जाते हैं, लोगों की समस्याएं सुनते हैं, कठिन परिस्थितियों में भी संगठन का साथ नहीं छोड़ते और अपने समय, श्रम और संसाधन तक संगठन के लिए समर्पित कर देते हैं।
लेकिन आज कई बार यह देखने को मिलता है कि ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं को धीरे-धीरे किनारे कर दिया जाता है और उनकी जगह ऐसे लोग सक्रिय दिखाई देने लगते हैं जिनका संगठन से जुड़ाव अचानक और सतही होता है। इससे उन कार्यकर्ताओं के मन में निराशा पैदा होती है जिन्होंने वर्षों तक बिना किसी स्वार्थ के संगठन को मजबूत किया है।
क्या पारदर्शिता और संगठन की मजबूती की बात करने वाले शीर्ष नेता यह बता सकते हैं कि वर्षों से संघर्ष कर रहे समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी आखिर क्यों हो रही है?
नेताओं के आसपास दिखने की राजनीति
आज राजनीति में एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, नेताओं के आसपास दिखाई देने की राजनीति। कई लोग कार्यक्रमों में मंच के पीछे खड़े रहते हैं, नेताओं के साथ फोटो खिंचवाते हैं और बाद में उसी फोटो को प्रचार का माध्यम बनाकर खुद को प्रभावशाली कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं।
लेकिन यहां एक गंभीर सवाल यह भी है कि जो व्यक्ति किसी नेता के साथ फोटो या पोस्टर में दिखाई दे रहा है, उसकी अपने क्षेत्र में क्या छवि है? उसके संस्कार, उसका व्यवहार और समाज में उसकी प्रतिष्ठा कैसी है, क्या इन बातों की कभी जांच या विचार किया जाता है?
क्या नेताओं ने कभी यह जानने की कोशिश की है कि उनके साथ फोटो में दिखने वाले लोगों की अपने क्षेत्र में वास्तविक छवि और सामाजिक प्रतिष्ठा कैसी है?
चापलूसी और सत्ता के नाम पर कमाई का खेल
कई बार यह भी देखने में आता है कि कुछ चापलूस लोग नेताओं या मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवाकर उसका गलत इस्तेमाल करने लगते हैं। वे आम जनता के बीच यह संदेश फैलाते हैं कि उनकी सीधी पहुंच मंत्री या बड़े नेताओं तक है। इसके बाद वे लोगों से ट्रांसफर कराने, काम करवाने या प्रशासन पर दबाव बनाने के नाम पर पैसे तक वसूलने लगते हैं,कई बार तो ऐसे लोग अधिकारियों या आम नागरिकों को यह कहकर धमकाने की भी कोशिश करते हैं कि उनका सीधा संपर्क मंत्री या बड़े नेता से है। इस तरह की गतिविधियां न केवल राजनीति की गरिमा को नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि उस नेता की छवि को भी प्रभावित करती हैं जिनके नाम का इस्तेमाल किया जा रहा होता है।
क्या जिम्मेदार नेता यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके नाम और फोटो का इस्तेमाल जनता से पैसे वसूलने या दबाव बनाने के लिए न किया जाए?
नेताओं तक पहुंचती मनगढ़ंत बातें
एक और गंभीर स्थिति तब बनती है जब ऐसे चापलूस लोग नेताओं के पास पहुंचकर मनगढ़ंत कहानियां और आधी-अधूरी जानकारी प्रस्तुत करते हैं। वे कई बार समर्पित कार्यकर्ताओं या आम लोगों के बारे में गलत बातें बताकर नेताओं को भड़काने की कोशिश करते हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि सच्चाई से दूर बैठा नेतृत्व कई बार गलत धारणा बना लेता है और वास्तविक रूप से काम करने वाले लोग ही संदेह के घेरे में आ जाते हैं। इससे संगठन के भीतर विश्वास और पारदर्शिता कमजोर होती है।
क्या नेताओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि उनके आसपास पहुंचने वाली हर बात सच्ची हो यह जरूरी नहीं है?
पोस्टर और फ्लेक्स की दिखावटी सक्रियता
आज किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम के पहले शहरों और कस्बों में बड़े-बड़े पोस्टर और फ्लेक्स दिखाई देने लगते हैं। इन पोस्टरों में कई लोग अपनी तस्वीरें नेताओं के साथ लगाकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे संगठन के बड़े चेहरे हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि पोस्टर और प्रचार से संगठन मजबूत नहीं होता, बल्कि जनता के बीच जाकर किए गए कार्य से संगठन मजबूत होता है।
क्या संगठन के शीर्ष नेता यह तय करेंगे कि राजनीति का मूल्यांकन पोस्टरों से होगा या जनता के बीच किए गए वास्तविक कार्यों से?
दिखावे की राजनीति का सच
जो पोस्टर आज चौराहों पर चमकते हैं, वही कुछ दिनों बाद फट जाते हैं, बारिश में भीग जाते हैं और अंततः कूड़े में पहुंच जाते हैं। यह दृश्य यह भी बताता है कि दिखावे की राजनीति की उम्र बहुत लंबी नहीं होती। जनता अंततः उसी को याद रखती है जिसने उसके सुख-दुख में साथ दिया हो।
क्या जिम्मेदार नेता यह समझ पाए हैं कि जनता को प्रचार नहीं बल्कि सेवा और परिणाम चाहिए?
सत्ता तक पहुंचने में जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका
आज कई राजनीतिक दल सत्ता में हैं और सरकार चला रहे हैं। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि किसी भी दल को सत्ता तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका जमीनी कार्यकर्ताओं की होती है। वही कार्यकर्ता चुनाव के समय घर-घर जाते हैं, लोगों को संगठन की नीतियां समझाते हैं और जनता का विश्वास जीतने में योगदान देते हैं।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या आज फोटो और प्रचार की राजनीति करने वाले लोग ही संगठन की पहचान बनेंगे, या फिर वे कार्यकर्ता जिन्हें वास्तव में संगठन को मजबूत बनाने का श्रेय जाता है?
क्या नेताओं ने कभी गंभीरता से यह सोचा है कि आज उनकी पार्टी सत्ता में है तो यह किन जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण का परिणाम है?
दूसरे दलों से आए नेताओं को सम्मान
आज कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि दूसरे दलों से आए लोगों को तुरंत संगठन में पद और जिम्मेदारी मिल जाती है, जबकि वही लोग कभी उसी विचारधारा के विरोधी रहे होते हैं। दूसरी ओर वर्षों से उसी विचारधारा के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता इंतजार करते रह जाते हैं।
क्या दल के शीर्ष नेता यह स्पष्ट करेंगे कि विचारधारा के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता अधिक महत्वपूर्ण हैं या अवसर देखकर दल बदलने वाले लोग?
क्या करना चाहिए राजनीतिक दलों और नेताओं को?
जमीनी कार्यकर्ताओं का सम्मान और पहचान सुनिश्चित की जाए।
पद और जिम्मेदारी कार्य और निष्ठा के आधार पर दी जाए, न कि केवल दिखावे के आधार पर।
नेताओं के नाम और फोटो के दुरुपयोग पर सख्त नियंत्रण रखा जाए।
जो लोग जनता से पैसे वसूलने या दबाव बनाने का काम करते हैं, उन पर स्पष्ट कार्रवाई हो।
नेताओं को सीधे जमीनी कार्यकर्ताओं और जनता से संवाद बढ़ाना चाहिए।
संगठन में अवसरवाद के बजाय विचारधारा और समर्पण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस लेख का उद्देश्य किसी दल या नेता के खिलाफ नहीं बल्कि वर्तमान की परस्थितियों से रूबरू करवाना है और यह बताना कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी भी है। किसी भी दल की असली ताकत उसके हजारों-लाखों जमीनी कार्यकर्ता होते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के संगठन को मजबूत बनाने में लगे रहते हैं।
यदि चापलूसी, दिखावा और स्वार्थ राजनीति पर हावी हो जाते हैं तो इससे न केवल संगठन कमजोर होता है बल्कि जनता का विश्वास भी कम होने लगता है। इसलिए आज राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे आत्ममंथन करें, सच्चे कार्यकर्ताओं की पहचान करें और ऐसे लोगों से दूरी बनाएं जो राजनीति को केवल व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बनाते हैं।
क्योंकि अंततः राजनीति में न पोस्टर इतिहास लिखते हैं और न ही दिखावा – इतिहास हमेशा जनता और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत और विश्वास से बनता है।
लेखक : प्रदीप मिश्रा
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