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तानाखार में शासकीय जमीन पर कब्जे का खेल! पेड़ों की कटाई पर वन विभाग मौन, राजस्व प्रशासन भी सवालों के घेरे में

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

कटघोरा–अंबिकापुर मुख्य मार्ग किनारे 1.619 हेक्टेयर भूमि पर कब्जे की कोशिश, प्रभावशाली लोगों के आगे प्रशासन की कार्रवाई पर उठे सवाल

कोरबा। जिले के विकासखंड पौड़ी उपरोड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत तानाखार में शासकीय भूमि पर कथित अतिक्रमण और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कटघोरा–अंबिकापुर मुख्य मार्ग के किनारे हाई स्कूल और नवनिर्मित छात्रावास के पास स्थित लगभग 1.619 हेक्टेयर शासकीय भूमि पर कब्जा करने की कोशिश किए जाने का आरोप लग रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि इस भूमि पर घेराबंदी कर कब्जा जमाने की तैयारी की जा रही है और इसके लिए साल सहित कई हरे-भरे वृक्षों को काटा जा रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पूरे मामले में वन विभाग अब तक चुप्पी साधे हुए है।


ग्रामीणों के अनुसार कटघोरा निवासी विजय अग्रवाल पिता रामविलास अग्रवाल द्वारा उक्त जमीन बाउंड्री बनाकर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों द्वाराविरोध किए जाने पर उन्होंने दावा किया कि यह भूमि उन्हें वर्ष 1970 – 75 में वन अधिकार के तहत प्राप्त हुई है और उसी आधार पर वे जमीन पर अपना अधिकार जता रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस दावे के समर्थन में उन्होंने एक नक्शा भी दिखाया है, जिसमें तानाखार क्षेत्र खसरा क्रमांक 174/1 तहसील पोडी उपरोड़ा राजस्व निरीक्षक पोडी उपरोड़ा/02  ग्राम तानाखार की भूमि उनके नाम बताई जा रही है।


हालांकि दूसरी ओर ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है उक्त तानाखार क्षेत्र खसरा क्रमांक 174/1 तहसील पोडी उपरोड़ा राजस्व निरीक्षक पोडी उपरोड़ा/02 की भूमि का राजस्व अभिलेखों और सरकारी रिकॉर्ड की जांच करने पर यह भूमि शासकीय दर्ज है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि जमीन शासकीय है तो उस पर घेराबंदी और कब्जे की प्रक्रिया कैसे चल रही है और प्रशासन अब तक मूकदर्शक क्यों बना हुआ है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह भूमि वास्तव में वन अधिकार के तहत दी गई थी तो पिछले लगभग पांच दशकों तक उस पर किसी प्रकार का कब्जा क्यों नहीं किया गया। जैसे ही मुख्य मार्ग और आसपास के क्षेत्रों में विकास कार्य शुरू हुए, अचानक जमीन पर दावा ठोकना कई संदेहों को जन्म देता है।

मामले का एक और पहलू यह भी है कि इसी भूमि पर गांव के निवासी खेलन राम उर्फ मोनू कई वर्षों से रह रहे हैं और वहां बोर भी कराया गया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बन रहे उनके मकान का निर्माण कार्य भी कथित रूप से रुकवा दिया गया है। ग्राम पंचायत के जन प्रतिनिधियों का कहना है कि यह भूमि शासकीय है और स्कूल तथा छात्रावास के पास होने के कारण पूर्व में  ग्राम सभा की सहमति से इसे खेल मैदान के रूप में प्रस्तावित किया गया था।

ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा इस पूरे मामले की लिखित शिकायत तहसील कार्यालय, और वन विभाग को दी जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद अब तक किसी प्रकार की ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या प्रशासन प्रभावशाली लोगों के सामने कार्रवाई करने से बच रहा है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरई जैसे बहुमूल्य और हरे-भरे वृक्षों को तेजी से काटा जा रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या इन पेड़ों को काटने की विधिवत अनुमति ली गई थी या नहीं। यदि अनुमति नहीं ली गई तो वन विभाग की कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई और यदि अनुमति दी गई है तो किस आधार पर और किसके आदेश से दी गई।

राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली भी इस मामले में कठघरे में है। जब राजस्व रिकॉर्ड में भूमि शासकीय बताई जा रही है तो फिर घेराबंदी और कब्जे की प्रक्रिया कैसे चल रही है। क्या राजस्व अमले ने मौके का निरीक्षण किया है और यदि शिकायतें दी जा चुकी हैं तो कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हो रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन छोटे अतिक्रमणों पर तो तेजी से कार्रवाई करता है, लेकिन जब मामला प्रभावशाली लोगों का होता है तो फाइलें धीमी पड़ जाती हैं। यह समस्या केवल तानाखार तक सीमित नहीं है बल्कि कोरबा जिले के कई क्षेत्रों में मुख्य सड़कों और राष्ट्रीय मार्गों के किनारे शासकीय भूमि पर अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो शासन को करोड़ों रुपये की जमीन और राजस्व का नुकसान हो सकता है।


ग्रामीणों ने यह भी सवाल उठाया है कि कोरबा एक प्रमुख आदिवासी अंचल है जहां स्थानीय आदिवासी परिवार वर्षों से निवासरत हैं। और उनके द्वारा वनों और वृक्षों को कभी नुकसान नहीं किया गया, ऐसे में बाहर से आए व्यक्तियों द्वारा वन अधिकार के तहत खुद को भू-स्वामी बताना लोगों की समझ से परे है। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से मजबूत और प्रभावशाली लोग आखिर किसके संरक्षण में मुख्य सड़कों के किनारे शासकीय भूमि पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं और प्रशासन किसके दबाव मे कार्यवाही करने से बचने की कोशिश कर रहा है और ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को उक्त भूमि पर हो रहे कब्जे की निष्पक्ष जांच करते हुए न्यायोचित कार्यवाही करनी चाहिए, ताकि क्षेत्र में हो रहे एवं जिले में हो रहे अतिक्रमण कार्यों पर अंकुश लगाया जा सके और  शासकीय भूमि एवं वनों को अतिक्रमण से बचाया जा सके ग्रामीणों  यह भी कहा कि यदि प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो भविष्य में ऐसे मामलों की संख्या और बढ़ सकती है।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर शासकीय भूमि और वन संपदा की रक्षा करता है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह कागजों और फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।

प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष निर्भीक और सच्ची खबरों और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

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