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गौशाला के अभाव में बढ़ी गौ-तस्करी, मयूरभंज में लोगों की बढ़ी चिंता

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मयूरभंज, ओड़िशा

By ACGN 7647981711, 9303948009

ओड़िशा ब्यूरो स्वामी विजयानंद जी महाराज

जिले में एक भी मान्यता प्राप्त गौशाला नहीं, बचाए गए मवेशियों को दूसरे जिलों और राज्यों में भेजने की मजबूरी

ओड़िशा के  मयूरभंज जिला में गौवंश की सुरक्षा अब गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। जिले में लगातार बढ़ रही अवैध गौ-तस्करी और गौशालाओं के अभाव के कारण आम लोगों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों और प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गाएं सड़कों पर घूम रही हैं, लेकिन उन्हें सुरक्षित रखने के लिए जिले में एक भी मान्यता प्राप्त गौशाला उपलब्ध नहीं है।
करीब 10,418 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस बड़े जिले में ग्रामीण आबादी का अधिकांश हिस्सा घरों में गाय और बैल पालता है, लेकिन किसी कारणवश अगर मवेशी सड़कों पर भटकने लगें तो उन्हें रखने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। इसी स्थिति का फायदा उठाकर गौ-तस्कर सक्रिय हो गए हैं। जानकारी के अनुसार बादामपहाड़, याशीपुर, ररुआ, हाटबादडा, सरसकना, कुलियाना और बलियाजोड़ा हाट जैसे क्षेत्रों से गाय और बैल खरीदकर राज्य के भीतर और बाहर भेजे जा रहे हैं।


पुलिस और सामाजिक संगठन कई बार तस्करों से मवेशियों को छुड़ाने में सफल होते हैं, लेकिन इसके बाद उन्हें सुरक्षित रखने की बड़ी समस्या सामने आ जाती है। मजबूरी में प्रशासन और सामाजिक संगठनों को इन मवेशियों को दूसरे जिलों और पड़ोसी राज्यों की गौशालाओं में भेजना पड़ता है। इनमें  मां भारती गौशाला बालेश्वर, श्री कृष्णा सुधा चैरिटेबल ट्रस्ट केन्दुझर और झारखंड के  चाकुलिया स्थित  गोलक धाम गौशाला प्रमुख हैं। हालांकि इन स्थानों पर भी सीमित क्षमता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पा रही है।
जिला सुरक्षा प्रमुख  समीर कुमार पात्रा ने कहा कि अवैध तस्करी के कारण जिले में गौवंश की संख्या लगातार घटती जा रही है और स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। उन्होंने राज्य सरकार से कम से कम दो गौशालाओं की स्थापना की मांग करते हुए झड़पोखरिया, बांगरीपोशी, कुलियाना, चांदुआ और शुलियापदा जैसे क्षेत्रों में इसके लिए स्थान चिन्हित करने का सुझाव दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर गायें इंसानों की तरह बोल पातीं तो शायद वे खुद गौशाला की मांग को लेकर धरना देतीं। ग्रामीणों के बीच यह चिंता अब गहराने लगी है कि उनका सबसे बड़ा डर यह नहीं रहा कि बच्चे स्कूल जाएंगे या नहीं, बल्कि यह है कि उनकी गाय सुरक्षित घर लौटेगी या नहीं।


प्रदीप मिश्रा
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