सीएम हेल्पलाइन का निराकरण या नाकामियों पर पर्दा? साक्ष्य मौजूद, फिर भी जांच अधूरी!
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रायगढ़, छत्तीसगढ़
लालजी राठौर से जवाब लेकर शिकायत का निराकरण, वीडियो क्लिप और अन्य साक्ष्यों की जांच पर सवाल, क्या विभागीय व्यवस्था में अपने ही कर्मचारियों को बचाने का खेल?

रायगढ़ :- रायगढ़ जिले में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों के निराकरण की प्रक्रिया एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। एक ओर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायतों का गुणवत्तापूर्ण, निष्पक्ष और सही तथ्यों के आधार पर जांच कर निराकरण किए जाने की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर लालजी राठौर से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए वीडियो क्लिप और अन्य साक्ष्यों की वास्तविक जांच किए बिना ही शिकायत के निराकरण पर सवाल उठ रहे हैं।

आरोप है कि मामले की वास्तविकता जानने के लिए संबंधित स्थान पर जाकर जांच करने के बजाय कार्यालय में संबंधित व्यक्ति से पूछताछ की गई और लालजी राठौर का जवाब लिया गया। इसके बाद उनके जवाब को संतोषजनक मानकर शिकायत का निराकरण कर दिया गया।
अब सवाल यह है कि क्या केवल आरोपित व्यक्ति का जवाब ही किसी शिकायत की जांच का अंतिम आधार हो सकता है?

“क्या जिस पर आरोप, वही करेगा गलती कबूल?”
पूरे मामले में एक सामान्य लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है, क्या कोई व्यक्ति स्वयं यह कबूल करेगा कि उसने गलती की है?
यदि किसी शिकायत में किसी कर्मचारी पर आरोप लगाए गए हैं, तो उससे जवाब लेना जांच की प्रक्रिया का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन क्या उसी जवाब को अंतिम सत्य मान लेना निष्पक्ष जांच कहलाएगा?
क्या कोई व्यक्ति स्वयं लिखकर देगा कि “हां, मैंने नियमों का उल्लंघन किया है”?
इसीलिए किसी भी गंभीर शिकायत की वास्तविकता जानने के लिए स्वतंत्र सत्यापन, मौके का निरीक्षण, उपलब्ध दस्तावेजों की जांच, वीडियो साक्ष्य का परीक्षण और शिकायत में बताए गए तथ्यों की पुष्टि आवश्यक होती है।
लेकिन यदि जांच केवल इस सवाल तक सीमित रह जाए कि “क्या आपने ऐसा किया?” और जवाब मिले “नहीं”, इसके बाद शिकायत बंद कर दी जाए, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिकायत निवारण व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
वीडियो क्लिप और अन्य साक्ष्य का क्या हुआ?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल उपलब्ध बताए जा रहे वीडियो क्लिप और अन्य साक्ष्यों को लेकर है।

यदि शिकायतकर्ता ने वीडियो क्लिप अथवा अन्य प्रमाण प्रस्तुत करने की बात कही थी, तो उनका परीक्षण किस अधिकारी ने किया? वीडियो की वास्तविकता, स्थान, समय और उसमें दिखाई देने वाले तथ्यों का सत्यापन हुआ या नहीं?
क्या संबंधित स्थान पर जाकर मौके का निरीक्षण किया गया?
क्या शिकायत में बताए गए प्रत्येक तथ्य की स्वतंत्र पुष्टि की गई?
यदि इन सबकी जांच नहीं हुई तो फिर शिकायत का निराकरण किस आधार पर किया गया?
साक्ष्य मौजूद हों और फिर भी उनकी जांच न हो, तो सिर्फ विभागीय जवाब को संतोषजनक मान लेना कितना उचित है?

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन आम नागरिक के लिए भरोसे की व्यवस्था मानी जाती है। जब स्थानीय स्तर पर शिकायत का समाधान नहीं होता, तब नागरिक मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की ओर उम्मीद से देखता है।
लेकिन यदि शिकायत संबंधित विभाग के पास जाती है, विभाग अपने ही कर्मचारी से जवाब लेता है और उसी जवाब के आधार पर शिकायत का निराकरण कर दिया जाता है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या शिकायत का समाधान हुआ या केवल शिकायत की फाइल बंद हुई?
क्या तथ्यों की जांच हुई या विभागीय जवाब को ही तथ्य मान लिया गया?
और सबसे बड़ा सवाल क्या यह मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का गुणवत्तापूर्ण निराकरण है या विभाग की नाकामियों को छिपाने का प्रयास?

स्वास्थ्य विभाग की निगरानी में कथित झोलाछापों का कारोबार?
इस मामले ने रायगढ़ जिले में कथित झोलाछाप डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जिले में बिना आवश्यक वैधानिक योग्यता अथवा अनुमति के लोगों द्वारा उपचार किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं हो सकती।
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कुछ कर्मचारियों को निजी स्तर पर उपचार करने की कथित छूट मिली हुई है।
एक पुरुष पर्यवेक्षक द्वारा घर पर निजी क्लीनिक संचालित कर उपचार किए जाने के आरोप भी जांच की मांग कर रहे हैं। यदि यह आरोप सही हैं, तो संबंधित व्यक्ति की योग्यता, पंजीयन, अनुमति और वहां किए जा रहे उपचार की वैधानिकता की जांच होना आवश्यक है।



झोलाछापों की सूची मांगी गई, अब विभागीय कर्मचारियों पर कार्रवाई कब?
कुछ दिनों पूर्व रायगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में कथित झोलाछाप डॉक्टरों की शिकायतें सामने आई थीं, जिसे मीडिया ने प्रमुखता से उठाया था। मामले में बीएमओ ने बताया था कि कलेक्टर के निर्देशानुसार झोलाछाप डॉक्टरों की सूची मांगी गई है।
अब सवाल यह है कि क्या झोलाछाप डॉक्टर सिर्फ वही हैं जो स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी नहीं हैं? यदि स्वास्थ्य विभाग में पर्यवेक्षक के पद पर पदस्थ कोई कर्मचारी कथित तौर पर लोगों को इंजेक्शन लगाता है और निजी क्लीनिक में उपचार करता है, तो क्या उसके खिलाफ भी जांच और कार्रवाई होगी?
झोलाछाप की पहचान पद देखकर होगी या नियमों के उल्लंघन के आधार पर? स्वास्थ्य विभाग को इस सवाल का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
झोलाछापों पर शिकंजा या सिर्फ दिखावे की कार्रवाई?
जिले में कथित झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की है। ऐसे में जनता जानना चाहती है कि शिकायत मिलने के बाद वास्तव में कितने मामलों में मौके पर जाकर जांच की गई?
कितने कथित निजी क्लीनिकों का निरीक्षण हुआ?
कितने लोगों की योग्यता और पंजीयन की जांच की गई?
कितने मामलों में नियमों का उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई हुई?
यदि शिकायतों के बाद भी वास्तविक कार्रवाई के बजाय केवल कागजी प्रक्रिया पूरी की जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था धरातल पर सक्रिय है या केवल दिखावे और खानापूर्ति तक सीमित है?
राजनीतिक संरक्षण की चर्चा, जांच की जरूरत
इस पूरे मामले में कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े स्थानीय नेताओं के कथित रूप से शामिल होने अथवा संरक्षण देने की चर्चा भी सामने आने की बात कही जा रही है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है, इसलिए इन्हें तथ्य के रूप में नहीं बल्कि जांच योग्य आरोप और चर्चा के रूप में देखा जाना चाहिए।
यदि वास्तव में किसी कर्मचारी या कथित झोलाछाप डॉक्टर को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने की बात सामने आती है, तो प्रशासन को इसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
क्योंकि स्वास्थ्य से जुड़ा मामला किसी व्यक्ति या विभाग की प्रतिष्ठा से बड़ा है यह सीधे आम जनता के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है।
अब कागजी निराकरण नहीं, वास्तविक जांच चाहिए
लालजी राठौर से जुड़े मामले में अब जरूरत है कि शिकायत की दोबारा निष्पक्ष समीक्षा की जाए। उपलब्ध वीडियो क्लिप और अन्य साक्ष्यों का विधिवत परीक्षण हो, मौके का निरीक्षण किया जाए और शिकायत में लगाए गए प्रत्येक आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जाए।
यदि लालजी राठौर पर लगाए गए आरोप गलत हैं, तो निष्पक्ष जांच के माध्यम से यह स्पष्ट किया जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई हो।
लेकिन केवल संबंधित व्यक्ति से जवाब लेकर और उसके जवाब को संतोषजनक मानकर शिकायत समाप्त कर देना मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
जनता का सवाल सीधा है
साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद जांच क्यों नहीं?
वीडियो क्लिप के बावजूद सत्यापन क्यों नहीं?
मौके पर जाकर जांच क्यों नहीं?
सिर्फ विभागीय जवाब को अंतिम आधार क्यों?
और सबसे बड़ा सवाल क्या यह शिकायत का वास्तविक निराकरण है या अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश?

रायगढ़ की जनता को अब केवल “निराकरण हो गया” का संदेश नहीं चाहिए। जनता जानना चाहती है कि सच्चाई क्या है, जांच कितनी हुई और कार्रवाई क्यों हुई या क्यों नहीं हुई।
क्योंकि किसी भी शिकायत का असली निराकरण तब माना जाएगा, जब सवालों का जवाब कागज पर नहीं, बल्कि जांच के तथ्यों से मिले।
झोलाछापों की सूची मांगी गई, अब विभागीय कर्मचारियों पर कार्रवाई कब?
कुछ दिनों पूर्व रायगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में कथित झोलाछाप डॉक्टरों की शिकायतें सामने आई थीं, जिसे मीडिया ने प्रमुखता से उठाया था। मामले में बीएमओ ने बताया था कि कलेक्टर के निर्देशानुसार झोलाछाप डॉक्टरों की सूची मांगी गई है।
अब सवाल यह है कि क्या झोलाछाप डॉक्टर सिर्फ वही हैं जो स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी नहीं हैं? यदि स्वास्थ्य विभाग में पर्यवेक्षक के पद पर पदस्थ कोई कर्मचारी कथित तौर पर लोगों को इंजेक्शन लगाता है और निजी क्लीनिक में उपचार करता है, तो क्या उसके खिलाफ भी जांच और कार्रवाई होगी?
झोलाछाप की पहचान पद देखकर होगी या नियमों के उल्लंघन के आधार पर? स्वास्थ्य विभाग को इस सवाल का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
संबंधित स्वास्थ्य विभाग, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के जिम्मेदार अधिकारियों तथा लालजी राठौर सहित संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी निष्पक्ष रूप से प्रकाशित करेगा।
अगली कड़ी में उन राजनेताओं का भी नाम प्रकाशित किया जा सकता है जिनके द्वारा उन्हें संरक्षण प्राप्त है
प्रदीप मिश्रा
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