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टीकाकरण दिवस पर ड्यूटी से गायब, निजी क्लीनिक में इलाज का आरोप; अब कारण बताओ नोटिस तक सिमटा मामला?

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनीता गर्ग  रायगढ़

11:10 बजे निजी क्लीनिक में इलाज करते दिखे, 11:18 बजे छुट्टी के लिए आवेदन की चर्चा; कार्रवाई की असली तस्वीर अब भी धुंधली

रायगढ़। जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड अंतर्गत हाटी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ स्वास्थ्य पर्यवेक्षक लालजी राठौर को लेकर उठे सवाल अब एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। आरोप है कि जिस दिन टीकाकरण दिवस जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य गतिविधि निर्धारित थी, उस दिन वे अपने शासकीय दायित्व से अनुपस्थित रहने के दौरान निजी क्लीनिक में मरीजों का इलाज करते नजर आए। मामले की जानकारी सामने आने के बाद यह मुद्दा स्थानीय स्तर से लेकर स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा और अब विकासखंड चिकित्सा अधिकारी द्वारा उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आ रही है।


मामला इसलिए भी गंभीर सवाल खड़े करता है क्योंकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित कर्मचारी के निजी क्लीनिक में इलाज करने की तस्वीर सामने आने का समय लगभग सुबह 11:10 बजे बताया गया, जबकि इसके कुछ ही मिनट बाद 11:18 बजे ड्यूटी से छुट्टी के लिए आवेदन बीएमओ के व्हाट्सऐप पर भेजे जाने की बात सामने आई है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि छुट्टी की आवश्यकता थी तो आवेदन ड्यूटी से पहले क्यों नहीं किया गया? और यदि उस समय कर्मचारी अपने शासकीय कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं थे तो उनकी अनुपस्थिति को किस आधार पर माना जाएगा?


इस पूरे घटनाक्रम की खबर पूर्व में भी समाचार माध्यमों द्वारा प्रमुखता से उठाई गई थी। इसके बाद बीएमओ से मामले में जानकारी मांगी गई, वहीं सीएमएचओ तथा मुख्यमंत्री सहायता से जुड़े माध्यमों में भी शिकायत/आवेदन किए जाने की जानकारी सामने आई। अब विभागीय स्तर पर कारण बताओ नोटिस जारी होने की बात कही जा रही है।


लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी गंभीर आरोप की जांच का अंतिम पड़ाव केवल कारण बताओ नोटिस ही होगा?
कारण बताओ नोटिस निश्चित रूप से विभागीय प्रक्रिया का एक हिस्सा है। इसमें संबंधित कर्मचारी से आरोपों और परिस्थितियों के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा जाता है। लेकिन नोटिस जारी होना अपने आप में दोष सिद्ध होना भी नहीं है और न ही कार्रवाई समाप्त होने का प्रमाण। असली सवाल नोटिस के बाद शुरू होता है, लालजी राठौर ने अपने स्पष्टीकरण में क्या कहा? उनके जवाब को विभाग ने स्वीकार किया या अस्वीकार? यदि जवाब संतोषजनक नहीं है तो आगे क्या कार्रवाई होगी?


    आवेदन कब और क्यों? यही अब सबसे बड़ा सवाल
सरकारी सेवा में अवकाश कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं मानी जानी चाहिए कि कर्मचारी पहले अपने कार्यस्थल से अनुपस्थित हो जाए और बाद में परिस्थिति के अनुसार आवेदन भेज दे। छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 2010 में अवकाश की स्वीकृति सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया से जुड़ी है। यानी अवकाश का आवेदन और अवकाश की स्वीकृति दो अलग-अलग बातें हैं।


तात्कालिक आवेदन की स्थिति अलग हो सकती है। अचानक बीमारी, दुर्घटना, पारिवारिक आपातस्थिति अथवा ऐसी अपरिहार्य परिस्थिति जिसमें पहले से आवेदन करना संभव न हो, वहां कर्मचारी द्वारा तत्काल अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचना देकर आवेदन प्रस्तुत करना परिस्थितियों के अनुरूप उचित हो सकता है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी घटना की वास्तविक परिस्थितियां, सूचना देने का समय, अनुपस्थिति का कारण और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति महत्वपूर्ण हो जाती है।


यही कारण है कि इस मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि 11:18 बजे आवेदन भेजा गया था या नहीं। विभाग को यह भी देखना होगा कि आवेदन किस कारण से भेजा गया, उस समय कर्मचारी कहां थे, क्या उन्होंने पहले किसी अधिकारी को सूचना दी थी, क्या उन्हें अनुपस्थिति की अनुमति मिली थी और जिस समय वे निजी क्लीनिक में बताए जा रहे हैं, उस समय उनकी शासकीय ड्यूटी क्या थी।


   निजी क्लीनिक का मामला भी जांच के दायरे में क्यों नहीं?
पूरे मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। यदि लालजी राठौर द्वारा निजी क्लीनिक संचालित किए जाने या वहां मरीजों का उपचार किए जाने की बात सामने आती है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वे किस नियम, अनुमति या वैधानिक व्यवस्था के तहत निजी क्लीनिक में कार्य कर रहे थे?


फिलहाल मामला कारण बताओ नोटिस तक पहुंचा है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू हुई है। देखना होगा कि विभाग इस मामले को महज कागजी कार्रवाई मानकर आगे बढ़ जाता है या फिर जांच की तह तक पहुंचकर यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य में किसी भी शासकीय स्वास्थ्य कर्मचारी के लिए ड्यूटी, अवकाश और निजी कार्य के बीच नियमों की सीमा स्पष्ट रहे।


यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कर्मचारी की निजी गतिविधियों के संबंध में लागू सेवा शर्तों, विभागीय अनुमति और संबंधित कानूनों की स्थिति स्पष्ट किए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। इसलिए विभागीय जांच में इस पहलू को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि संबंधित निजी क्लीनिक वैध रूप से संचालित है या नहीं और संबंधित कर्मचारी को वहां कार्य करने की अनुमति किस आधार पर प्राप्त है।
टीकाकरण दिवस पर अनुपस्थिति का सवाल और भी गंभीर
स्वास्थ्य केंद्रों में टीकाकरण दिवस सामान्य कार्य दिवस से अलग महत्व रखता है। ऐसे अवसरों पर स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सीधे ग्रामीण और आम नागरिकों से जुड़ी होती है। यदि किसी कर्मचारी को किसी अपरिहार्य कारण से ड्यूटी पर उपस्थित नहीं होना था तो समय रहते संबंधित अधिकारी को सूचना देना और नियमानुसार अनुमति लेना प्रशासनिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है।


ऐसे में सवाल केवल एक कर्मचारी के आने-जाने का नहीं, बल्कि शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही और जिम्मेदारी की व्यवस्था का है।
अब निगाहें स्वास्थ्य विभाग पर हैं। क्या विभाग कारण बताओ नोटिस का जवाब लेकर मामला बंद कर देगा? या फिर जवाब की सत्यता, निजी क्लीनिक की स्थिति, ड्यूटी के समय अनुपस्थिति, आवेदन के समय और वास्तविक परिस्थितियों की जांच करते हुए मामले की जड़ तक पहुंचेगा?


क्या यह मामला सिर्फ “कारण बताओ” तक थम जाएगा या “कारण क्या था” से आगे बढ़कर “नियम क्या कहते हैं और उल्लंघन हुआ या नहीं” तक जांच पहुंचेगी?


अब यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि लालजी राठौर अपने स्पष्टीकरण में क्या जवाब देते हैं और विभाग उस जवाब पर क्या निर्णय लेता है। यदि स्पष्टीकरण संतोषजनक पाया जाता है तो विभाग को उसकी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया जाता तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जानी चाहिए।


क्योंकि सवाल सिर्फ लालजी राठौर का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें ग्रामीण क्षेत्र का मरीज सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्यकर्मी का इंतजार करता है और उसी समय कर्मचारी की मौजूदगी कहीं और होने का आरोप सामने आता है।
अब जनता भी यही जानना चाहती है, नोटिस के बाद अगला कदम क्या होगा?

प्रदीप मिश्रा
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