कपास किसानों की बर्बादी : शुल्क मुक्त आयात से बढ़ी चिंता, किसान संगठनों ने उठाए गंभीर सवाल
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रायपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
कपास आयात पर शुल्क हटाने के फैसले को किसान विरोधी बताते हुए पुनर्विचार की मांग
रायपुर ACGN:- केंद्र सरकार द्वारा जून से अक्टूबर 2026 तक कपास के आयात पर लगने वाले 11 प्रतिशत शुल्क को निलंबित किए जाने के फैसले को लेकर किसान संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष संजय पराते ने एक विस्तृत आलेख जारी कर कहा है कि यह निर्णय देश के लाखों कपास उत्पादक किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर सकता है।
उन्होंने कहा कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 32 लाख किसान कपास उत्पादन से जुड़े हुए हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। इनमें अधिकांश किसान छोटे और सीमांत वर्ग के हैं, जिनकी आजीविका मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे समय में जब किसान खरीफ सीजन की तैयारी कर चुके हैं और कपास की बुआई शुरू हो चुकी है, आयात शुल्क हटाने का निर्णय किसानों के हितों के विपरीत दिखाई देता है।
संजय पराते ने कहा कि कपास उद्योग के कई प्रतिनिधि स्वयं यह स्वीकार कर चुके हैं कि देश में वर्तमान समय में कपास की पर्याप्त उपलब्धता है। नई फसल भी अक्टूबर से दिसंबर के बीच बाजार में आने लगेगी। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर कपास आयात की अनुमति दिए जाने से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार को ऐसा निर्णय लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले से विदेशी कपास उत्पादकों और बड़े व्यापारिक घरानों को लाभ मिलेगा, जबकि भारतीय किसानों को नुकसान उठाना पड़ेगा। उनका कहना है कि शुल्क हटने के बाद देश में लगभग 40 लाख गांठ कपास के आयात की संभावना जताई जा रही है, जो सामान्य आयात से कई गुना अधिक है। इससे घरेलू बाजार में कपास की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाएगा।
किसान नेता ने कहा कि पहले से ही कपास उत्पादक किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। जहां औसत समर्थन मूल्य लगभग 8500 रुपये प्रति क्विंटल है, वहीं किसानों को खुले बाजार में इससे काफी कम कीमत मिल रही है। आयात शुल्क हटाने की घोषणा के बाद बाजार में कपास के दामों में और गिरावट देखी गई है। इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली और सिंचाई की लागत में वृद्धि ने किसानों पर अतिरिक्त बोझ डाला है। ऐसे में यदि उपज का मूल्य भी कम हो जाए तो किसानों की आर्थिक स्थिति और खराब होगी। इसका असर विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक दिखाई देगा जहां कपास मुख्य नकदी फसल है।
संजय पराते ने कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) की भूमिका पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि यदि आयात के कारण बाजार मूल्य लगातार गिरता है तो सीसीआई को भी नुकसान उठाना पड़ेगा। इससे किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीदी की उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है। लंबे समय में यह स्थिति समर्थन मूल्य व्यवस्था को कमजोर करने वाली साबित हो सकती है।
उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा घोषित “कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन” पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं तब तक प्रभावी नहीं हो सकतीं, जब तक किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित न हो। उनका कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों की आय और बाजार सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
किसान संगठनों ने मांग की है कि केंद्र सरकार कपास आयात पर शुल्क हटाने के निर्णय पर पुनर्विचार करे और किसानों को सी-2 लागत पर 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर समर्थन मूल्य देने की गारंटी सुनिश्चित करे। साथ ही घरेलू कपास उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके।
किसान नेताओं का कहना है कि यदि समय रहते इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो इसका असर केवल कपास किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)
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