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वायरल वीडियो, निलंबन और सवाल: क्या सुशासन में सम्मान भी बचा रहेगा या केवल कार्रवाई ही दिखाई देगी?

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दुर्ग छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

दुर्ग की घटना ने खोली लोकतंत्र, प्रशासन और संगठनात्मक संस्कृति की कई परतें

दुर्ग:- दुर्ग जिले में जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) रूपेश कुमार पाण्डेय के निलंबन ने पूरे प्रदेश में एक बड़ा संदेश दिया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सुशासन तिहार के दौरान जनता से कथित अशिष्ट व्यवहार को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई की और स्पष्ट कर दिया कि जनता के सम्मान के साथ किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। शासन के इस निर्णय को प्रशासनिक जवाबदेही और जनसंवेदनशीलता की दृष्टि से एक मजबूत कदम माना जा सकता है।


लेकिन इस कार्रवाई के बाद कई ऐसे प्रश्न भी सामने खड़े हो गए हैं, जिन पर लोकतंत्र, राजनीति, प्रशासन और स्वयं राजनीतिक संगठनों को भी गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।

क्या एक वायरल वीडियो पूरी सच्चाई होता है?

वायरल वीडियो की कुछ अंश पहले पदाधिकारी ने कहा फिर CEO ने जवाब दिया

आज का दौर सोशल मीडिया का दौर है। कुछ सेकंड की वीडियो क्लिप कई बार किसी व्यक्ति की वर्षों की छवि पर भारी पड़ जाती है। दुर्ग की घटना में भी जनता ने वही देखा जो कैमरे में रिकॉर्ड हुआ। अधिकारी की तीखी प्रतिक्रिया दिखाई दी, लेकिन उससे पहले क्या हुआ, किसने क्या कहा, किस लहजे में कहा, कितना दबाव बनाया गया और परिस्थितियां क्या थीं, यह पूरा घटनाक्रम आम जनता के सामने नहीं आ सका।
यहीं से सवाल उठता है कि क्या किसी घटना का निर्णय केवल उसकी अंतिम प्रतिक्रिया देखकर किया जाना चाहिए या फिर उस प्रतिक्रिया को जन्म देने वाली परिस्थितियों का भी मूल्यांकन होना चाहिए? लोकतंत्र में न्याय केवल परिणाम का नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया का विषय होता है।

29 मई का शिविर और बहस का विवाद

सीईओ रूपेश पांडे ने मीडिया से कहा

प्राप्त जानकारियों और स्वयं सीईओ रूपेश पाण्डेय द्वारा मीडिया के समक्ष दिए गए पक्ष के अनुसार, 29 मई को आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर में विधायक की उपस्थिति के दौरान भाजपा के मंडल महामंत्री पूरण देशमुख और उनके बीच तीखी बहस हुई थी। सीईओ का कहना है कि यदि उनके कार्यों को लेकर कोई शिकायत थी तो वह विधिवत कलेक्टर अथवा सक्षम अधिकारियों को दी जा सकती थी, जहां जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया मौजूद है।
उनका आरोप है कि सार्वजनिक मंच पर उन्हें लगातार अमर्यादित भाषा में संबोधित किया गया, “तू-तड़ाक” कर बात की गई और ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं जिनके परिणामस्वरूप उनकी ओर से भी प्रतिक्रिया आई। उनका कहना है कि वह भी एक इंसान हैं, उनका भी आत्मसम्मान है और 28 वर्षों की सेवा में उन्होंने अनेक जनसमस्या निवारण शिविरों में कार्य किया है, लेकिन कभी किसी नागरिक या जनप्रतिनिधि के साथ सार्वजनिक विवाद की स्थिति नहीं बनी।
यहीं लोकतंत्र का सबसे संवेदनशील प्रश्न खड़ा होता है, क्या प्रतिक्रिया को देखकर निर्णय लिया जाएगा या प्रतिक्रिया के कारणों को भी समझा जाएगा?

क्या मर्यादा केवल अधिकारियों के लिए आरक्षित है?

इस पूरे विवाद का शायद सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है। की यदि किसी अधिकारी द्वारा जनता या किसी व्यक्ति से अनुचित व्यवहार किया जाता है तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक और आवश्यक है। लेकिन क्या यही कसौटी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों पर भी लागू होती है?
वायरल वीडियो में केवल अधिकारी ही नहीं दिख रहे थे। वहां राजनीतिक संगठन से जुड़े लोग भी बहस करते, दबाव बनाते और आक्रामक मुद्रा में दिखाई दे रहे थे। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि प्रशासनिक सेवा आचरण नियम अधिकारियों को मर्यादित रहने का निर्देश देते हैं तो क्या राजनीतिक और संगठनात्मक पदों पर बैठे लोगों के लिए भी कोई नैतिक मर्यादा होनी चाहिए या नहीं?
लोकतंत्र में सम्मान एकतरफा नहीं होता। यदि अधिकारी को जनता का सम्मान करना है तो अधिकारी का सम्मान करना भी लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा होना चाहिए।

अधिकारी भी इंसान है, केवल पद नहीं

अक्सर यह मान लिया जाता है कि अधिकारी हर परिस्थिति में केवल आदेश सुनने और पालन करने के लिए बने हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकारी भी समाज का हिस्सा हैं। उनका भी परिवार है, सामाजिक प्रतिष्ठा है, आत्मसम्मान है और मानसिक सीमाएं हैं। यदि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक मंच पर लगातार घेरा जाए, उसकी बात काटी जाए, उसे अपमानित महसूस कराया जाए और राजनीतिक प्रभाव का प्रदर्शन किया जाए, तो प्रतिक्रिया की संभावना को पूरी तरह अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता।
यह अधिकारी के व्यवहार का समर्थन नहीं है, बल्कि परिस्थितियों की निष्पक्ष व्याख्या है।
गलती यदि अधिकारी की है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी संगठन पदाधिकारी या राजनीतिक कार्यकर्ता का व्यवहार भी अनुचित था तो उसकी समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक होनी चाहिए। अन्यथा संदेश यह जाएगा कि जवाबदेही केवल प्रशासन के लिए है, राजनीति के लिए नहीं।

संगठनात्मक संस्कृति पर भी सवाल

यह घटना एक और बड़े विषय की ओर संकेत करती है, राजनीतिक संगठनों में बदलती कार्यकर्ता संस्कृति। भारतीय जनता पार्टी स्वयं को अनुशासित, राष्ट्रहित और जनहित को सर्वोपरि मानने वाला संगठन बताती रही है। ऐसे में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि संगठन के कुछ पदाधिकारी सार्वजनिक मंचों पर अधिकारियों से टकराव, दबाव और प्रभाव प्रदर्शन की राजनीति करते दिखाई दें तो इसका संदेश संगठन की मूल विचारधारा के अनुरूप माना जाएगा या नहीं?
आज आम जनता भी देख रही है कि कई लोग अपने वाहनों पर बड़े-बड़े बोर्ड लगाकर चलते हैं। पद का नाम बड़ा होता है, संगठन या प्रकोष्ठ का नाम छोटा होता है। कहीं नियमविरुद्ध नंबर प्लेटें दिखाई देती हैं, कहीं काली फिल्म, कहीं प्रभाव प्रदर्शन करने वाले बोर्ड।
सवाल यह नहीं है कि बोर्ड लगाने वाला कौन है। सवाल यह है कि क्या कानून सभी के लिए समान है?
यदि कोई सामान्य नागरिक ऐसा करे तो कार्रवाई होती है। तो क्या राजनीतिक पहचान रखने वाले लोगों पर भी वही नियम लागू होंगे?

प्रभाव की राजनीति बनाम सेवा की राजनीति

लोकतंत्र में जनता जनप्रतिनिधि चुनती है, प्रभावशाली व्यक्ति नहीं।
संगठन में पद मिलना सम्मान की बात है, लेकिन वह किसी को कानून से ऊपर नहीं बना देता। दुर्भाग्य से कई स्थानों पर यह धारणा बनती दिखाई देती है कि राजनीतिक संपर्क प्रशासनिक प्रक्रिया से अधिक शक्तिशाली है। यही वह सोच है जो धीरे-धीरे लोकतंत्र को संवाद से हटाकर दबाव की दिशा में ले जाती है।
जब कोई कार्यकर्ता या पदाधिकारी अपनी राजनीतिक निकटता का उपयोग अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए करता है तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है।

अधिकारियों को भी आत्ममंथन करना होगा

यह भी उतना ही सच है कि प्रशासन केवल नियमों से नहीं चलता।
जनता कार्यालयों में समाधान की उम्मीद लेकर आती है। अधिकारियों को कानून के साथ संवेदनशीलता, धैर्य और मानवीय व्यवहार भी दिखाना होगा। कई बार कठोर भाषा, उदासीन रवैया और जनता से दूरी भी ऐसे विवादों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं।
इसलिए यदि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अपनी भाषा और व्यवहार पर नियंत्रण रखना चाहिए, तो अधिकारियों को भी अपने पद की गरिमा के अनुरूप संयम और संवाद बनाए रखना होगा।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में सम्मान दोनों का होना चाहिए
दुर्ग की यह घटना केवल एक सीईओ के निलंबन की कहानी नहीं है। यह उस बदलती राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति का आईना है जिसमें संवाद की जगह टकराव, सहयोग की जगह दबाव और प्रक्रिया की जगह वायरल वीडियो निर्णय का आधार बनने लगे हैं।
यदि अधिकारी गलत हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए। यदि राजनीतिक कार्यकर्ता या संगठन पदाधिकारी मर्यादा तोड़ते हैं तो उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
लोकतंत्र में न अधिकारी छोटा है, न जनप्रतिनिधि बड़ा। दोनों जनता की सेवा के लिए हैं। दोनों का सम्मान सुरक्षित रहेगा तभी व्यवस्था मजबूत होगी।
क्योंकि सुशासन केवल कार्रवाई से नहीं आता, बल्कि ऐसी व्यवस्था से आता है जहां कानून के साथ सम्मान, अधिकारों के साथ मर्यादा और शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी दिखाई दे।

लेखक की बात “अंतिम विचार”

यह लेख किसी व्यक्ति, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, संगठन या राजनीतिक दल के पक्ष अथवा विपक्ष में नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल इतना कहना है कि लोकतंत्र में पद चाहे किसी के पास भी हो,अधिकारी, कर्मचारी, मंत्री, जनप्रतिनिधि, संगठन का पदाधिकारी या कार्यकर्ता, सभी को अपने शब्दों, व्यवहार और आचरण में धैर्य, संयम और मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
यह भी एक वास्तविकता है कि कई बार कुछ राजनीतिक या संगठनात्मक पदाधिकारी अपने पद, प्रभाव और राजनीतिक पहुंच का उपयोग करते हुए अधिकारियों पर दबाव बनाते दिखाई देते हैं। वहीं दूसरी ओर यह भी देखा जाता है कि कुछ अधिकारी अपने कार्यालयों में आने वाले आम नागरिकों, जनप्रतिनिधियों या शिकायतकर्ताओं की बात को गंभीरता से सुनने के बजाय पद की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अनावश्यक दबाव, औपचारिकता या संवेदनहीन व्यवहार का परिचय देते हैं। दोनों ही स्थितियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ नहीं कही जा सकतीं।
सम्मान एकतरफा नहीं होता। जिस प्रकार अधिकारियों को जनता और जनप्रतिनिधियों का सम्मान करना चाहिए, उसी प्रकार जनप्रतिनिधियों, संगठन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी अधिकारियों और कर्मचारियों की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। असहमति हो सकती है, शिकायत हो सकती है, जांच हो सकती है, कार्रवाई भी हो सकती है, लेकिन संवाद और मर्यादा कभी नहीं टूटनी चाहिए।
आखिरकार पद स्थायी नहीं होते। आज जो व्यक्ति किसी कुर्सी पर बैठा है, कल वह उस पद पर नहीं रहेगा। आज जो अधिकारी है, कल सेवानिवृत्त होकर एक सामान्य नागरिक होगा। आज जो मंत्री, विधायक या संगठन का बड़ा पदाधिकारी है, कल वह भी आम जनता के बीच होगा। तब यदि उसके साथ वही व्यवहार हो जो उसने दूसरों के साथ किया था, तो उसे कैसा लगेगा?
इसीलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद सम्मान का है, सबसे बड़ी शक्ति संयम की है और सबसे बड़ा आभूषण विनम्रता है। पद बदलते रहते हैं, लेकिन व्यवहार और शब्दों की पहचान जीवनभर लोगों के मन में बनी रहती है। इसलिए अधिकार से अधिक जिम्मेदारी, और शक्ति से अधिक शालीनता को महत्व देना ही एक स्वस्थ समाज, संवेदनशील प्रशासन और मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों, मीडिया रिपोर्टों, संबंधित पक्षों द्वारा दिए गए बयानों तथा जनहित से जुड़े प्रश्नों के आधार पर लिखा गया लेख है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, संगठन या राजनीतिक दल पर दोषारोपण करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक मर्यादा और सामाजिक व्यवहार से जुड़े प्रश्नों पर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना है। किसी भी घटना की वास्तविकता और जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एवं वैधानिक प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है।

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