खंभों पर चढ़कर करंट से झुलसते मजदूर, जिम्मेदारी से उतरते अधिकारी!
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कोरबा छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
एक सप्ताह में तीन हादसे, सीएसपीडीसीएल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल – आखिर बिजली व्यवस्था चल रही है या जवाबदेही से बचने की व्यवस्था?
कोरबा ACGN:- कोरबा जिले में बीते सप्ताह आई तेज आंधी, बारिश और तूफान के बाद विद्युत व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। जगह-जगह तार टूटे, खंभे क्षतिग्रस्त हुए, फीडर बंद पड़े रहे और हजारों उपभोक्ता अंधेरे में रहने को मजबूर हो गए। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी (सीएसपीडीसीएल) द्वारा युद्धस्तर पर विद्युत आपूर्ति बहाल करने का अभियान चलाया गया। विभागीय कर्मचारियों, लाइनमैनों और ठेका कर्मियों को लगातार फील्ड में लगाया गया।
लेकिन बिजली बहाली के इसी अभियान के दौरान एक सप्ताह के भीतर तीन ऐसे हादसे सामने आए, जिसमें पहली घटना करतला DC में विश्वजीत राठिया, दूसरी घटना में भैंसमा DC के बरपाली नकटीखार में अक्षय यादव तीसरी घटना दर्री DC में साडा कॉलोनी जमनीपाली मैं करंट से झुलसने की घटनाएं सामने आई है जो न केवल विद्युत सुरक्षा व्यवस्था बल्कि पूरे विभागीय तंत्र, निगरानी प्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि तीनों घटनाओं में घायल हुए लोग खंभों पर चढ़कर विद्युत कार्य कर रहे थे और तीनों मामलों में दुर्घटना के बाद विभागीय स्तर पर लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया सामने आई “वह व्यक्ति अधिकृत नहीं था” अथवा “वह स्वयं खंभे पर चढ़ गया था।” यही वह बिंदु है जहां से पूरे मामले की गंभीरता शुरू होती है।
करतला डीसी में विश्वजीत राठिया हादसा: चालक खंभे पर कैसे पहुंचा?
पहली घटना करतला DC क्षेत्र की बताई जा रही है, जहां विश्वजीत राठिया नामक युवक करंट की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलस गया। स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारी के अनुसार विश्वजीत मूल रूप से वी ठेकेदार के अधीन रहकर विभाग की वाहन के चालक का कार्य करता था। लेकिन आंधी-पानी के बाद चल रहे विद्युत सुधार कार्यों के दौरान उसे भी विद्युत लाइन सुधार कार्य में लगाया गया और वह खंभे पर चढ़ा हुआ था। इसी दौरान वह करंट की चपेट में आ गया और गंभीर रूप से घायल हो गया।


करतला में करंट से झुलसा युवक विश्वजीत राठीया
जब इस विषय में करतला सब डिवीजन के कनिष्ठ अभियंता रूपांग राणा से फोन पर चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि संबंधित व्यक्ति विभाग की अनुमति से कार्य नहीं कर रहा था और वह स्वयं खंभे पर चढ़ गया था। अधिकारी का यह बयान जितना सरल दिखाई देता है, उतने ही बड़े सवाल पैदा करता है। यदि विश्वजीत अधिकृत कर्मचारी नहीं था तो वह विभागीय कार्यस्थल तक पहुंचा कैसे? यदि वह चालक था तो उसे विद्युत कार्य करने की अनुमति किसने दी? यदि वह स्वयं खंभे पर चढ़ गया था तो मौके पर मौजूद जिम्मेदार कर्मचारियों ने उसे रोका क्यों नहीं?
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार उसे खंभे मेंचढ़ता आता था इसलिए लाईनमैन ने उसे खंबे पर चढ़ाया था
नकटी खार में अक्षय यादव करंट से झुलसा : विद्युत कर्मी (लाइन मेन) का निजी सहायक बना ?
दूसरी घटना भैंसमा सब डिवीजन अंतर्गत बरपाली क्षेत्र के ग्राम नकटीखार की है, जहां अक्षय यादव विद्युत लाइन सुधार कार्य के दौरान गंभीर रूप से झुलस गया। सूत्रों के अनुसार अक्षय विभाग का नियमित कर्मचारी नहीं था ना ही किसी ठेकेदार के पास कार्यरत था। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आई कि वह विभाग में पदस्थ लाइनमैन तरुण यादव के साथ निजी सहायक के रूप में कार्य करता था।

नकटीखार करंट से झुलसा अक्षय यादव
जब इस मामले में ओ एंड एम के कार्यपालन अभियंता एस.के. सोनी से चर्चा की गई तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि विद्युत खंभे पर चढ़कर कार्य करने का अधिकार केवल अधिकृत लाइनमैन को होता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई अन्य व्यक्ति खंभे पर चढ़ा है तो इसकी जिम्मेदारी स्वयं उसी व्यक्ति की होगी। जब उसे उन्हें जानकारी दी गई की उक्त विभाग में पदस्थ लाइनमैन तरुण यादव द्वाराउसे निज सहायक के रूप रखा गया था और उससे काम करवाया जाता था तब उन्होंने कहा कि उन्हें भी यह बात सुनने को मिली है, जिसकी जांच की जाएगी
लेकिन यहां भी वही प्रश्न खड़ा होता है यदि अक्षय अधिकृत नहीं था तो वह विद्युत कार्यस्थल पर क्या कर रहा था? क्या विभाग को यह जानकारी नहीं थी कि कौन व्यक्ति खंभे पर चढ़ रहा है? यदि नियम इतने स्पष्ट हैं तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ? यदि विभागीय कर्मचारियों की निगरानी में कार्य चल रहा था तो एक गैर-अधिकृत व्यक्ति वहां तक पहुंचा कैसे?
दर्री सब डिवीजन में उपेंद्र करंट से झुलसा: सवाल अधिक, जवाब कम
तीसरी घटना दर्री सब डिवीजन अंतर्गत सरदार वल्लभभाई पटेल नगर, जमनीपाली क्षेत्र की है, जहां ठेकेदार के अधीनस्थ कार्यरत उपेंद्र नामक युवक विद्युत कार्य के दौरान करंट की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार वह एक निजी ठेकेदार के अधीन कार्य कर रहा था और विद्युत सुधार कार्य के दौरान यह हादसा हुआ।
इस मामले में विभागीय पक्ष जानने के लिए संबंधित सहायक अभियंता से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। परिणामस्वरूप घटना के संबंध में विभागीय स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। हालांकि यह तथ्य सामने आया कि उपेंद्र भी उसी विद्युत बहाली कार्य का हिस्सा था, जो आंधी और बारिश के बाद पूरे जिले में चलाया जा रहा था।
क्या हर बार यही कहा जाएगा “वह स्वयं खंभे पर चढ़ गया था”?
तीनों घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो एक खतरनाक समानता दिखाई देती है। व्यक्ति खंभे पर चढ़ता है, करंट की चपेट में आता है, गंभीर रूप से घायल होता है और उसके बाद विभागीय स्तर पर यह कहा जाता है कि वह अधिकृत नहीं था या स्वयं खंभे पर चढ़ गया था।
लेकिन क्या वास्तव में कोई सामान्य व्यक्ति यूं ही 11 केवी या उससे अधिक क्षमता वाली विद्युत लाइनों के खंभों पर चढ़ जाता है? क्या कोई मजदूर या ग्रामीण मनोरंजन के लिए अपनी जान जोखिम में डाल देता है? यदि उत्तर नहीं है तो फिर यह स्वीकार करना होगा कि कहीं न कहीं कार्यस्थल पर निगरानी, सुरक्षा और नियंत्रण व्यवस्था में गंभीर खामियां मौजूद हैं। जबकि विभाग में foc मजदूर ठेकेदार के अधीनस्थ कार्य करते है उन्हें खंभे पर चढ़कर कार्य करने के लिए अधिकृत नहीं किया गया है अधिकारियों के अनुसार खंभे पर चढ़कर कार्य करने के लिए विभाग के नियमित विभागीय कर्मचारी लाइनमैन ही अधिकृत होता है तब मजदूर खंभे पर क्यों चढ़ते है लाइनमेन उन्हें मना क्यों नहीं करते?
सबसे बड़ा सवाल: अगर जान चली जाती या जिंदगी भर के लिए अपंग हो जाते तो जिम्मेदार कौन होता?
निश्चित रूप से यह राहत की बात है कि प्राप्त जानकारी के अनुसार विश्वजीत राठिया, अक्षय यादव और उपेंद्र तीनों का उपचार जारी है तथा उनकी स्थिति पहले से बेहतर बताई जा रही है। लेकिन इन घटनाओं के बीच एक ऐसा सवाल खड़ा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि इनमें से किसी मजदूर की मृत्यु हो जाती, या वह जीवनभर के लिए शारीरिक रूप से अक्षम हो जाता, तो उसके परिवार की जिम्मेदारी कौन उठाता? क्या उसके बच्चों की पढ़ाई, परिवार का भरण-पोषण और भविष्य की चिंता कोई विभाग, ठेकेदार या जिम्मेदार अधिकारी करता? या फिर हर बार की तरह गरीब परिवार को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता?
विशेष रूप से अक्षय यादव का मामला कई गंभीर प्रश्नों को जन्म देता है। शासन के विभिन्न श्रम कानूनों और सुरक्षा प्रावधानों के तहत ठेका मजदूरों को पीएफ, ईएसआई, ईएसआईसी और दुर्घटना संबंधी अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए, ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में उन्हें उपचार, मुआवजा और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो सके। लेकिन यदि कोई व्यक्ति विभागीय रिकॉर्ड में अधिकृत कर्मचारी नहीं माना जाता, या उसकी स्थिति को लेकर ही विवाद खड़ा हो जाए, तो ऐसी परिस्थिति में उसके अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
इस मामले में लाइनमैन तरुण यादव का कहना है कि अक्षय यादव 3 मई से ठेकेदार के अधीन कार्य कर रहा था और उसी दौरान यह दुर्घटना हुई। दूसरी ओर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि वह ठेकेदार के अधीन foc मजदूर या सहायक के रूप में कार्यरत था, तो आखिर उसे विद्युत खंभे पर चढ़कर इतना जोखिमपूर्ण कार्य करने की अनुमति किसने दी? क्या उसके पास आवश्यक प्रशिक्षण था? क्या उसे सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए थे? क्या उसे विद्युत कार्यों के लिए अधिकृत किया गया था? यदि नहीं, तो फिर वह उस स्थिति तक पहुंचा कैसे? कार्य स्थल पर यदि लाइनमैन उपस्थित था, तो उसे क्यों चढ़ाया गया
अक्षय यादव के परिजनों का कहना है कि वह पिछले पांच-छह वर्षों से संबंधित लाइनमैन तरुण यादव के साथ विद्युत कार्यों में सहयोग करता आ रहा था और लगातार फील्ड में काम करता था। परिवार का दावा है कि वह कोई नया व्यक्ति नहीं था, बल्कि वर्षों से इसी तरह के कार्यों में लगा हुआ था। घटना के बाद उसके उपचार का पूरा खर्च लाइनमैन तरुण यादव द्वारा उठाया जा रहा है, जो मानवीय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिचायक माना जा सकता है। लेकिन यह व्यक्तिगत सहयोग उस बड़े प्रश्न का उत्तर नहीं है, जो इस पूरे मामले के केंद्र में खड़ा है।
सवाल यह नहीं है कि इलाज का खर्च कौन उठा रहा है। सवाल यह है कि यदि यह हादसा और भयावह हो जाता, यदि अक्षय या अन्य घायल मजदूर स्थायी रूप से अपंग हो जाते, यदि उनका हाथ-पैर काम करना बंद कर देता, यदि वे जीवनभर मजदूरी करने लायक नहीं बचते, तो उनके परिवार का भविष्य कौन संभालता? क्या उन्हें वैधानिक मुआवजा मिलता? क्या उन्हें ईएसआईसी या श्रम सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिलता? क्या विभाग उन्हें अपना कर्मचारी मानता? क्या ठेकेदार जिम्मेदारी स्वीकार करता? या फिर हादसे के बाद यह कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता कि “वह अधिकृत कर्मचारी नहीं था” या “वह स्वयं खंभे पर चढ़ गया था”?
यही वह प्रश्न हैं जिनका जवाब केवल पीड़ित परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जानना चाहता है। क्योंकि जब तक इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तब तक यह चिंता बनी रहेगी कि कहीं बिजली बहाली के नाम पर गरीब मजदूर अपनी जान जोखिम में तो नहीं डाल रहे और हादसा होने पर उनकी जिम्मेदारी तय करने वाला कोई नहीं है। जनहित में आवश्यक है कि इन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो, वास्तविक परिस्थितियां सामने आएं, जिम्मेदारियों का निर्धारण हो और भविष्य में किसी भी मजदूर को ऐसी असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर न होना पड़े।
सबसे बड़ा रहस्य: विभागीय कर्मचारी, विभागीय वाहन और विभागीय सामग्री मौजूद थी, फिर भी लोग “स्वयं” चढ़ गए?
यदि किसी स्थल पर विभागीय वाहन मौजूद हैं, विभागीय कर्मचारी मौजूद हैं, विद्युत सामग्री मौजूद है और विद्युत सुधार कार्य चल रहा है, तो कोई बाहरी व्यक्ति वहां जाकर खंभे पर कैसे चढ़ सकता है?
क्या वहां मौजूद कर्मचारियों ने उसे रोका नहीं?
क्या किसी ने उसकी पहचान नहीं पूछी?
क्या सुरक्षा अधिकारी मौजूद नहीं थे?
क्या कार्यस्थल पर कोई पर्यवेक्षण नहीं था?
यदि कोई वास्तव में अनधिकृत व्यक्ति था तो विभागीय कर्मचारियों ने उसे तत्काल नीचे क्यों नहीं उतारा? और यदि उसे नहीं रोका गया तो क्या यह मौन स्वीकृति नहीं मानी जाएगी?
लाइन परमिट में थी या नहीं? यही सबसे बड़ा प्रश्न
विद्युत विभाग में किसी भी लाइन पर कार्य शुरू करने से पहले लाइन को परमिट में लिया जाता है। इसका अर्थ है कि लाइन को सुरक्षित घोषित किया गया है और उस पर कार्य किया जा सकता है।
अब यदि एक सप्ताह के भीतर लगातार तीन लोग करंट से झुलस जाते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है
क्या संबंधित लाइनें परमिट में थीं? यदि थीं तो करंट आया कैसे? यदि नहीं थीं तो कार्य शुरू क्यों हुआ? क्या सभी सुरक्षा मानकों का पालन किया गया? क्या ग्राउंडिंग और आइसोलेशन की प्रक्रिया पूरी हुई थी? क्या कार्यस्थल पर जिम्मेदार अधिकारी मौजूद थे?
इन प्रश्नों के उत्तर ही पूरे मामले की सच्चाई सामने ला सकते हैं।
क्या वर्षों से चल रहा है “निजी सहयोगी मॉडल”?
जिले के कई क्षेत्रों में लंबे समय से यह चर्चा सुनाई देती रही है कि कुछ विभागीय कर्मचारी अपने साथ निजी लोगों को कार्य में लगाते हैं। कई बेरोजगार युवक मामूली पारिश्रमिक पर विद्युत कार्यों में जोखिम उठाते हैं, जबकि विभागीय रिकॉर्ड में उनका कोई उल्लेख नहीं होता।
यदि यह व्यवस्था वास्तव में कहीं चल रही है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि मानव जीवन से खिलवाड़ है। विद्युत कार्य अत्यंत जोखिमपूर्ण होता है और इसके लिए प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण तथा तकनीकी योग्यता आवश्यक होती है। ऐसे में गैर-प्रशिक्षित लोगों को इस कार्य में लगाना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना जा सकता है।
घायलों का इलाज कौन करा रहा है?
तीनों घायलों का उपचार जारी है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इलाज का पूरा खर्च कौन उठा रहा है। क्या विभाग उनकी जिम्मेदारी ले रहा है? क्या ठेकेदार खर्च उठा रहे हैं? क्या संबंधित कर्मचारियों द्वारा निजी स्तर पर सहयोग किया जा रहा है? इस संबंध में भी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
यह केवल तीन हादसे नहीं, व्यवस्था का आईना हैं
विश्वजीत राठिया, अक्षय यादव और उपेंद्र की घटनाएं केवल व्यक्तिगत दुर्घटनाएं नहीं हैं। ये तीन संकेत हैं कि विद्युत सुरक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत क्या है। यदि नियम कहते हैं कि केवल अधिकृत लाइनमैन खंभे पर चढ़ सकता है, तो गैर-अधिकृत लोग वहां क्यों दिखाई दे रहे हैं? यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है, तो हादसे लगातार क्यों हो रहे हैं? यदि जिम्मेदारी तय है, तो हर बार जवाबदेही से बचने की कोशिश क्यों दिखाई देती है?
जनता जानना चाहती है
क्या तीनों मामलों की स्वतंत्र जांच होगी?
क्या यह जांच होगी कि लाइन परमिट में थी या नहीं?
क्या यह जांच होगी कि मौके पर कौन-कौन कर्मचारी मौजूद थे?
क्या निजी व्यक्तियों से कार्य कराए जाने के आरोपों की जांच होगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होगी?
क्या पूरे जिले में विद्युत सुरक्षा ऑडिट कराया जाएगा?
क्या भविष्य में किसी और गरीब मजदूर को इसी तरह खंभे पर चढ़ाकर जोखिम में डाला जाएगा?
आज सवाल केवल तीन घायलों का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो दुर्घटना के बाद सबसे पहले यह बताने में लग जाती है कि घायल व्यक्ति अधिकृत था या नहीं, लेकिन यह नहीं बताती कि वह घायल हुआ क्यों। यदि कोई गरीब मजदूर, चालक, निजी सहायक या ठेका कर्मी विभागीय कार्य के दौरान खंभे पर चढ़कर झुलस जाता है, तो सबसे पहले यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि वह कौन था। सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि उसे उस स्थिति तक पहुंचने ही क्यों दिया गया। क्योंकि किसी भी विद्युत विभाग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल बिजली बहाल करना नहीं, बल्कि उस बिजली को बहाल करने वाले हर व्यक्ति को सुरक्षित घर वापस पहुंचाना भी है।
विशेष टिप्पणी : (अस्वीकरण) : यह लेख उपलब्ध जानकारियों, स्थानीय सूत्रों, अधिकारियों के बयानों तथा जनहित से जुड़े प्रश्नों के आधार पर तैयार विश्लेषणात्मक संपादकीय है। किसी व्यक्ति अथवा संस्था की अंतिम जिम्मेदारी का निर्धारण सक्षम जांच एवं वैधानिक प्रक्रिया के बाद ही माना जाएगा।)
यह लेख किसी व्यक्ति, अधिकारी, कर्मचारी या संस्था की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल उन गरीब मजदूरों, श्रमिकों और पीड़ित परिवारों की पीड़ा को सामने लाना है, जो विद्युत कार्यों के दौरान हादसों का शिकार हुए हैं। यदि किसी स्तर पर लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अनदेखी अथवा नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की जवाबदेही तय हो तथा विभागीय एवं वैधानिक प्रावधानों के अनुसार उचित कार्यवाही की जाए। साथ ही घायल श्रमिकों और उनके परिवारों को न्याय, उपचार और आवश्यक सहायता मिल सके, यही इस लेख का मूल उद्देश्य है।
प्रदीप मिश्रा
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