“‘हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे’… तो फिर 21 साल से उजड़ता चिल्ड्रन ट्रैफिक पार्क किसके भरोसे?”
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कोरबा छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
कार्यालय में “बोर्ड पर लिखा है,’हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे’ लेकिन पार्क पूछ रहा है ‘आखिर कब?'”
करोड़ों रुपये के विकास के दावों के बीच कोरबा का ऐतिहासिक चिल्ड्रन ट्रैफिक पार्क बदहाली, अतिक्रमण और उपेक्षा की मार झेल रहा है। सवाल सिर्फ एक पार्क का नहीं, बल्कि सरकारी जवाबदेही और जनधन की सुरक्षा का है।
“मंत्री जी… एक नजर इधर भी! आपकी सरकार का बनाया पार्क आज नशाखोरों और अतिक्रमणकारियों के हवाले”
कोरबा ACGN:- आज राजनेताओं के कार्यक्रमों के मंचों पर एक नारा बार-बार सुनाई देता है,”हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे।” सरकारी कार्यालयों से लेकर राजनीतिक सभाओं तक विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। करोड़ों रुपये की योजनाओं का बखान होता है, नई घोषणाएं होती हैं और उपलब्धियों के विज्ञापन अखबारों से लेकर सोशल मीडिया तक दिखाई देते हैं। लेकिन इन सबके बीच कोरबा शहर का एक ऐसा सच भी है, जिसे देखने की शायद किसी के पास फुर्सत नहीं है। यह सच है हसदेव बराज स्थित चिल्ड्रन ट्रैफिक पार्क का, जो आज अपनी बदहाली पर स्वयं आंसू बहाता नजर आता है। यदि वास्तव में “हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” केवल नारा नहीं बल्कि संकल्प है, तो फिर यह पार्क पिछले दो दशकों से किसके भरोसे छोड़ दिया गया?

कोरबा शहर की जनता अब सवाल पूछ रही है। आखिर “हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” का नारा सिर्फ मंचों सरकारी दफ्तरों की दीवारों तक ही सीमित है या धरातल पर भी कभी दिखाई देगा? यदि बनाया था, तो आज उसकी यह दुर्दशा किसकी जिम्मेदारी है?
वर्ष 2004 में भारतीय जनता पार्टी की तत्कालीन डॉ. रमन सिंह सरकार ने इस पार्क को आईडीएसएमटी योजना के अंतर्गत विकसित कराया था। 8 सितंबर 2004 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, तत्कालीन नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल, राजस्व एवं कृषि मंत्री ननकीराम कंवर, तत्कालीन महापौर स्वर्गीय श्याम बाई कंवर, सभापति रामनारायण सोनी, निर्माण समिति के अध्यक्ष जोगेश लांबा, तत्कालीन पार्षद एवं वर्तमान उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन तथा निगम आयुक्त जितेंद्र शुक्ला की मौजूदगी में इसका लोकार्पण हुआ था। उस समय इसे कोरबा के बच्चों के लिए आधुनिक ट्रैफिक शिक्षा, मनोरंजन और प्राकृतिक वातावरण में परिवारों के साथ समय बिताने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। यह पार्क शहर की पहचान और गौरव का प्रतीक माना जाता था।

वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के हाथों लोकार्पित हसदेव बराज चिल्ड्रन ट्रैफिक पार्क कभी कोरबा की शान था। आज वही पार्क खंडहर में तब्दील हो चुका है। टूटे झूले, उखड़ती बाउंड्री वॉल, गायब होती संगमरमर की बेंचें, बुझी रोशनियां, बढ़ता अतिक्रमण और असामाजिक गतिविधियों के आरोप, क्या यही है विकास का मॉडल?
हसदेव नदी के किनारे स्थित इस क्षेत्र की एक और खासियत यह है कि इसके आसपास भवानी माता मंदिर, कौशल्या मंदिर और छत्तीसगढ़ महतारी मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं, जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। यदि इस पूरे क्षेत्र को सुव्यवस्थित किया जाए तो यह न केवल धार्मिक और पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है, बल्कि लोगों के लिए समय बिताने का एक सुंदर स्थल भी विकसित हो सकता है।

नगर निगम करोड़ों रुपये के विकास कार्यों के विज्ञापन देता है। जनप्रतिनिधि मंचों से विकास की लंबी-लंबी गाथाएं सुनाते हैं। मंत्री उपलब्धियों की सूची गिनाते हैं। लेकिन शहर की यह धरोहर हर दिन बदहाली की नई कहानी लिख रही है।
एक समय ऐसा था जब हसदेव नदी के किनारे बसे इस पार्क की रंग-बिरंगी रोशनी दूर से लोगों को आकर्षित करती थी। बच्चों की खिलखिलाहट, परिवारों की चहल-पहल, हरियाली, झूले, संगमरमर की बेंचें और प्राकृतिक वातावरण इसकी सबसे बड़ी पहचान थे। सर्दियों में यहां पिकनिक मनाने वालों की भीड़ रहती थी। शहर के लोग अपने मेहमानों को भी इस पार्क की खूबसूरती दिखाने लाते थे। लेकिन आज वही पार्क वीरान पड़ा है। टूटी हुई संरचनाएं, जंग लगे झूले, उखड़ी हुई बाउंड्री वॉल, बुझ चुकी रोशनियां और बेतरतीब फैली गंदगी यह बताने के लिए काफी है कि वर्षों से इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अब यह पार्क धीरे-धीरे असामाजिक तत्वों और नशाखोरों का ठिकाना बनता जा रहा है। पार्क की सुरक्षा व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। अतिक्रमण लगातार बढ़ रहा है। बाउंड्री वॉल और अन्य निर्माण सामग्री को नुकसान पहुंचाए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। आसपास बैचिंग प्लांट संचालित होने, सार्वजनिक भूमि पर कब्जे और पार्क परिसर के कुछ हिस्सों के दुरुपयोग जैसे आरोप भी स्थानीय नागरिक लगा रहे हैं। यदि इन शिकायतों में सच्चाई है तो यह केवल पार्क की बदहाली नहीं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी की गंभीर विफलता का संकेत भी है। आखिर करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है?

नगर निगम अक्सर करोड़ों रुपये के विकास कार्यों का दावा करता है। नई सड़कें, नए निर्माण, नए उद्यान और सौंदर्यीकरण योजनाओं की लंबी सूची गिनाई जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल नए निर्माण करना है? पहले से मौजूद सार्वजनिक परिसंपत्तियों को सुरक्षित रखना, उनका संरक्षण करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्हें बचाए रखना क्या विकास की परिभाषा का हिस्सा नहीं है? यदि करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए पार्क यूं ही उजड़ते रहेंगे, तो फिर जनता के टैक्स के पैसे का वास्तविक लाभ किसे मिला?

नगर निगम से सवाल है, क्या विकास का मतलब केवल नई सड़कें और नए टेंडर हैं? पुराने सार्वजनिक स्थलों को बचाना क्या विकास की परिभाषा में शामिल नहीं है? यदि करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई संपत्तियों को यूं ही उजड़ने देना है, तो जनता के टैक्स का हिसाब कौन देगा?
जिस पार्क के लोकार्पण के समय वे क्षेत्र के जनप्रतिनिधि थे, आज उसी सरकार में मंत्री हैं। कोरबा औद्योगिक विकास का बड़ा केंद्र है। यहां बालको, वेदांता, एनटीपीसी, सीएसपीजीसीएल सहित कई बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान संचालित हैं। इन संस्थानों के अपने-अपने सुव्यवस्थित परिसर और हरित क्षेत्र हैं। लेकिन शहर की सार्वजनिक धरोहर बने इस पार्क को पुनर्जीवित करने की दिशा में अब तक कोई बड़ी पहल सामने क्यों नहीं आई? यह प्रश्न केवल एक मंत्री से नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र से है।
सबसे बड़ा सवाल वर्तमान उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन से भी जुड़ता है। जिस पार्क के लोकार्पण के समय वे क्षेत्र के जनप्रतिनिधि (पार्षद) थे, उसके बाद कोरबा नगर पालिक निगम के महापौर रहे और आज वर्तमान में छत्तीसगढ़ प्रदेश सरकार में केबिनेट मंत्री हैं। क्या इस पार्क की सुध लेने का समय अभी तक नहीं आया? क्या कोरबा के विकास में इस पार्क की कोई जगह नहीं बची?
कोरबा नगर निगम, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के लिए यह समय आत्ममंथन का है। यदि आज भी इस पार्क के संरक्षण, सौंदर्यीकरण, सुरक्षा, अतिक्रमण हटाने और पुनर्विकास की ठोस योजना नहीं बनाई गई, तो आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों में देखेंगी कि कभी हसदेव नदी के किनारे बच्चों के लिए एक खूबसूरत ट्रैफिक पार्क हुआ करता था। तब शायद सरकारी फाइलों में विकास के आंकड़े तो दर्ज होंगे, लेकिन जमीन पर इतिहास की एक और धरोहर खत्म हो चुकी होगी।
आज यह पार्क सरकार, नगर निगम, जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों से एक ही सवाल पूछ रहा है
आज इस पार्क की टूटी हुई दीवारें, सूने पड़े झूले, उखड़ी हुई बेंचें और बुझी हुई लाइटें एक ही सवाल पूछ रही हैं, “जब बनाया आपने था, तो अब संवारने की जिम्मेदारी किसकी है?”
सरकार यदि वास्तव में “हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” के संकल्प पर विश्वास करती है, तो अब समय भाषणों का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई का है। इस पूरे क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कर, पार्क का पुनर्विकास किया जा सकता है। इसे एक आधुनिक चौपाटी और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए, जहां छोटे-छोटे ठेले, दुकानें और स्थानीय कुटीर व्यवसायों को स्थान मिले। इससे न केवल पार्क फिर से जीवंत होगा, बल्कि आसपास के कई बेरोजगार युवाओं को रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे। उचित प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा, साफ-सफाई और नियमित रखरखाव की व्यवस्था कर इसे फिर से शहर का आकर्षण केंद्र बनाया जा सकता है। जनता अब घोषणा नहीं, कार्रवाई देखना चाहती है।
यदि अभी भी जिम्मेदार लोग नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों में देखेंगी कि कभी हसदेव किनारे एक खूबसूरत चिल्ड्रन ट्रैफिक पार्क हुआ करता था।
“बोर्ड पर लिखा है ‘हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे’. अब जनता कह रही है ‘वादा निभाइए, पार्क बचाइए।'”
प्रदीप मिश्रा
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