नौतपा : माँ वसुन्धरा का महान तप, जल-जंगल-जमीन के संरक्षण का संदेश
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बिलासपुर, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
पर्यावरणीय संतुलन, गंगा संरक्षण और प्रकृति रक्षा का प्रेरक संदेश देता है नौतपा
आलेख – शांति सोनी
बिलासपुर ACGN:- भारतीय ऋतुचक्र में नौतपा केवल भीषण गर्मी का काल नहीं, बल्कि प्रकृति के अद्भुत वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संतुलन का प्रतीक है। ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले नौतपा के नौ दिन धरती, जल, जंगल और समूचे वातावरण को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता का स्वरूप माना गया है और नौतपा उसी माँ वसुन्धरा का तपस्वी रूप है, जो संपूर्ण सृष्टि के संतुलन और कल्याण के लिए आवश्यक माना गया है।
नौतपा का सबसे गहरा प्रभाव जलचक्र पर पड़ता है। सूर्य की प्रखर किरणें समुद्र, नदियों, तालाबों और जलाशयों के जल का वाष्पीकरण करती हैं, जिससे बादलों का निर्माण होता है और वर्षा चक्र संचालित होता है। यदि नौतपा संतुलित रूप से न हो तो वर्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि भारतीय कृषि परंपरा में नौतपा को विशेष महत्व दिया गया है। यह धरती को वर्षा ग्रहण करने के लिए तैयार करता है और प्राकृतिक जलचक्र को गति प्रदान करता है।

नौतपा का दूसरा महत्वपूर्ण संबंध जंगलों से है। भीषण गर्मी के दौरान वृक्ष अपनी जड़ों को और गहराई तक फैलाते हैं, जिससे भूजल संरक्षण और भूमि कटाव रोकने में सहायता मिलती है। वृक्षों की हरियाली वातावरण में शीतलता बनाए रखती है। बढ़ती वृक्ष कटाई और शहरीकरण के दौर में नौतपा यह संदेश देता है कि वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय अभियान नहीं बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा का संकल्प है।

धरती अर्थात जमीन भी नौतपा के दौरान प्राकृतिक शोधन प्रक्रिया से गुजरती है। सूर्य की तीव्र गर्मी अनेक हानिकारक जीवाणुओं और कीटों को नष्ट कर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती है। भारतीय किसान सदियों से मानते आए हैं कि संतुलित नौतपा अच्छी वर्षा और बेहतर कृषि उत्पादन का आधार बनता है। इस प्रकार नौतपा प्रकृति द्वारा किया जाने वाला एक प्राकृतिक शुद्धिकरण है।

नौतपा का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। भारतीय परंपरा में सूर्य को ऊर्जा, जीवन और तप का प्रतीक माना गया है। इसी काल में जल संरक्षण, पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था तथा वृक्षों की रक्षा जैसे कार्यों को पुण्य माना जाता है। यह समय मानव को प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराता है।
आज जब वैश्विक तापवृद्धि, जल संकट और पर्यावरण प्रदूषण पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बन चुके हैं, तब नौतपा हमें प्रकृति के नियमों के साथ संतुलन बनाकर चलने की प्रेरणा देता है। जल संरक्षण, वृक्षों की सुरक्षा और भूमि को प्रदूषण मुक्त रखने का संकल्प ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य प्रदान कर सकता है।
इस संदर्भ में गंगा संरक्षण और जल संवर्धन के क्षेत्र में कार्य कर रहे जीवन धारा नमामि गंगे अभियान के संरक्षक डॉ. हरिओम शर्मा का योगदान उल्लेखनीय माना जा रहा है। उन्होंने अपने अथक प्रयासों और जनभागीदारी के माध्यम से निष्प्राण हो चुकी नीम नदी को पुनर्जीवित करने का कार्य किया है। उनके प्रयासों से जल संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और पर्यावरण जागरूकता को नई दिशा मिली है। समाज में उन्हें गंगा पुत्र और प्रकृति प्रहरी के रूप में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
नौतपा हमें यह संदेश देता है कि जल, जंगल और जमीन का संरक्षण ही मानवता का वास्तविक धर्म है। प्रकृति का सम्मान और उसके संसाधनों का संतुलित उपयोग ही सतत विकास और समृद्ध भविष्य का आधार बन सकता है।

रचनाकार : श्रीमती शांति सोनी
जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़
राष्ट्रीय सचिव, जीवन धारा नमामि गंगे
प्रदीप मिश्रा
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