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इतिहास के अमर अध्याय : राष्ट्रभक्ति की अमर मिसाल : वीर सावरकर की प्रेरक गाथा

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संपादकीय

By ACGN 7647981711, 9303948009

वीर सावरकर : क्रांति-ज्वाला के अमर पुरोधा
(राष्ट्रभक्ति, साहस और स्वाभिमान के अप्रतिम प्रतीक)

रचनाकार : श्रीमती शांति सोनी, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ राज्य

क्रांति-ज्वाला का उदय

पराधीन भारत की निस्तब्ध वेला में एक ऐसा तेजस्वी सूर्य उदित हुआ, जिसकी क्रांति-ज्वाला ने साम्राज्यवाद की नींव तक हिला दी। कालापानी की काली कोठरियाँ भी जिसके अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति को कैद न कर सकीं। वह व्यक्तित्व केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि स्वाभिमान, त्याग और प्रखर राष्ट्रचेतना का जीवंत घोष था। वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के उस अमर अध्याय का नाम हैं, जिसकी ओजस्विता आज भी प्रत्येक देशभक्त हृदय में अग्निशिखा बन प्रज्वलित है।

क्रांति का उद्घोष : वीर सावरकर की पहचान

ज्वाला बनकर देश में, जिसने चेतन फूँक।
बेड़ी से टकरा उठा, उसका सिंह स्वरूप॥
कालापानी काँप उठा, सुन आज़ादी-गान।
वीर सावरकर नाम है, भारत की पहचान॥

प्रारंभिक जीवन : युग-चेतना का जन्म – भारतभूमि के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल मनुष्य नहीं, युग-चेतना के प्रज्वलित दीप बन जाते हैं। विनायक दामोदर सावरकर ऐसे ही एक अदम्य साहस, तेजस्वी चिंतन और राष्ट्रनिष्ठ तपस्या के पर्याय थे। उनका जीवन मानो ज्वालामुखी की उस अग्नि के समान था, जिसने पराधीनता की जंजीरों को गलाने का संकल्प लिया था।
बाल्यकाल और संगठन निर्माण : राष्ट्रभक्ति की शुरुआत
28 मई 1883 को महाराष्ट्र के भगूर गाँव में जन्मे सावरकर बचपन से ही असाधारण प्रतिभा और ओजस्विता के धनी थे। सामान्य जनमानस उन्हें केवल क्रांतिकारी के रूप में जानता है, परंतु उनका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक था। वे उच्चकोटि के साहित्यकार, इतिहासकार, समाज-सुधारक, दूरदर्शी चिंतक और अद्भुत संगठनकर्ता भी थे। किशोरावस्था में ही उन्होंने “मित्र मेला” नामक संगठन बनाकर युवाओं में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई। आगे चलकर यही संगठन “अभिनव भारत” के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
विदेश में क्रांति की अग्नि : इंडिया हाउस का निर्माण – बहुत कम लोग जानते हैं कि सावरकर उन प्रथम भारतीयों में थे जिन्होंने विदेशी धरती पर बैठकर भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का उद्घोष किया। लंदन में अध्ययन के दौरान उन्होंने “इंडिया हाउस” को क्रांतिकारियों का केंद्र बना दिया। वहीं उन्होंने 1857 के संग्राम को “सिपाही विद्रोह” नहीं, बल्कि “भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर” सिद्ध किया। उनकी पुस्तक The Indian War of Independence 1857 ब्रिटिश सरकार के लिए इतनी भयावह थी कि उसके प्रकाशित होने से पहले ही उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
साहसिक पलायन : मार्सेई की समुद्री घटना – सावरकर की निर्भीकता का सबसे अद्भुत प्रसंग मार्सेई (फ्रांस) के समुद्र में देखने को मिलता है। जब अंग्रेज उन्हें जलपोत से भारत ला रहे थे, तब उन्होंने समुद्र में छलांग लगाकर स्वतंत्र होने का अभूतपूर्व प्रयास किया। यह घटना विश्व इतिहास में साहस की अनुपम मिसाल मानी जाती है।
कालापानी की यातनाएँ : सेलुलर जेल का संघर्ष – उनके जीवन का सबसे मार्मिक अध्याय था, सेलुलर जेल (कालापानी) की यातना। वहाँ उन्हें कोल्हू में बैल की भाँति जोता गया, नारियल कूटने और अमानवीय श्रम करने को विवश किया गया। किंतु लोहे की सलाखें भी उनके विचारों को कैद न कर सकीं।
कहा जाता है कि जब कागज़-कलम उपलब्ध नहीं होती थी, तब वे जेल की दीवारों पर कील और पत्थरों से कविताएँ लिखते तथा उन्हें स्मरण कर लेते थे। उनकी स्मरण-शक्ति इतनी विलक्षण थी कि हजारों पंक्तियाँ उन्हें कंठस्थ थीं।
सामाजिक सुधार : समरसता की दिशा में प्रयास – सावरकर सामाजिक समरसता के भी प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव का खुलकर विरोध किया। महाराष्ट्र में “पतित पावन मंदिर” की स्थापना कर उन्होंने सभी जातियों के लिए मंदिर के द्वार खोल दिए, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।
राष्ट्रचेतना का जागरण – वीर सावरकर का जीवन हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्रप्रेम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और साहस से सिद्ध होता है। उनकी जयंती केवल एक स्मरण-दिवस नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना को पुनः जागृत करने का पावन अवसर है। आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी उनके अदम्य आत्मबल, संगठन-शक्ति और स्वाभिमानी विचारों से प्रेरणा लेकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने का संकल्प ले।
                      सावरकर की शाश्वत गाथा
          तप, त्यागों की दीपशिखा, अमर रहे बलिदान।
               सावरकर के तेज से, जगमग हिंदुस्तान॥
               जब तक नभ में सूर्य है, गूँजेगा यह नाम।
             वीरों की उस भूमि को, शत-शत मेरा प्रणाम॥

वीर सावरकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता-अग्नि के अमर शलाका पुरुष थे। उनकी तेजस्विता युगों तक राष्ट्रपथ को आलोकित करती रहेगी।
जब-जब भारत की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और क्रांति का इतिहास लिखा जाएगा, वीर सावरकर का नाम स्वर्णाक्षरों में सदैव आलोकित रहेगा।

रचनाकार : श्रीमती शांति सोनी, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

    

प्रदीप मिश्रा
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