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अडानी समूह के कोरबा पावर लिमिटेड में मजदूरों का उबाल: तीन दिन की हड़ताल ने खोली प्रबंधन की कार्यशैली की परतें

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

श्रमिकों के आक्रोश के आगे झुका प्रबंधन, 12 बिंदुओं पर सहमति के बाद स्थगित हुआ आंदोलन

कोरबा ACGN:- कोरबा जिले उरगा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पताढी में अडानी समूह की सहयोगी इकाई मेसर्स कोरबा पावर लिमिटेड द्वारा संचालित ताप विद्युत परियोजना के तृतीय चरण में 1600 मेगावाट के हजारों मजदूरों का कई मांगो को लेकर तीन दिनों तक चला आंदोलन आखिरकार मंगलवार को हड़ताल के बाद प्रबंधन को झुकना पड़ा आखिरकार सहमति के बाद स्थगित हो गया। लेकिन इस हड़ताल ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि देश की बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं में काम करने वाले मजदूर आखिर कब तक अपने ही हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होते रहेंगे।


मजदूरों का आरोप है कि अडानी कोरबा पावर प्लांट में लंबे समय से श्रमिकों से 8 घंटे की जगह 10 से 12 घंटे तक काम कराया जा रहा था, लेकिन ओवरटाइम का भुगतान नियमों के अनुसार नहीं दिया जा रहा था। कई मजदूरों ने बताया कि वेतन भी समय पर नहीं मिलता था, जिससे उनके परिवारों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता था।


सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि हजारों करोड़ के उद्योग में काम करने वाले मजदूरों के लिए क्या पीने का साफ पानी, शौचालय और प्राथमिक चिकित्सा सुविधा भी बड़ी मांग है? मजदूरों का कहना है कि प्लांट परिसर में इन मूलभूत सुविधाओं की भी कमी है। कई बार उन्हें ऐसी परिस्थितियों में काम करना पड़ता है जहां न सुरक्षा की पूरी व्यवस्था है और न ही दुर्घटना की स्थिति में स्पष्ट जिम्मेदारी तय है।
मजदूरों का कहना है कि अगर प्लांट में कोई हादसा हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी लेने से भी प्रबंधन बचता रहा है।

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या उत्पादन और मुनाफा ही सबसे बड़ा लक्ष्य है और मजदूरों की जान की कोई कीमत नहीं?
इन्हीं सवालों और समस्याओं को लेकर यूनिट 3 और 4 के विस्तार कार्य में लगे हजारों मजदूरों ने काम बंद कर हड़ताल का रास्ता चुना। तीन दिनों तक चले इस आंदोलन ने प्लांट के कामकाज को प्रभावित किया और आखिरकार प्रबंधन को बातचीत की मेज पर आना पड़ा।
प्रबंधन, प्रिंसिपल एम्प्लॉयर, ठेकेदारों और श्रमिक प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की चर्चा के बाद 12 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनी। समझौते के अनुसार अब मजदूरों से प्रतिदिन केवल 8 घंटे काम लिया जाएगा और उससे अधिक काम कराने पर ओवरटाइम का भुगतान दोगुनी दर से किया जाएगा।
इसके अलावा मजदूरी का भुगतान हर महीने 7 से 10 तारीख के बीच करने और राज्य की न्यूनतम मजदूरी दर के अनुसार भुगतान करने पर सहमति बनी है। प्लांट परिसर में पेयजल, शौचालय और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने, उपस्थिति में पारदर्शिता लाने के लिए क्रोनोस प्रणाली लागू करने, दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में ईएसआईसी के तहत सहायता और आश्रित को रोजगार देने, तथा मजदूरों की समस्याओं के समाधान के लिए नियमित शिकायत निवारण बैठक आयोजित करने जैसे बिंदुओं को भी समझौते में शामिल किया गया है।


मजदूरों का कहना है कि यह आंदोलन टकराव के लिए नहीं बल्कि अपने अधिकार, सम्मान और सुरक्षित कार्य वातावरण की लड़ाई के लिए किया गया था। उनका कहना है कि अगर समय रहते प्रबंधन उनकी समस्याओं को सुन लेता तो शायद उन्हें तीन दिनों तक हड़ताल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।श्रमिकों का कहना है कि लंबे समय से चली आ रही समस्याओं और प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ यह आंदोलन मजबूरी में करना पड़ा। अब जब उनकी प्रमुख मांगों को स्वीकार कर लिया गया है तो उन्होंने आंदोलन स्थगित करने का निर्णय लिया है। अंततः मजदूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन और श्रमिकों के बीच सहमति बनी और दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया।


यह पूरा घटनाक्रम कई तीखे सवाल भी छोड़ गया है।
क्या इतनी बड़ी औद्योगिक परियोजना में मजदूरों को उनका न्यूनतम अधिकार दिलाने के लिए भी आंदोलन करना पड़ेगा?
क्या मजदूरों के पसीने से चलने वाले उद्योगों में मजदूरों की आवाज इतनी कमजोर है कि उसे सुनने के लिए हड़ताल जरूरी हो जाती है?
और क्या अब जो समझौते हुए हैं, वे जमीन पर भी लागू होंगे या फिर कागजों तक सीमित रह जाएंगे?
फिलहाल मजदूरों और प्रबंधन के बीच सहमति बनने के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया गया है, लेकिन मजदूरों ने साफ संकेत दिया है कि अगर समझौते की शर्तों को लागू नहीं किया गया तो मजदूर फिर से एकजुट होकर अपने हक की लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटेंगे।

प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबरों और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।

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