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हरित भविष्य की दिशा में पहल, विद्यार्थियों को मिला दोना-पत्तल निर्माण का प्रशिक्षण

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बिलासपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

पर्यावरण संरक्षण, स्वावलंबन और व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने का अभिनव प्रयास

बिलासपुर ACGN:- वर्तमान समय में एक ओर जहां सिंगल यूज प्लास्टिक से पर्यावरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है, वहीं युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती भी बड़ी समस्या बनकर उभर रही है।

इन दोनों समस्याओं के समाधान की दिशा में विकासखंड बिल्हा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय महमंद में विद्यार्थियों को दोना-पत्तल निर्माण का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण विद्यार्थियों को प्रकृति संरक्षण, आत्मनिर्भरता और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया।


प्रशिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों को बताया गया कि पत्तों से बने दोने-पत्तल पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल होते हैं और उपयोग के बाद आसानी से मिट्टी में मिलकर खाद बन जाते हैं। इससे प्लास्टिक और थर्मोकोल के बढ़ते उपयोग पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। विद्यार्थियों ने इस प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साल, पलाश और अन्य पत्तों से उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना आजीविका के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं।


इस प्रशिक्षण ने विद्यार्थियों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास और श्रम के प्रति सम्मान की भावना को भी मजबूत किया। नई शिक्षा नीति के अनुरूप ‘करके सीखने’ की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए इस गतिविधि ने विद्यार्थियों को व्यावसायिक कौशल से जोड़ा। कम लागत में शुरू होने वाला दोना-पत्तल निर्माण उद्योग ग्रामीण और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है और ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को भी मजबूती देता है।


स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पत्तलों पर भोजन करना सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि प्लास्टिक या थर्मोकोल के बर्तनों में गर्म भोजन रखने से हानिकारक रसायन निकलते हैं जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होते हैं। वहीं भारतीय संस्कृति में पत्तलों पर भोजन करने की परंपरा सदियों से रही है, जिससे हमारी सांस्कृतिक विरासत भी जुड़ी हुई है।


विद्यालय की वरिष्ठ व्याख्याता श्रीमती शांति सोनी ने बताया कि इस प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण से विद्यार्थी न केवल पर्यावरण के प्रति जागरूक बनते हैं बल्कि भविष्य में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी प्रेरित होते हैं। यदि विद्यालय स्तर पर ही विद्यार्थियों को ऐसे कौशल से जोड़ा जाए तो यह स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

प्रदीप मिश्रा
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