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लेमरू की प्रेरक कहानी: मलेरिया प्रभावित क्षेत्र से मलेरिया मुक्त होने की ओर बढ़ा वनांचल

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कोरबा, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

स्वास्थ्य विभाग, मितानिनों और ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से घने जंगलों के बीच बसे क्षेत्र में बदली स्वास्थ्य की तस्वीर

कोरबा ACGN:- कभी मलेरिया से गंभीर रूप से प्रभावित रहने वाला कोरबा विकासखंड का सुदूर वनांचल क्षेत्र लेमरू आज स्वास्थ्य जागरूकता और सामूहिक प्रयासों के बल पर मलेरिया मुक्त क्षेत्र की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच स्थित यह क्षेत्र पहले मलेरिया के लिए कुख्यात माना जाता था। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच के कारण हर वर्ष बरसात के मौसम में बड़ी संख्या में लोग मलेरिया की चपेट में आ जाते थे।
जागरूकता की कमी और समय पर उपचार न मिल पाने के कारण कई लोग गंभीर रूप से बीमार हो जाते थे। इस क्षेत्र में मलेरिया का भय इतना अधिक था कि बाहर से आने वाले अधिकारी, कर्मचारी या अन्य लोग भी यहां आने से कतराते थे और यदि आते भी थे तो मलेरिया से बचाव के लिए विशेष सावधानी बरतते थे। यहां तक कि लोगों में यह भ्रांति भी फैली हुई थी कि लेमरू के पानी में ही मलेरिया है, जिसके कारण कई परिवार अपनी बेटियों की शादी भी इस क्षेत्र में करने से हिचकिचाते थे।
स्वास्थ्य विभाग के लिए यह स्थिति एक बड़ी चुनौती थी। सीमित संसाधनों और कर्मचारियों की कमी के बावजूद जिला मुख्यालय से स्वास्थ्य कर्मियों की टीम समय-समय पर क्षेत्र में स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर लोगों को जागरूक करने और उपचार उपलब्ध कराने का प्रयास करती रही। स्वास्थ्य विभाग, मितानिनों और स्थानीय समुदाय के संयुक्त प्रयासों से धीरे-धीरे इस क्षेत्र में मलेरिया नियंत्रण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई।
मलेरिया पर नियंत्रण पाने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा सुनियोजित रणनीति बनाकर कई प्रभावी कदम उठाए गए। घर-घर सर्वे और जांच अभियान चलाकर बुखार और संदिग्ध मरीजों की तुरंत आरडी किट से जांच की गई। जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी के साथ व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को मलेरिया के लक्षण, बचाव और उपचार के बारे में जानकारी दी गई। घरों के आसपास साफ-सफाई रखने और पानी के ठहराव वाले स्थानों को समाप्त करने के लिए लोगों को प्रेरित किया गया, जिससे मच्छरों के प्रजनन स्थलों को खत्म किया जा सके।
इसके साथ ही ग्रामीणों को मच्छरदानी का वितरण कर उसके नियमित उपयोग के लिए प्रेरित किया गया तथा पूरे क्षेत्र में डीडीटी का छिड़काव कराया गया। स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और मितानिनों द्वारा क्लोरोक्वीन, पैरासिटामॉल और एसीटी किट के माध्यम से मौके पर ही उपचार उपलब्ध कराया गया। क्षेत्र के सभी छात्रावासों और आश्रमों में भी मच्छरदानियां वितरित कर उनके उपयोग की निगरानी की गई। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा लगातार क्षेत्र का भ्रमण किया गया और स्वास्थ्य केंद्रों का संचालन 24 घंटे सुनिश्चित किया गया।
इन सतत प्रयासों का परिणाम यह रहा कि लेमरू क्षेत्र के ग्रामीणों ने स्वयं मलेरिया के खिलाफ अभियान छेड़ दिया और मितानिनों तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर बीमारी से लड़ाई को जन आंदोलन का रूप दे दिया। इसके फलस्वरूप क्षेत्र में मलेरिया के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है और यह क्षेत्र अब मलेरिया मुक्त बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
लेमरू की यह सफलता इस बात का उदाहरण है कि जब स्वास्थ्य विभाग, मितानिन, जनप्रतिनिधि और ग्रामीण समुदाय मिलकर कार्य करते हैं तो सबसे कठिन स्वास्थ्य चुनौतियों को भी दूर किया जा सकता है। यह प्रेरणादायक कहानी अन्य वनांचल क्षेत्रों के लिए भी एक मार्गदर्शक बन रही है।
प्रदीप मिश्रा
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