30 दिनों में तीन बार फूटा राखड़ डैम — हसदेव नदी सफेद, लापरवाही या कमीशन का खेल?
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कोरबा छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
हसदेव नदी प्रदूषित, ग्रामीण आक्रोशित प्रबंधन, पर्यावरण विभाग और सिंचाई विभाग की भूमिका पर उठे तीखे सवाल
कोरबा ACGN:- कोरबा जिले में ऊर्जा उत्पादन करने वाले संयंत्रों से निकलने वाला राखड़ अब पर्यावरण और ग्रामीण जीवन के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है। हसदेव थर्मल पावर प्लांट के झाबु स्थित राखड़ डैम का तटबंध बीते एक महीने में तीन बार ध्वस्त हो चुका है, जिससे लाखों टन राखड़ युक्त पानी सीधे हसदेव नदी में मिल गया। इससे नदी का पानी पूरी तरह सफेद नजर आने लगा और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल बन गया।
बता दें ऊर्जा नगरी कोरबा के पश्चिम क्षेत्र में स्थित हसदेव थर्मल पावर प्लांट से उत्सर्जित राखड़ के भंडारण के लिए नवागांव कला–झाबु क्षेत्र के समीप बनाए गए राखड़ डैम का बार-बार टूटना अब बड़े प्रशासनिक और तकनीकी संकट का संकेत दे रहा है। बीते लगभग एक महीने के भीतर इस डैम का तटबंध तीन बार ध्वस्त हो चुका है, जिससे लाखों क्यूबिक मीटर राखड़ युक्त पानी आसपास के क्षेत्रों और जल स्रोतों से होते हुए हसदेव नदी में जा मिला।लगातार हो रही इन घटनाओं ने न केवल संयंत्र प्रबंधन और तकनीकी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था के लिए भी खतरे की स्थिति पैदा कर दी है।
स्थानीय लोगों के अनुसार पहली बार डैम का तटबंध टूटने के बाद जल्दबाजी में मरम्मत का कार्य कराया गया, लेकिन मरम्मत पूरी होने के कुछ ही दिनों बाद 20 फरवरी को तटबंध फिर से टूट गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मरम्मत कार्य केवल औपचारिकता बनकर रह गया था।
लगातार हो रही इन घटनाओं ने न केवल संयंत्र प्रबंधन और तकनीकी निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था के लिए भी खतरे की स्थिति पैदा कर दी है।स्थानीय लोगों के अनुसार पहली बार डैम का तटबंध टूटने के बाद जल्दबाजी में मरम्मत का कार्य कराया गया, लेकिन मरम्मत पूरी होने के कुछ ही दिनों बाद 20 फरवरी को तटबंध फिर से टूट गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मरम्मत कार्य केवल औपचारिकता बनकर रह गया था।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब दूसरी बार मरम्मत के बाद तटबंध स्थिर भी नहीं हो पाया था कि 2 मार्च को तीसरी बार डैम फिर से ध्वस्त हो गया। मात्र 30 दिनों में तीन बार तटबंध का टूटना प्रबंधन की कार्यशैली और निर्माण गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
तटबंध की संरचना और परिवहन व्यवस्था भी सवालों के घेरे में

स्थानीय लोगों का आरोप है कि डैम का तटबंध मूल रूप से राख और मिट्टी से तैयार किया गया है। जिसमें पूरी ऊंचाई राख से बनाई जाती है और 4 से 8 इंच मिट्टी से ढक दी जाती है और किनारों पर पत्थरों से पेचिंग की जाती है

इसके ऊपर लगातार हाईवा वाहनों से राखड़ का परिवहन कराया जाता है, और राखड़ हाईवा मे लोड करने तटबंध में जेसीबी के जरिए तटबंध के किनारों से राखड़ उठाई जाती है जिससे तटबंध पर भारी दबाव पड़ता है और उसकी संरचना धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है।
पर्यावरण और सिंचाई विभाग की चुप्पी पर भी उठे सवाल
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इतनी गंभीर घटनाओं के बावजूद अब तक पर्यावरण विभाग और सिंचाई विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब लाखों क्यूबिक मीटर राखड़ युक्त पानी नदी में मिल चुका है और उसका असर खेतों और जल स्रोतों तक पहुंच सकता है, तब भी संबंधित विभागों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि क्या यह चुप्पी केवल लापरवाही है या फिर इसे मौन स्वीकृति माना जाए। यदि समय रहते पर्यावरणीय जांच और जल गुणवत्ता की जांच नहीं की गई तो इसका असर आने वाले वर्षों में व्यापक रूप से सामने आ सकता है।
राखड़ डैम हादसों की पूरी कहानी
02 फरवरी 2026

झाबु स्थित राखड़ डैम का तटबंध पहली बार ध्वस्त हुआ। बड़ी मात्रा में राखड़ युक्त पानी आसपास के क्षेत्रों में फैल गया।
20 फरवरी 2026
मरम्मत कार्य पूरा होने के बाद तटबंध दूसरी बार टूट गया। इस दौरान जेसीबी मशीन धंस गई और पाइपलाइन भी बह गई।
02 मार्च 2026

दूसरी मरम्मत के बाद भी तटबंध स्थिर नहीं रह पाया और तीसरी बार डैम ध्वस्त हो गया। मात्र 30 दिनों में तीन बार तटबंध टूटना गंभीर तकनीकी विफलता माना जा रहा है।
मुख्य सवाल
30 दिनों में तीन बार राखड़ डैम का तटबंध कैसे टूट गया?
जब हर वर्ष लाखों रुपये रखरखाव पर खर्च होते हैं तो तटबंध इतना कमजोर क्यों है?
क्या मरम्मत और रखरखाव कार्य केवल कागजों तक सीमित है?
हसदेव नदी में राखड़ मिलने के बावजूद पर्यावरण विभाग और सिंचाई विभाग की चुप्पी क्यों?
क्या यह चुप्पी प्रशासनिक लापरवाही है या फिर मौन स्वीकृति?
बार-बार घटनाओं के बाद भी अब तक जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी और प्रशासनिक जांच अत्यंत आवश्यक हो गई है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और पारदर्शी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पर्यावरण और जनजीवन पर मंडराता यह खतरा समाप्त नहीं होगा।
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