युवा दिवस : जब विवेकानंद की चेतना से राष्ट्र का भविष्य आकार लेता है
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रायपुर छत्तीसगढ़
By ACGN 7647 9817119303 948009
युवा दिवस पर विशेष
आलेख आनंद पाठक | रायपुर
भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है। भारत का इतिहास चेतना का इतिहास है—ऐसी चेतना, जिसने हर युग में पतन के अंधकार से निकलकर नवजागरण का प्रकाश फैलाया। जब उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत आत्महीनता, पराधीनता और सांस्कृतिक विस्मृति के दौर से गुजर रहा था, तब एक युवा संन्यासी ने भारत को उसका वास्तविक परिचय कराया। वही संन्यासी थे—स्वामी विवेकानंद।
युवा दिवस केवल उनके जन्मदिन का औपचारिक स्मरण नहीं है, बल्कि यह उस विचारधारा का पुनः आत्मसात करने का अवसर है, जिसने भारत को यह विश्वास दिलाया कि वह कमजोर नहीं, बल्कि जगतगुरु बनने की सामर्थ्य रखता है। विवेकानंद ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसका केंद्र युवा शक्ति थीसशक्त, चरित्रवान, राष्ट्रनिष्ठ और करुणाशील युवा।
स्वामी विवेकानंद ने समाज के पतन के तीन मूल कारणों को अत्यंत स्पष्टता से रेखांकित किया – जन सामान्य का अनादर, नारी शक्ति का अपमान, और सत्कर्म में लगे लोगों के बीच आपसी ईर्ष्या।
ये तीनों केवल सामाजिक दोष नहीं थे, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को खोखला करने वाले तत्व थे। विवेकानंद का मानना था कि जब समाज अपने सामान्य व्यक्ति का सम्मान खो देता है, जब नारी को शक्ति नहीं बल्कि वस्तु समझा जाता है, और जब अच्छे कार्यों में भी प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या में बदल जाती है, तब धर्म का पतन प्रारंभ हो जाता है। उनके अनुसार इन तीनों समस्याओं का समाधान ही भारत के उत्थान का एकमात्र मार्ग है।
धर्म : कर्मकांड नहीं, जीवन दर्शन
विवेकानंद के लिए धर्म कोई संकीर्ण पंथ या पूजा-पद्धति नहीं था। उनके लिए धर्म जीवन को ऊँचा उठाने की प्रक्रिया था।वे स्पष्ट कहते थे “जब तक भारत में धर्म प्रतिष्ठित नहीं होगा, तब तक सारे प्रयास अधूरे रहेंगे।”
यह धर्म सेवा का धर्म था, समर्पण का धर्म था, और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का धर्म था। वे भारतीय होने के अर्थ को केवल नागरिकता तक सीमित नहीं रखते थे। वे कहते थे भारतीय होने का अर्थ है अपने पूर्वजों की संस्कृति को जानना, अपने सनातन मूल्यों को समझना और अपनी मातृभूमि की सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना। उनके शब्दों में मातृभूमि की सेवा के बिना मुक्ति संभव नहीं।
नरेंद्र से विवेकानंद : एक साधारण युवक से वैश्विक चेतना तक
12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त जिन्हें बचपन में वीरेश्वर कहा जाता था एक जिज्ञासु, तर्कशील और विद्रोही प्रवृत्ति के युवक थे। गुरु रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य ने उनके जीवन को दिशा दी और नरेंद्र से विवेकानंद का जन्म हुआ।
1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद वह क्षण था, जब भारत ने पुनः विश्व मंच पर अपनी आत्मा को प्रकट किया। उस समय पश्चिमी जगत भारत को पिछड़ा, अंधविश्वासी और दयनीय दृष्टि से देखता था। विवेकानंद को मंच से दूर रखने के प्रयास हुए, किंतु जब उन्हें कुछ ही मिनट बोलने का अवसर मिला वे मिनट इतिहास में अमर हो गए।
“सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका”—इन शब्दों के साथ पूरा सभागार खड़ा हो गया। यह केवल भाषण नहीं था, यह भारत की आत्मा की गर्जना थी। उन्होंने निर्भीक होकर कहा “अध्यात्म विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा।”
अमेरिकी मीडिया ने उन्हें नाम दिया “साइक्लोनिक हिंदू” क्योंकि उनके विचारों की गति, गहराई और प्रभाव असाधारण था।
विवेकानंद और राष्ट्र निर्माण
स्वामी विवेकानंद ने कभी प्रत्यक्ष राजनीति नहीं की, किंतु उनके विचारों ने स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक नींव तैयार की, उन्होंने नए भारत के निर्माण का आह्वान करते हुए कहा, नया, भारत मोची की दुकान से निकलेगा, खेत-खलिहान से उठेगा,
कारखानों, हाटों और बाज़ारों से आकार लेगा।
यही आह्वान जनता के हृदय तक पहुँचा। महात्मा गांधी ने स्वीकार किया कि विवेकानंद के ग्रंथों ने उनके देशप्रेम को हजारों गुना बढ़ा दिया। सुभाषचंद्र बोस ने कहा कि विवेकानंद का धर्म राष्ट्रीयता को जाग्रत करने वाला था। जवाहरलाल नेहरू ने माना कि उनकी पीढ़ी के अधिकांश युवक विवेकानंद से गहराई से प्रभावित थे।
महाकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें वह सेतु कहा, जहाँ प्राचीन और नवीन भारत परस्पर आलिंगन करते हैं।
आज का युवा और विवेकानंद की प्रासंगिकता
आज का युवा तकनीक, अवसर और वैश्विक संपर्क से समृद्ध है, किंतु भीतर से असमंजस में भी है। ऐसे समय में विवेकानंद केवल स्मरणीय नहीं, बल्कि मार्गदर्शक हैं। वे आज भी कहते प्रतीत होते हैं अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचानो, दरिद्र नारायण में भगवान को देखो, और राष्ट्र सेवा को ही जीवन की साधना बनाओ।
युवा दिवस पर विवेकानंद को पुष्प अर्पित करना पर्याप्त नहीं। उनके विचारों को आचरण में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। जब युवा चरित्रवान होगा, राष्ट्रनिष्ठ होगा और सेवा को जीवन का मूल्य बनाएगा तभी भारत अपने वास्तविक गौरव को प्राप्त करेगा।
अंतिम विचार
विवेकानंद इतिहास नहीं हैं—वे भविष्य हैं।
वे एक व्यक्ति नहीं—एक जाग्रत राष्ट्र हैं।
यदि भारत को समझना है—विवेकानंद को पढ़िए।
यदि भारत को गढ़ना है—विवेकानंद को जीएँ।
युवा दिवस का यही सार है, यही संदेश है।
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