देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की जन्मकथा, पत्थर में प्राण, हाथों में हुनर अद्भुत निर्माण परंपराओं और मेहनतकश हाथों को समर्पित
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विश्वकर्मा जयंती विशेष
आलेख – प्रदीप मिश्रा
पत्थर में प्राण, हाथों में हुनर : देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की जन्मकथा से लेकर लंका, द्वारका और प्राचीन मंदिरों की मान्यताओं तक, हर हुनरमंद हाथ को नमन करने वाला पर्व
मेहनत के हाथों का सबसे बड़ा पर्व
ACGN – विश्वकर्मा जयंती आते ही देश के कारखानों, बिजली संयंत्रों, वर्कशॉप, दुकानों और निर्माण स्थलों का माहौल बदल जाता है। कहीं मशीनों की पूजा होती है, कहीं औजारों को फूल चढ़ाए जाते हैं तो कहीं भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा के सामने दीप जलाकर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यह पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि उन हाथों को सम्मान देने का दिन है, जिनके श्रम से हमारा घर, सड़क, कारखाना और पूरा समाज आकार लेता है।
किसी के हाथ में हथौड़ा है, किसी के हाथ में छैनी, किसी के हाथ में रिंच तो किसी के हाथ में कंप्यूटर। औजार अलग हैं, लेकिन भावना एक है, कुछ नया बनाना, कुछ बेहतर बनाना।
कौन हैं भगवान विश्वकर्मा?

हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी, दिव्य वास्तुकार और देवताओं के महान कारीगर के रूप में माना जाता है। ‘विश्वकर्मा’ नाम का संबंध व्यापक रूप से विश्व के निर्माण और सृजन की अवधारणा से जोड़ा जाता है।
ऋग्वेद में ‘विश्वकर्मन्’ नाम से दिव्य सृजनकर्ता का उल्लेख मिलता है, जबकि बाद के धार्मिक और पौराणिक साहित्य में उनका स्वरूप देवताओं के शिल्पकार के रूप में अधिक स्पष्ट होता गया।
इसलिए विश्वकर्मा केवल एक कारीगर के प्रतीक नहीं हैं। वे भारतीय परंपरा में ज्ञान, कल्पना, तकनीक, वास्तु और मेहनत के मिलन का प्रतीक बन गए।
भगवान विश्वकर्मा का जन्म कैसे हुआ?
भगवान विश्वकर्मा की जन्मकथा को लेकर धार्मिक ग्रंथों में अलग-अलग परंपराएं मिलती हैं। विष्णु पुराण की एक परंपरा के अनुसार वे प्रभास, जो आठ वसुओं में से एक थे, और योगसिद्धा के पुत्र बताए गए हैं। आगे चलकर उन्हें प्रजापति और देवताओं का महान शिल्पकार बताया गया।
इससे यह समझ आता है कि विश्वकर्मा की कथा केवल किसी एक समय या एक स्थान से जुड़ी नहीं है। उनकी अवधारणा वैदिक काल से लेकर पुराणों और लोक परंपराओं तक अलग-अलग रूपों में विकसित हुई है।
यही वजह है कि उनके जन्म के बारे में एक ही कहानी को अंतिम और सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। यह विषय धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के संदर्भ में ही समझना अधिक सही है।
कहां से आए देवशिल्पी?
यह सवाल अक्सर मन में आता है कि आखिर भगवान विश्वकर्मा कहां से आए? धार्मिक परंपराओं में उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह किसी एक नगर से आया हुआ व्यक्ति नहीं माना गया, बल्कि दिव्य शिल्प शक्ति के रूप में देखा गया है। वैदिक साहित्य में विश्वकर्मन् की अवधारणा सृष्टि और दिव्य निर्माण से जुड़ी है, जबकि पुराणों में वे देवताओं के शिल्पकार के रूप में सामने आते हैं।
अर्थात विश्वकर्मा की कथा को केवल “कहां जन्मे?” के सवाल से नहीं, बल्कि सृजन की भारतीय अवधारणा के रूप में समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
कितनी कलाओं के ज्ञाता थे विश्वकर्मा?
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी परंपराओं में उन्हें अनेक प्रकार की कलाओं और शिल्पों का आचार्य माना गया है। विष्णु पुराण की परंपरा में उन्हें असंख्य शिल्प और कलाओं का ज्ञाता बताया गया है।
उनसे जुड़ी शिल्प परंपरा में वास्तुकला, भवन निर्माण, नगर नियोजन, मूर्तिकला, धातुकर्म, आभूषण निर्माण, रथ निर्माण, औजार निर्माण और सजावटी शिल्प जैसी अनेक विधाओं की कल्पना की गई है।
यानी विश्वकर्मा का अर्थ केवल मकान बनाने वाला वास्तुकार नहीं है। उनके स्वरूप में डिजाइन, निर्माण, कला, तकनीक और कौशल सभी एक साथ दिखाई देते हैं।
पत्थर को मूर्ति और धातु को औजार बनाने की कला
कल्पना कीजिए उस समय की, जब आज जैसी मशीनें नहीं थीं। न आधुनिक क्रेन थी, न इलेक्ट्रिक कटर और न कंप्यूटर से तैयार डिजाइन।
फिर भी विशाल पत्थरों को काटा गया, उन्हें आकार दिया गया और मंदिरों की दीवारों पर इतनी बारीक आकृतियां उकेरी गईं कि सदियों बाद भी लोग उन्हें देखकर रुक जाते हैं।
यही भारत की प्राचीन शिल्प परंपरा की खूबसूरती है। भगवान विश्वकर्मा इसी कारीगरी, धैर्य और सृजनात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं।
सोने की लंका से जुड़ी अद्भुत कथा

भगवान विश्वकर्मा की सबसे चर्चित पौराणिक मान्यताओं में स्वर्ण लंका का निर्माण शामिल है। धार्मिक परंपरा में लंका को उनकी अद्भुत वास्तुकला से जोड़ा जाता है।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के लिए स्वर्ण महल बनाया गया था और बाद में रावण ने उसे दक्षिणा में मांग लिया।
रामायण की कथा में यही लंका रावण की राजधानी के रूप में सामने आती है। यह पूरा विवरण धार्मिक-पौराणिक परंपरा का हिस्सा है, इसलिए इसे आधुनिक पुरातात्विक प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि आस्था और कथा के रूप में देखना चाहिए।
द्वारका – समुद्र के किनारे बसी दिव्य नगरी

भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका को भी धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा की निर्माण-कला से जोड़ा जाता है।
कथा के अनुसार समुद्र के किनारे भगवान कृष्ण के लिए एक भव्य नगरी बसाई गई। इस नगरी में सुंदर भवन, मार्ग और व्यवस्थित नगर जीवन की कल्पना की गई है।
द्वारका की धार्मिक महत्ता आज भी बनी हुई है और आधुनिक पुरातात्विक अध्ययन भी इस क्षेत्र में प्राचीन समुद्री गतिविधियों तथा पुरातात्विक अवशेषों की चर्चा करते हैं। लेकिन किसी वर्तमान पुरातात्विक संरचना को सीधे भगवान विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया प्रमाणित करना अलग विषय है।
इंद्रप्रस्थ और अद्भुत महल की कथा

महाभारत की परंपरा में पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ का उल्लेख मिलता है। धार्मिक कथाओं में इसकी भव्यता और अद्भुत स्थापत्य का वर्णन मिलता है।
महाभारत की माया सभा से जुड़ी कथा में ऐसा अद्भुत भवन बताया गया है, जहां जल और भूमि के भ्रम के कारण देखने वाला भी धोखा खा जाए।
यह कथा भारतीय स्थापत्य कल्पना की अद्भुत ऊंचाई को दर्शाती है और विश्वकर्मा की व्यापक शिल्प परंपरा की याद दिलाती है।
देवताओं के भवनों से लेकर दिव्य रथों तक

पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के महलों, भवनों और रथों के निर्माण से भी जोड़ा गया है। इंद्र की अमरावती जैसी दिव्य नगरी की कल्पना भी इसी परंपरा का हिस्सा है।
उनके बारे में यह मान्यता भी मिलती है कि वे केवल भवन बनाने वाले नहीं थे, बल्कि ऐसे शिल्पकार थे जो रथ, वाहन, आभूषण और दिव्य उपकरण तक बना सकते थे।
दिव्य अस्त्रों के निर्माण की मान्यता

भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में कई दिव्य अस्त्रों के निर्माण का उल्लेख भी मिलता है। विभिन्न पौराणिक कथाओं में इंद्र के वज्र, भगवान शिव के त्रिशूल और भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र जैसे दिव्य आयुधों को विश्वकर्मा की शिल्पकला से जोड़ा गया है।

इन कथाओं को धार्मिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए। इनके माध्यम से यह संदेश मिलता है कि ज्ञान और कौशल ही शक्ति को आकार देते हैं।
पुष्पक विमान और उड़ने की कल्पना

रामायण की परंपरा में पुष्पक विमान का वर्णन मिलता है। यह एक दिव्य उड़ने वाला वाहन बताया गया है और इसकी कथा भी विश्वकर्मा की शिल्प परंपरा से जुड़ती है।
आज के आधुनिक विमान को पुष्पक विमान का ऐतिहासिक प्रमाण मानना उचित नहीं है, लेकिन हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक कल्पना में आकाश में उड़ने वाले वाहन का विचार भारतीय कल्पनाशक्ति की विशालता को जरूर दर्शाता है।
पुरी के जगन्नाथ से भी जुड़ी विश्वकर्मा की कथा

ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं से जुड़ी धार्मिक कथा में भी एक दिव्य शिल्पकार का उल्लेख मिलता है, जिसे विश्वकर्मा की परंपरा से जोड़ा जाता है।
वहीं पुरी के वर्तमान ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण ऐतिहासिक रूप से गंग वंश के काल से जोड़ा जाता है।
यहां एक महत्वपूर्ण सीख है, आस्था और इतिहास दोनों की अपनी जगह है। दोनों को मिलाकर देखने के बजाय उनके अपने संदर्भ में समझना चाहिए।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में विश्वकर्मा की स्मृति
देश के अनेक हिस्सों में भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी लोककथाएं, मंदिर और धार्मिक परंपराएं मिलती हैं। कहीं वे वास्तु के देवता हैं, कहीं शिल्प के, कहीं औजारों के और कहीं निर्माण-कला के प्रतीक।
लेकिन इन सभी कथाओं की आत्मा एक ही है – काम करने वाले हाथों का सम्मान।
भारत की यही परंपरा है कि जिसने समाज के लिए कुछ बनाया, उसके श्रम को केवल मजदूरी तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे सम्मान और आस्था से जोड़ा गया।
छत्तीसगढ़ में भी प्राचीन शिल्प की अद्भुत विरासत
छत्तीसगढ़ की धरती भी प्राचीन मंदिरों और शिल्पकला से समृद्ध है। कोरबा का पाली शिव मंदिर, सिरपुर, ताला, मल्हार, रतनपुर, राजिम, खरौद और भोरमदेव जैसे स्थान आज भी प्राचीन स्थापत्य की कहानी कहते हैं।

इन सभी मंदिरों को भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित बताना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इनकी कला और स्थापत्य उस विशाल भारतीय शिल्प परंपरा की याद जरूर दिलाते हैं, जिसके प्रतीक भगवान विश्वकर्मा हैं।
पाली का मंदिर और एक रात की लोककथा

कोरबा जिले के पाली स्थित प्राचीन शिव मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताएं आज भी लोगों के बीच सुनाई देती हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर ऐसी लोककथा भी प्रचलित है कि इसे रातों-रात बनाने का प्रयास किया गया और सूर्योदय होते ही काम रुक गया।
यह लोकमान्यता है, प्रमाणित इतिहास नहीं। लेकिन इस कहानी में छिपी भावना आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं कि मंदिर किसने बनाया? सवाल यह भी है कि इतने विशाल पत्थरों को आकार देने वाले वे कारीगर कौन थे, जिनका नाम इतिहास में शायद दर्ज भी नहीं हुआ?
जांजगीर की शिल्प परंपरा भी करती है आकर्षित

जांजगीर-चांपा क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्य परंपरा भी अपने भीतर कई कहानियां समेटे हुए है। पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी देखकर आज भी मन में सवाल उठता है कि उस दौर के कारीगरों के पास कितना धैर्य और कितना कौशल रहा होगा।
स्थानीय लोककथाओं में मंदिर निर्माण को लेकर अनेक मान्यताएं हैं। इन मान्यताओं में दिव्य शिल्प शक्ति और भगवान विश्वकर्मा का स्मरण भी मिलता है।
बिजली संयंत्रों और कारखानों में भी गूंजा विश्वकर्मा जयंती का उत्सव

विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के विभिन्न संयंत्रों में भी श्रद्धा और उत्साह के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना की गई। मड़वा जांजगीर-चांपा, डीएसपीएम कोरबा और एचटीपीपी कोरबा सहित विभिन्न स्थानों पर कर्मचारियों ने अपने कार्यस्थल, मशीनों और औजारों की पूजा की।
औद्योगिक नगरी कोरबा में इस पर्व का महत्व और भी खास है, क्योंकि यहां हजारों लोगों का जीवन बिजली उत्पादन, कोयला और तकनीकी कार्यों से जुड़ा है।
MCC-11 में कर्मा की थाप और विश्वकर्मा की पूजा

एचटीपीपी कोरबा के बाह्य कोयला प्रबंधन विभाग के मेक-11 में भगवान विश्वकर्मा की स्थापना कर पूजा-अर्चना की गई। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के पारंपरिक कर्मा नृत्य ने पूरे कार्यक्रम में उत्साह भर दिया।
एक तरफ विशाल मशीनें थीं, दूसरी तरफ कर्मा की थाप। एक ओर आधुनिक तकनीक थी, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी संस्कृति। यह दृश्य अपने आप में विश्वकर्मा जयंती के अर्थ को सामने लाता है, पुरानी परंपरा और आधुनिक निर्माण का मिलन।
आखिर क्यों की जाती है औजारों की पूजा ?
जब कोई कारीगर अपने औजार पर फूल चढ़ाता है, तो वह केवल लोहे के औजार की पूजा नहीं करता। वह उस साधन का सम्मान करता है, जिसके सहारे उसका परिवार चलता है।
जब कोई कर्मचारी मशीन के सामने दीप जलाता है, तो उसके पीछे उसकी मेहनत, जिम्मेदारी और वर्षों का अनुभव होता है। इसीलिए विश्वकर्मा जयंती वास्तव में औजारों के साथ-साथ मेहनत की पूजा है।
आज के भारत में विश्वकर्मा का अर्थ
आज भारत में तकनीक तेजी से बदल रही है। मशीनें आधुनिक हो रही हैं, कंप्यूटर डिजाइन तैयार कर रहे हैं और नई तकनीक उत्पादन के तरीके बदल रही है।
लेकिन मूल बात आज भी वही है कुछ बनाने के लिए ज्ञान चाहिए, कौशल चाहिए और मेहनत चाहिए।
पहले पत्थर पर छैनी चलती थी, आज मशीनें और कंप्यूटर डिजाइन बनाते हैं। पहले कारीगर हाथ से रथ बनाता था, आज इंजीनियर आधुनिक वाहन तैयार करता है। समय बदला है, लेकिन सृजन की भावना नहीं बदली।
नई पीढ़ी से एक सवाल
क्या हम अपने पारंपरिक कारीगरों के हुनर को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा पाएंगे?
क्या हमारे गांवों में मौजूद पुराने शिल्प को आधुनिक रोजगार से जोड़ा जा सकेगा?
क्या मशीनों के बढ़ते दौर में हम इंसान के हाथों के कौशल का महत्व समझ पाएंगे?
शायद यही सवाल विश्वकर्मा जयंती हमें हर वर्ष पूछती है।
आज पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर बड़े ही हर्षोल्लास के साथ धूमधाम से श्रद्धालुओं ने विश्वकर्मा जयंती मनाई पूरे देश में जगह-जगह भक्ति में वातावरण निर्मित रहा
हर हुनरमंद हाथ को नमन
भगवान विश्वकर्मा की कथा केवल लंका, द्वारका, इंद्रप्रस्थ या दिव्य अस्त्रों तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी पहचान उस भावना में है, जिसमें निर्माण करने वाले हाथ को सम्मान दिया जाता है।
जिस हाथ में हथौड़ा है, वह भी सृजन का हाथ है।
जिस हाथ में छैनी है, वह भी सृजन का हाथ है।
जिस हाथ में औजार है, वह भी सृजन का हाथ है।
और जिस हाथ में आधुनिक तकनीक है, वह भी उसी सृजन की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
विश्वकर्मा जयंती पर उन सभी मेहनतकश हाथों को नमन, जिनके पसीने से घर बनते हैं, मशीनें चलती हैं, उद्योग खड़े होते हैं और देश आगे बढ़ता है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम भगवान विश्वकर्मा की पूजा के साथ-साथ मेहनत करने वाले हर व्यक्ति का सम्मान करने का संकल्प लें। अपने पारंपरिक कारीगरों के हुनर को बचाएं, अपनी प्राचीन धरोहरों की रक्षा करें और नई पीढ़ी को कौशल, मेहनत और सृजन का महत्व समझाएं।
हर हाथ में हुनर हो, हर हुनर को सम्मान मिले और हर निर्माण में समाज के कल्याण की भावना हो, यही भगवान विश्वकर्मा के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।
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17 सितंबर का एक और खास संयोग
विश्वकर्मा जयंती के साथ 17 सितंबर का दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के कारण भी विशेष है। 17 सितंबर 1950 को जन्मे नरेंद्र मोदी वर्ष 2026 में 76 वर्ष के हुए हैं। उनके सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के संदर्भ में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
‘आशीर्वाद का दीया’ से सेवा संकल्प
अभियान के पहले दिन ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के माध्यम से दीप जलाकर शुभकामनाएं देने की अपील की गई है। इसके साथ ही सेवा, जनभागीदारी, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। देशभर में शासन-प्रशासन की ओर से भी सेवा और जनहित से संबंधित गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी संगठन द्वारा भी विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से जनभागीदारी की जा रही है।
श्रम और सेवा का संदेश
विश्वकर्मा जयंती श्रम, कौशल, तकनीक और निर्माण करने वाले हाथों के सम्मान का संदेश देती है। वहीं सेवा संकल्प अभियान सेवा और जनभागीदारी से जुड़ी गतिविधियों पर केंद्रित है। इस तरह 17 सितंबर धार्मिक आस्था के साथ-साथ सेवा, श्रम, कौशल और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों का महत्वपूर्ण दिन बन गया है।
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