“खनिज निकलते रहे, छत्तीसगढ़ को क्या मिला?”
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संपादकीय
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक
✍️ कलम की धार ✍️
जनता की आवाज़ • सच्चाई का आईना • बदलाव का हथियार, जनहित की निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता
By ACGN – 7647981711, 9303948009
हम लाते हैं वह खबर, जो जरूरी है,वह सवाल, जो पूछना जरूरी है और वह सच, जिसे सामने आना जरूरी है।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की “कलम की धार” केवल समाचारों का संग्रह नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने का एक सशक्त प्रयास है। हमारी कोशिश है कि हर सप्ताह उन मुद्दों को सामने लाया जाए, जिनका सीधा संबंध आम आदमी, गांव, किसान, मजदूर, युवा, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समाज के भविष्य से है, हमारी पत्रकारिता किसी व्यक्ति, दल या संस्था के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि जनहित और सच्चाई के पक्ष में है
जहां सवाल होगा, वहां हमारी कलम पहुंचेगी, जहां जनसमस्या होगी, वहां हमारी नजर होगी, जहां जवाबदेही जरूरी होगी, वहां सवाल जरूर पूछा जाएगा, क्योंकि लोकतंत्र में सवाल करना विरोध नहीं, जागरूक नागरिक होने की पहचान है।
कलम की धार – हर खबर पर तिरछी नजर, जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता।
आज का विषय :-“खनिज हमारा, दोहन किसका?”
छत्तीसगढ़ की धरती के खजाने, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर एक जरूरी सवाल।
आलेख – प्रदीप मिश्रा
धरती के नीचे दौलत, ऊपर धुआं, फिर भी छत्तीसगढ़ का आम आदमी क्यों पूछ रहा है, हमारे हिस्से में आखिर क्या आया?
सवाल धरती से है, छत्तीसगढ़ की धरती को प्रकृति ने खाली नहीं बनाया। इस मिट्टी के नीचे कोयला है, लौह अयस्क है, बॉक्साइट है, चूना पत्थर है, डोलोमाइट है और कई दूसरे खनिज संसाधन हैं। कोरबा की पहचान कोयले से है। कटघोरा और आसपास के क्षेत्रों में रणनीतिक खनिजों को लेकर संभावनाओं और चर्चाओं ने लोगों का ध्यान खींचा है। सरगुजा, सूरजपुर और प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी खनिज संपदा ने छत्तीसगढ़ को देश के औद्योगिक नक्शे पर महत्वपूर्ण स्थान दिया है।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ के पास कितना खनिज है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस खनिज संपदा से छत्तीसगढ़ के लोगों के हिस्से में कितना आया? और उससे भी बड़ा सवाल, जब धरती का खजाना निकाला जाता है, जंगल प्रभावित होते हैं, जमीन बदलती है, हवा में राख और धूल का दबाव बढ़ता है, तब इसकी कीमत कौन चुकाता है?
यहीं से शुरू होती है कलम की धार
कोयले की धरती और विकास की कीमत

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले को देश की ऊर्जा जरूरतों से जोड़कर देखा जाता है। यहां कोयला है, बिजली उत्पादन है और बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान हैं।
लेकिन खदानों के आसपास रहने वाले गांवों की तरफ नजर डालें तो एक सवाल बार-बार सामने आता है
जिस धरती से देश को ऊर्जा मिलती है, क्या उस धरती के लोगों को भी उतनी ही मजबूती से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, पानी और भविष्य की सुरक्षा मिल रही है?
अगर खनिज संपदा वाला इलाका देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है, तो उस इलाके की स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत क्यों नहीं होनी चाहिए?, क्या विकास का मतलब सिर्फ खनिज निकालना और बिजली बनाना है? या विकास का मतलब यह भी होना चाहिए कि जिस जमीन ने संसाधन दिया, वहां रहने वाली अगली पीढ़ी को बेहतर भविष्य मिले?
कच्चा माल हमारा, बड़ा लाभ किसका?
यह सवाल किसी उद्योग के खिलाफ नहीं है,उद्योग चाहिए, निवेश चाहिए, रोजगार चाहिए, बिजली चाहिए, विकास चाहिए, लेकिन क्या ऐसा विकास नहीं हो सकता जिसमें खनिज के साथ स्थानीय समृद्धि भी निकले?
अगर छत्तीसगढ़ से कच्चा खनिज बाहर चला जाए और उसकी बड़ी वैल्यू एडेड अर्थव्यवस्था कहीं और बने, तो क्या हमें इस मॉडल पर सवाल नहीं करना चाहिए?
क्यों न प्रदेश में ही अधिक से अधिक प्रसंस्करण, वैल्यू एडिशन और डाउनस्ट्रीम उद्योग विकसित हों?क्यों न स्थानीय युवाओं को उन उद्योगों के लिए प्रशिक्षित किया जाए?, क्यों न स्थानीय छोटे कारोबारियों, परिवहन, मरम्मत, मशीनरी, सेवा क्षेत्र और उद्यमियों को भी औद्योगिक विकास से जोड़ा जाए?
खनिज सिर्फ जमीन से निकलने वाली वस्तु नहीं है। सही नीति हो तो वही खनिज स्थानीय अर्थव्यवस्था की पूरी श्रृंखला खड़ी कर सकता है।
बाहर से उद्योग आए, लेकिन स्थानीय युवा बाहर क्यों जाए?

यह सवाल शायद सबसे ज्यादा चुभने वाला है। जब किसी इलाके में बड़ा उद्योग आता है तो स्वाभाविक रूप से उम्मीद पैदा होती है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, लेकिन क्या केवल परियोजना आने से स्थानीय रोजगार सुनिश्चित हो जाता है? क्या स्थानीय युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था परियोजना शुरू होने से पहले नहीं होनी चाहिए?, क्या स्थायी रोजगार और ठेका रोजगार के बीच का अंतर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं होना चाहिए?, क्या स्थानीय युवाओं को केवल छोटे-मोटे काम तक सीमित रखना सही है?
अगर उद्योग हमारे इलाके में है तो क्या हमारे बच्चों को उसके तकनीकी और प्रबंधन स्तर के रोजगार तक पहुंचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?
यही असली विकास की परीक्षा है।
राख कौन झेले और मुनाफा कौन ले?

जहां ताप विद्युत और औद्योगिक गतिविधियां हैं, वहां फ्लाई ऐश एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन सकती है। राख का उत्पादन, उसका सुरक्षित परिवहन, उपयोग, भंडारण और निपटान – हर स्तर पर नियमों और निगरानी की जरूरत होती है।
सवाल यह है कि राख की यात्रा कितनी पारदर्शी है?
कहां से निकली?, कितनी निकली?, कहां भेजी गई?, किस काम में इस्तेमाल हुई?, कहां भंडारित हुई?, और क्या कहीं नियमों के विपरीत खुले में या असुरक्षित तरीके से डंपिंग तो नहीं हो रही?
कागज पर राख का प्रबंधन और जमीन पर राख का सच, क्या दोनों एक जैसे हैं?
यही सवाल प्रशासन, पर्यावरण विभाग और संबंधित उद्योगों से पूछा जाना चाहिए।
जंगल कटे, पौधे लगे – लेकिन जंगल वापस आया क्या?

यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, हम सब से है।
विकास के लिए कहीं पेड़ कटते हैं तो प्रतिपूरक वनीकरण और पौधरोपण की बातें होती हैं। लेकिन क्या एक पेड़ काटकर दूसरा पौधा लगा देना ही जंगल वापस लाने के बराबर है?, पेड़ लगाकर फोटो लेने से पर्यावरण ठीक नहीं होगा। जिस पौधे को लगाया जा रहा है,
उसकी देखरेख की जिम्मेदारी कौन लेगा? कितने पौधे लगाए गए?,कितने जीवित हैं?, कितने सूख गए?, कितने पेड़ बन पाए?
क्या इसकी सार्वजनिक रिपोर्टिंग होनी चाहिए?
बिल्कुल होनी चाहिए।
क्योंकि पौधरोपण की सफलता पौधों की संख्या से नहीं, उनके जीवित रहने की दर से तय होनी चाहिए।
एक पौधा लगाना आसान है,उसे वर्षों तक बचाना कठिन है, और एक जंगल बनाना उससे भी कठिन।
क्या जंगल सिर्फ नक्शे पर बचेंगे?,

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं। जंगल पानी हैं। जंगल मिट्टी हैं। जंगल वन्यजीव हैं। जंगल ग्रामीण जीवन हैं।जंगल हवा हैं। जंगल आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा हैं।
इसलिए जब किसी खनन या औद्योगिक परियोजना के कारण वन क्षेत्र प्रभावित होने की बात सामने आती है, तब सवाल केवल अनुमति का नहीं होना चाहिए।
सवाल होना चाहिए, क्या इसका पर्यावरणीय मूल्य वास्तव में समझा गया है?, क्या स्थानीय लोगों की चिंता सुनी गई?, क्या जलस्रोतों पर असर का आकलन हुआ?, क्या वन्यजीवों पर प्रभाव देखा गया?, क्या पुनर्वास और पुनर्स्थापन की व्यवस्था पर्याप्त है?
और सबसे महत्वपूर्ण खनन खत्म होने के बाद वहां बचेगा क्या?
खदान खत्म होगी तो कहानी खत्म होगी क्या?

आज खनिज निकाला जा रहा है, कल खनिज खत्म होगा, लेकिन उस क्षेत्र में रहने वाले लोग तो वहीं रहेंगे।
यही वह सवाल है जिसे विकास की हर योजना में शुरुआत से शामिल करना चाहिए।
खनन के बाद जमीन का क्या होगा? जल स्रोतों का क्या होगा?, स्थानीय रोजगार का क्या होगा?, सड़कों और बुनियादी ढांचे का क्या होगा?
क्या खनन प्रभावित क्षेत्र के लिए दीर्घकालीन पुनर्वास और आर्थिक पुनर्निर्माण की योजना है?
क्या हमने खनिज निकालने की योजना तो बना ली, लेकिन खनन के बाद की जिंदगी की योजना बनाना भूल गए?
DMF का पैसा किसके लिए है?

खनन क्षेत्रों में जिला खनिज प्रतिष्ठान यानी DMF जैसी व्यवस्था का उद्देश्य खनन प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के विकास से जुड़ा है।
इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है, जिस क्षेत्र की धरती से खनिज निकला, क्या उस क्षेत्र की सबसे जरूरी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से होना चाहिए या नहीं?
पानी चाहिए तो पानी, अस्पताल चाहिए तो अस्पताल, स्कूल चाहिए तो स्कूल, सड़क चाहिए तो सड़क, कौशल प्रशिक्षण चाहिए तो कौशल प्रशिक्षण।
लेकिन क्या लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि उनके जिले में DMF से कितना पैसा आया और कहां खर्च हुआ?
क्या गांव स्तर तक इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए? क्या सामाजिक अंकेक्षण और वास्तविक परिणामों की समीक्षा होनी चाहिए?
जनता का पैसा जनता के सामने हिसाब के साथ आए, क्या इससे पारदर्शिता मजबूत नहीं होगी?
खनिज संपदा का असली मॉडल क्या होना चाहिए?
शायद अब समय आ गया है कि हम विकास को केवल खनन की मात्रा से न मापें।
विकास का नया पैमाना होना चाहिए, खनिज + उद्योग + स्थानीय रोजगार + कौशल + स्थानीय कारोबार + राजस्व + पर्यावरण सुरक्षा + भविष्य की पीढ़ी।
अगर खनिज निकला लेकिन स्थानीय युवा बेरोजगार रहे, तो सवाल रहेगा। अगर उद्योग आया लेकिन पर्यावरण बिगड़ा, तो सवाल रहेगा। अगर पौधे लगे लेकिन जंगल नहीं बचा, तो सवाल रहेगा।
अगर DMF आया लेकिन गांव की मूल समस्या जस की तस रही, तो सवाल रहेगा। और अगर खदान बंद होने के बाद पूरा क्षेत्र संकट में आ गया, तो विकास के मॉडल पर फिर सवाल उठेगा।
यह विरोध नहीं, जवाबदेही की मांग है
किसी उद्योग के खिलाफ होना और उद्योग से सवाल पूछना दो अलग बातें हैं।
छत्तीसगढ़ को उद्योग चाहिए। निवेश चाहिए। रोजगार चाहिए। राजस्व चाहिए।
लेकिन क्या छत्तीसगढ़ को सुरक्षित पर्यावरण भी नहीं चाहिए?
क्या स्थानीय लोगों का अधिकार भी नहीं होना चाहिए? क्या पारदर्शिता की मांग विकास विरोधी है?, क्या प्रदूषण पर सवाल करना उद्योग विरोध है?क्या जंगल बचाने की बात करना निवेश विरोध है?
नहीं।
सवाल लोकतंत्र की ताकत है। और जनहित में पूछा गया सवाल किसी व्यक्ति या दल का दुश्मन नहीं होता।
छत्तीसगढ़ खाली करके मत जाना
यह बात शायद सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाली है। आज हमारी पीढ़ी खनिज देख रही है। कल की पीढ़ी शायद केवल उसकी कहानी सुने।
अगर हमने जमीन से सब कुछ निकाल लिया, जंगलों को कमजोर कर दिया, जलस्रोतों को प्रभावित कर दिया और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी
“आपके पास सब कुछ था, फिर आपने हमारे लिए क्या छोड़ा?”
यह सवाल किसी सरकार से ज्यादा बड़ा है। यह सवाल किसी कंपनी से ज्यादा बड़ा है। यह सवाल पूरे समाज से है।
अब सवाल जनता का भी है
क्या हमें केवल यह देखना है कि हमारे इलाके में कितना निवेश आया?, या यह भी देखना है कि निवेश से हमारे इलाके को क्या मिला?
क्या हमें केवल यह देखना है कि कितने पौधे लगाए गए?, या यह भी पूछना है कि उनमें से कितने पेड़ बने?
क्या हमें केवल यह देखना है कि कितनी राख का उपयोग बताया गया? या यह भी देखना है कि जमीन पर राख का प्रबंधन वास्तव में कैसा है?
क्या हमें केवल खनिज उत्पादन का आंकड़ा जानना है?, या यह भी जानना है कि उस खनिज से स्थानीय रोजगार और स्थानीय कारोबार कितना बढ़ा?
यही जागरूक नागरिक की पहचान है।
अंतिम सवाल – खनिज हमारा, दोहन किसका?
छत्तीसगढ़ की धरती ने देश को बहुत कुछ दिया है।
अब समय है कि विकास की परिभाषा थोड़ी बदली जाए। ऐसा विकास हो जिसमें उद्योग भी हों और जंगल भी। खनन भी हो और पर्यावरण सुरक्षा भी।निवेश भी हो और स्थानीय रोजगार भी। राजस्व भी आए और गांव भी मजबूत हों। खनिज भी निकले और भविष्य भी सुरक्षित रहे।
छत्तीसगढ़ का खनिज छत्तीसगढ़ की समृद्धि का आधार बने – सिर्फ किसी और की समृद्धि का साधन नहीं।
क्योंकि सवाल सिर्फ आज की कमाई का नहीं है, सवाल आने वाली पीढ़ियों के अधिकार का है और जब धरती के नीचे छिपी संपदा बाहर आए, तो उसके साथ एक सवाल भी बाहर आना चाहिए
“खनिज हमारा है, तो उसके भविष्य पर पहला सवाल हमारा क्यों नहीं?”
यह आलेख किसी उद्योग के खिलाफ नहीं है। किसी पार्टी या व्यक्ति के खिलाफ भी नहीं है। यह विकास रोकने की बात नहीं करता। यह सिर्फ इतना पूछता है कि विकास ऐसा क्यों न हो जिसमें अर्थव्यवस्था मजबूत हो, स्थानीय लोगों का भविष्य मजबूत हो और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ की “कलम की धार” का उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जिनका जवाब जनता के हित में मिलना जरूरी है।
पेड़ लगाइए, लेकिन उसकी जिम्मेदारी भी लीजिए।
खनिज निकालिए, लेकिन उसका लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचाइए।
उद्योग लगाइए, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।
विकास कीजिए, लेकिन आने वाली पीढ़ियों का हिस्सा बचाकर।
क्योंकि छत्तीसगढ़ सिर्फ खनिजों की जमीन नहीं है।
यह लोगों का घर है, जंगलों की धरती है और आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।
प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
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