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सच की तह तक

“जन्म कारागार में, पालन गोकुल में और कर्म कुरुक्षेत्र में… आखिर कौन था वह बालक?”

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जन्माष्टमी महाविशेष

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का कृष्ण जन्माष्टमी के विशेष अवसर पर विशेष अंक

जिस रात जेल के बंद दरवाजे खुद खुल गए… कौन था वह बालक, जिसने कंस के साम्राज्य से लेकर कुरुक्षेत्र तक बदल दी पूरी दुनिया?

मथुरा की अंधेरी कारागार से शुरू हुई एक ऐसी अद्भुत यात्रा, जिसमें बालक कृष्ण कभी माखन चुराते दिखे, कभी कालिया के फन पर नाचे, कभी कंस का अंत किया और अंत में अर्जुन को वह ज्ञान दे गए, जिसे संसार आज ‘गीता’ के नाम से जानता है।

By ACGN – 7647981711, 9303948009

एक ऐसी रात, जब अंधकार के बीच जन्मा था प्रकाश

कभी-कभी इतिहास में ऐसी रातें आती हैं, जो बीत तो जाती हैं, लेकिन समय उन्हें अपने भीतर से मिटा नहीं पाता। वर्ष बीतते हैं,सदियां गुजरती हैं, साम्राज्य मिट जाते हैं, राजाओं के नाम इतिहास के पन्नों में धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो केवल इतिहास नहीं रहतीं, वे आस्था बन जाती हैं, विश्वास बन जाती हैं और पीढ़ियों के हृदय में धड़कती रहती हैं।

हजारों वर्षपूर्व द्वापरयुग में मथुरा की वह रात भी ऐसी ही थी, आधी रात का समय था, चारों ओर घना अंधकार था, आकाश में बादल गरज रहे थे, वर्षा जैसे अपनी पूरी शक्ति से धरती पर उतर रही थी, यमुना उफान पर थी,  मथुरा का शक्तिशाली राजा कंस अपने ही भय के भीतर कैद था और उसी कंस की कारागार में उसकी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव बंदी जीवन जी रहे थे।

कारागार के बाहर पहरेदार थे, लोहे के दरवाजे थे, हाथ और पैरों में बेड़ियां थीं।

जहां कंस का अत्याचार था, भय था, लेकिन उस रात इन सबसे बड़ी एक शक्ति वहां जन्म लेने वाली थी, एक ऐसा बालक, जिसकी पहली सांस के साथ मानो अंधकार ने प्रकाश को चुनौती दी थी।

कहा जाता है कि देवकी की आठवीं संतान के रूप में जब श्रीकृष्ण ने जन्म लिया, तब वह केवल एक शिशु का जन्म नहीं था। सनातन परंपरा में वह क्षण धर्म के पुनर्जागरण, आशा के उदय और अधर्म के अंत की शुरुआत माना गया, और फिर जो हुआ, वह आज भी रहस्य और भक्ति के बीच खड़ा दिखाई देता है।

श्रीकृष्ण ने जन्म लिया कारागार के द्वार स्वयं खुल गए सभी पहरेदार निद्रा में चले गए, वसुदेव ने नवजात बालक को टोकरी में उठाया, बाहर मूसलाधार वर्षा थी, सामने उफनती यमुना थी, पीछे अत्याचारी कंस का भय था, और टोकरी में था वह बालक, जिसके बारे में भविष्यवाणी हो चुकी थी कि वही कंस के अंत का कारण बनेगा।

श्री कृष्ण को टोकरी में लेकर वसुदेव यमुना की ओर बढ़े यमुना का पानी बढ़ता गया, रास्ता कठिन होता गया, कहा जाता है कि शेषनाग ने अपने फनों का छत्र बनाकर उस बालक को वर्षा से बचाया और यमुना ने भी उस दिव्य यात्रा के लिए मार्ग दिया, उस रात मथुरा से गोकुल तक केवल एक शिशु नहीं पहुंचा था, एक ऐसी कथा पहुंची थी, जिसने आने वाले हजारों वर्षों की भारतीय चेतना को बदल देना था, वही बालक आगे चलकर किसी के लिए नंदलाल बना, किसी के लिए कान्हा, किसी के लिए गोपाल, किसी के लिए मुरलीधर, और किसी के लिए स्वयं योगेश्वर।

वही कृष्ण कभी यशोदा की उंगली पकड़कर आंगन में चलते दिखाई दिए,कभी माखन की मटकी फोड़ते नजर आए, कभी कालिया नाग के फनों पर नृत्य करते दिखाई दिए, कभी गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को आश्रय देते नजर आए।

फिर वही बालक बड़ा हुआ, मथुरा लौटा, कंस का अंत किया, द्वारका बसाई, राजनीति और कूटनीति के बीच धर्म का मार्ग चुना और जब कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथ कांपने लगे, तब वही कृष्ण सारथी बनकर रथ की लगाम थामे खड़े थे, उस दिन कृष्ण ने केवल अर्जुन को नहीं समझाया था, मानो उन्होंने पूरी मानवता से संवाद किया था, वह संवाद आज भी हमारे बीच जीवित है।

उसका नाम है, श्रीमद्भगवद्गीता।

लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कृष्ण कौन थे? क्या वे केवल मथुरा में जन्मे एक दिव्य बालक थे?क्या वे केवल गोकुल के माखनचोर थे?, क्या वे केवल राधा के प्रियतम थे? क्या वे केवल कंस के संहारक थे?क्या वे केवल महाभारत के सारथी थे?, या फिर कृष्ण इन सभी रूपों से कहीं अधिक थे?

शायद कृष्ण को समझने के लिए उनकी कथा पढ़ना पर्याप्त नहीं है, उनके जीवन को महसूस करना होगा, क्योंकि कृष्ण का जीवन एक सीधी कहानी नहीं है।

यह रहस्यों से भरी एक ऐसी यात्रा है, जिसमें प्रेम भी है और युद्ध भी बांसुरी भी है और सुदर्शन भी, बाल लीला भी है और विराट दर्शन भी, राजनीति भी है और अध्यात्म भी, मुस्कान भी है और मृत्यु का सत्य भी,और शायद यही कारण है कि हजारों वर्ष बाद भी जब जन्माष्टमी की आधी रात मंदिरों के पट खुलते हैं, शंखनाद होता है, घंटियां गूंजती हैं और भक्तों के कंठ से एक ही स्वर निकलता है

“नंद के आनंद भयो… जय कन्हैया लाल की!”

तो ऐसा लगता है जैसे वह रात फिर लौट आई हो, वही अंधेरी रात, वही मथुरा, वही कारागार, वही यमुना, और उसी अंधकार के बीच फिर कोई धीमे से कह रहा हो

“जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब प्रकाश को जन्म लेना पड़ता है।”

यहीं से शुरू होती है उस बालक की कहानी, जिसने केवल कंस का साम्राज्य नहीं बदला.

बल्कि मनुष्य को जीवन जीने का एक नया दर्शन दे दिया।एक ऐसी रात, जब अंधकार के बीच जन्मा था प्रकाश

कभी-कभी इतिहास में ऐसी रातें आती हैं, जो बीत तो जाती हैं, लेकिन समय उन्हें अपने भीतर से मिटा नहीं पाता।

ऐसे ही हजारों वर्ष पूर्व द्वापरयुग में मथुरा की वह रात भी ऐसी ही थी, आधी रात का समय था, चारों ओर घना अंधकार था, वह रात साधारण नहीं थी, चारों तरफ अंधेरा था। आसमान में बादल थे। वर्षा हो रही थी। यमुना उफान पर थी। एक ओर कारागार में बंद देवकी और वसुदेव थे और दूसरी ओर अत्याचारी कंस का भय पूरे मथुरा पर छाया हुआ था।

लेकिन उसी अंधेरी रात में कुछ ऐसा हुआ, जिसकी स्मृति हजारों वर्षों बाद भी करोड़ों हृदयों में जीवित है।

कंस को किससे था सबसे बड़ा भय?

इस युग में कंस शक्तिशाली राजा था, लेकिन उसके भीतर एक ऐसा भय था, जिसने उसके पूरे जीवन को बदल दिया। कंस जब अपनी बहन देवकी को विवाह के बाद विदा करने लगे उसी दौरान आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस के अंत का कारण बनेगा।

कंस ने भय में अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में डाल दिया।

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार देवकी के छह पुत्रों को कंस ने मार डाला। सातवें गर्भ से बलराम जी के जन्म की कथा गर्भस्थानांतरण से जुड़ी है। इसके बाद आठवें गर्भ में श्रीकृष्ण का आगमन हुआ।

कंस जिस भविष्यवाणी को रोकने के लिए अत्याचार पर अत्याचार करता गया, वही भविष्यवाणी अंततः उसके सामने आकर खड़ी हुई।

        यही कृष्ण कथा का पहला रहस्य है

जिस सत्य से अत्याचारी सबसे अधिक डरता है, कई बार वही सत्य उसके सामने सबसे पहले जन्म लेता है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में देवकी की आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

सनातन परंपरा में यह केवल एक बालक का जन्म नहीं था, यह अंधकार के बीच प्रकाश का जन्म था, अत्याचार के बीच आशा का जन्म था,अधर्म के बीच धर्म के पुनर्जागरण का संकेत था, और शायद यही कारण है कि जन्माष्टमी की रात आज भी आधी रात को मंदिरों में घंटियां बजती हैं, शंख गूंजते हैं और भक्त पुकार उठते हैं “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।”मथुरा की कारागार से निकलकर कृष्ण गोकुल पहुंचे और यशोदा मैया की गोद में पले, यहीं से कृष्ण की वह छवि सामने आती है, जिसे देखकर कठोर हृदय भी पिघल जाता है, वहां नंद बाबा और यशोदा के घर जन्मी कन्या को लेकर वसुदेव मथुरा लौट आए।

सुबह जब कंस को पता चला कि देवकी के यहां संतान हुई है, तो उसने उस कन्या को मारने का प्रयास किया। कथा के अनुसार वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में प्रकट हुई और उसने कंस को चेतावनी दी कि उसका विनाश करने वाला जन्म ले चुका है।

मथुरा का बालक गोकुल का कान्हा बन गया

मथुरा की कारागार से निकलकर कृष्ण गोकुल पहुंचे और यशोदा मैया की गोद में पले,यहीं से कृष्ण की वह छवि सामने आती है, जिसे देखकर कठोर हृदय भी पिघल जाता है। कोई प्रेम से उन्हें नंदलाल,कोई कान्हा, कोई गोपाल कोई मुरलीधर कोई लड्डू गोपाल और कोई उन्हें माखनचोर कहते है, कृष्ण का बचपन प्रेम, शरारत और अद्भुत कथाओं से भरा है।

वह कभी गायों के पीछे दौड़ते हैं, कभी सखाओं के साथ खेलते हैं और कभी गोपियों के घरों से माखन चुराते हैं।कभी गोपियां शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुंचतीं, लेकिन कान्हा की मासूमियत देखकर शिकायत भी मुस्कान में बदल जाती, श्री कृष्ण की माखन चोरी को भक्ति परंपरा में केवल बाल शरारत नहीं माना गया। भक्तों के लिए यह उस प्रेम का प्रतीक बन गई जिसमें भगवान अपने भक्त के घर तक पहुंच जाते हैं।

बालक था, लेकिन संकट उसके पीछे-पीछे चलता रहा

श्री कृष्ण का बचपन सामान्य नहीं था, धार्मिक कथाओं में पूतना, शकटासुर, तृणावर्त और अन्य असुरी शक्तियों के प्रसंग आते हैं, हर बार संकट आया और हर बार कृष्ण उससे पार निकल गए, इन कथाओं में भक्त परंपरा यह संदेश देखती है कि सत्य और धर्म की शक्ति छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन उसका प्रभाव अत्यंत व्यापक हो सकता है।

जब यमुना का पानी विष बन गया

कृष्ण की बाल लीलाओं में कालिया नाग की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है, कथा के अनुसार कालिया नाग के विष से यमुना का जल प्रभावित था। कृष्ण यमुना में उतर गए और कालिया नाग का दमन किया, फिर उसके फनों पर नृत्य किया, ब्रज में यह दृश्य केवल चमत्कार की कथा नहीं रहा, यह अहंकार पर नियंत्रण और विषैली प्रवृत्तियों पर विजय का प्रतीक बन गया।

गोवर्धन की उंगली के नीचे पूरा ब्रज

फिर आया वह प्रसंग जिसने कृष्ण को ब्रज की प्रकृति से जोड़ दिया, कृष्ण ने ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत और प्रकृति के महत्व को समझाया, कथा के अनुसार इससे इंद्र क्रोधित हुए और भारी वर्षा होने लगी, ब्रज संकट में था, तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया और ब्रजवासियों तथा उनके पशुओं को उसके नीचे आश्रय दिया, कई दिनों तक लोग उसी के नीचे सुरक्षित रहे, गोवर्धन लीला का संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है, प्रकृति का सम्मान करो और अहंकार से बचो, इसी परंपरा से गोवर्धन पूजा का धार्मिक महत्व जुड़ा हुआ है।

राधा और कृष्ण – जिस प्रेम का कोई अंत नहीं

कभी भी जब कृष्ण का नाम लिया जाए और राधा का नाम न आए, ऐसा संभव ही नहीं, राधा-कृष्ण का प्रेम सनातन भक्ति परंपरा में प्रेम और समर्पण का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है, यह प्रेम केवल पाने का नहीं, बल्कि स्वयं को समर्पित करने का भाव है, इसीलिए राधा-कृष्ण की छवि आज भी भक्तों के लिए आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक बनी हुई है।

कृष्ण की बांसुरी का रहस्य

कृष्ण की बांसुरी के पीछे भी एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देखा जाता है, बांसुरी भीतर से खाली होती है, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है,जब उसमें अपना कुछ नहीं बचता, तभी वह किसी और की सांस से मधुर संगीत पैदा करती है, इसीलिए आध्यात्मिक दृष्टि से बांसुरी हमें अहंकार छोड़कर स्वयं को परम सत्ता के प्रति समर्पित करने की प्रेरणा देती है, मन जितना खाली होगा, प्रेम का संगीत उतना ही मधुर होगा।

मथुरा लौटे कान्हा और टूट गया कंस का अभिमान

जिस बालक को कंस जन्म से ही खोज रहा था, वह अब बड़ा हो चुका था, कृष्ण और बलराम मथुरा पहुंचे, मल्लयुद्ध हुआ, कंस के पहलवानों से उनका सामना हुआ, और अंततः श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर दिया।जिस भविष्यवाणी ने कंस को वर्षों तक भयभीत रखा था, उसका अंत हो चुका था, मथुरा अत्याचार से मुक्त हुई।

कृष्ण की बाल लीला समाप्त हुई और उनके जीवन का अगला अध्याय शुरू हुआ

कृष्ण ने केवल युद्ध नहीं किया, शांति भी चाही,

कंस के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुए, कृष्ण को अनेक राजनीतिक और सैन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यादवों की सुरक्षा के लिए उन्होंने द्वारका नगरी बसाई, द्वारका में वे केवल राजा नहीं थे, वे रणनीतिकार थे, वे नीति के ज्ञाता थे, वे समाज और राज्य व्यवस्था को समझने वाले नेतृत्वकर्ता थे, और महाभारत के समय उनका सबसे बड़ा रूप सामने आया।

महाभारत – जहां कृष्ण ने हथियार छोड़कर सारथी बनना चुना

कौरव और पांडव आमने-सामने थे, युद्ध से पहले कृष्ण ने दोनों पक्षों को विकल्प दिया, एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना और दूसरी ओर स्वयं कृष्ण, लेकिन बिना हथियार उठाए, अर्जुन ने कृष्ण को चुना, कृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया, यह दृश्य अपने आप में अद्भुत है, जिसके पास स्वयं युद्ध की शक्ति थी, वह राजा बनने के बजाय अपने मित्र का सारथी बन गया, यही कृष्ण का नेतृत्व था,

महान व्यक्ति वह नहीं जो हमेशा आगे खड़ा हो; महान वह भी है जो सही समय पर किसी और के रथ की लगाम थाम सके।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन क्यों टूट गए?

युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन ने जब अपने सामने अपने गुरु, पितामह, भाई, रिश्तेदार और प्रियजनों को देखा तो उनका मन विचलित हो गया, उनके हाथ कांपने लगे, उन्होंने युद्ध करने से मना कर दिया,

अर्जुन के सामने प्रश्न था, क्या अपने ही लोगों के विरुद्ध युद्ध करना उचित है? और यहीं से शुरू होता है श्रीकृष्ण के जीवन का सबसे महान अध्याय।

गीता – एक युद्धभूमि से पूरी मानवता के लिए संदेश

युद्ध के दौरान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संसार के सामने आया, उन्होंने आत्मा, कर्म, धर्म, योग, ज्ञान और भक्ति का दर्शन समझाया, उन्होंने अर्जुन को अपने कर्तव्य से विमुख न होने का संदेश दिया।

गीता का प्रसिद्ध श्लोक है “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, केवल उसके फल पर नहीं।

कृष्ण ने अर्जुन को यह भी समझाया कि आत्मा को सनातन दर्शन में अविनाशी माना गया है और शरीर परिवर्तनशील है।

जब अर्जुन ने कृष्ण में पूरा ब्रह्मांड देखा

अर्जुन कृष्ण के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहते थे, तब कृष्ण ने उन्हें अपना विराट स्वरूप दिखाया, अर्जुन ने उस विराट स्वरूप में संपूर्ण सृष्टि को देखा, यह केवल महाभारत का एक प्रसंग नहीं, बल्कि सनातन दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अध्याय है।

अर्जुन समझ गए कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति केवल उनका मित्र और सारथी नहीं, बल्कि दिव्य सत्ता का विराट स्वरूप है।

युद्ध जीता, लेकिन कृष्ण का जीवन युद्ध में समाप्त नहीं हुआ

महाभारत युद्ध समाप्त हुआ, कौरवों का विनाश हुआ, पांडव विजयी हुए, लेकिन युद्ध के बाद भी कृष्ण का जीवन चलता रहा, वे द्वारका लौटे, उन्होंने अपने राज्य और यादव वंश का मार्गदर्शन किया, लेकिन समय की गति किसी के लिए नहीं रुकती।

कृष्ण की पृथ्वी लीला भी धीरे-धीरे अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही थी।

गांधारी का शाप और भविष्य का संकेत

महाभारत युद्ध के बाद अपने पुत्रों के विनाश से दुखी गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया, महाभारत की परंपरा में इसी शाप को आगे चलकर यादव वंश के विनाश से जोड़ा जाता है, कृष्ण सब जानते हुए भी समय के प्रवाह को रोकते नहीं हैं,

यही कृष्ण की लीला का एक रहस्यमय पक्ष है।

जिस यादव वंश को कृष्ण ने संभाला, वही आपस में भिड़ गया

समय बीतता गया, यादवों में आपसी विवाद बढ़ा, महाभारत के मौसल पर्व में प्रभास क्षेत्र में यादवों के बीच हुए भयंकर संघर्ष और उनके विनाश का वर्णन मिलता है, जो लोग कभी एक साथ खड़े थे, वे एक-दूसरे के विरुद्ध हो गए, शक्ति, अहंकार और आपसी कलह ने यादव वंश को भीतर से कमजोर कर दिया।

यह प्रसंग आज के समाज के लिए भी चेतावनी है – बाहर का दुश्मन जितना खतरनाक नहीं होता, उससे ज्यादा खतरनाक वह कलह है जो घर के भीतर पैदा हो जाए।

बलराम जी भी चले गए

यादव वंश के विनाश के बाद बलराम जी ने भी अपनी पृथ्वी लीला समाप्त की, अब कृष्ण के जीवन का अंतिम अध्याय सामने था, द्वारका का वैभव पीछे छूट चुका था, यादव वंश का अंत हो चुका था, बलराम जा चुके थे, और अब कृष्ण भी अपने अंतिम समय की ओर बढ़ रहे थे।

वह बाण जिसने कृष्ण की पृथ्वी लीला समाप्त कर दी

प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे, धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार जरा नामक एक शिकारी ने दूर से उनके पैर को हिरण समझकर बाण चला दिया, बाण श्रीकृष्ण के पैर में लगा, जब जरा को पता चला कि उसने किसे घायल कर दिया है, तो वह अत्यंत दुखी हुआ, वह क्षमा मांगने लगा, लेकिन कृष्ण ने उसे दोषी नहीं माना, उन्होंने उसे सांत्वना दी, और इसके बाद उन्होंने अपनी पृथ्वी की लीला समाप्त की।

क्या कृष्ण की मृत्यु हुई थी?

यह प्रश्न आज भी भक्तों के मन में उठता है, सनातन धार्मिक परंपरा के अनुसार कृष्ण के देह त्याग को सामान्य मृत्यु के रूप में नहीं देखा जाता, भक्त परंपरा इसे पार्थिव लीला का समापन और दिव्य धाम में प्रस्थान मानती है, उनका शरीर इस धरती पर नहीं रहा, लेकिन उनका संदेश समाप्त नहीं हुआ, यही कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता है।

द्वारका भी पीछे नहीं बची

श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद द्वारका के विनाश की कथा महाभारत में आती है, अर्जुन द्वारका पहुंचे और वहां बचे लोगों को सुरक्षित स्थान तक ले जाने का प्रयास किया, धार्मिक परंपरा में द्वारका के समुद्र में विलीन होने की कथा भी मिलती है, जिस नगरी में राजसी वैभव था, वह भी समय के सामने टिक नहीं सकी।

यह संसार के लिए एक गहरा संदेश है – राज्य नश्वर है। शरीर नश्वर है। धन नश्वर है। शक्ति नश्वर है। लेकिन महान कर्म और महान विचार समय से भी अधिक शक्तिशाली होते हैं

कृष्ण चले गए, लेकिन गीता रह गई

श्रीकृष्ण की पृथ्वी लीला समाप्त हो गई, लेकिन उनका ज्ञान आज भी जीवित है, जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को लेकर भ्रमित होता है, गीता उसके सामने खड़ी होती है, जब कोई मनुष्य निराश होता है, कृष्ण का कर्मयोग उसे संभालता है, जब मनुष्य अहंकार में डूबता है, कृष्ण का जीवन उसे नश्वरता याद दिलाता है।

जब प्रेम की बात होती है, राधा-कृष्ण सामने आते हैं।

जब अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की बात होती है, कंस-वध और धर्म की स्थापना याद आती है, जब नेतृत्व की बात होती है, अर्जुन के सारथी कृष्ण याद आते हैं, और जब जीवन के सबसे कठिन प्रश्न सामने आते हैं, तब कुरुक्षेत्र में खड़े योगेश्वर कृष्ण का स्वर सुनाई देता है।

जन्माष्टमी का असली रहस्य

जन्माष्टमी का सबसे बड़ा रहस्य शायद यह नहीं कि कृष्ण का जन्म किस रात हुआ, सबसे बड़ा रहस्य यह है कि कृष्ण आज भी क्यों जीवित हैं?

हजारों वर्ष बीत गए, राज्य बदल गए, राजा बदल गए, सभ्यताएं बदल गईं, द्वारका की कथा इतिहास और आस्था के पन्नों में चली गई, लेकिन कृष्ण की गीता आज भी पढ़ी जाती है, उनकी बांसुरी आज भी बजती है, उनकी बाल छवि आज भी घरों में सजती है, उनका नाम आज भी करोड़ों लोग लेते हैं क्यों?

क्योंकि कृष्ण केवल एक कालखंड के पात्र नहीं हैं, वे जीवन की हर परिस्थिति में दिखाई देने वाला एक दर्शन हैं।

आज अगर कृष्ण हमारे सामने होते तो क्या कहते?

शायद वे कहते अपने बच्चों को केवल सफलता मत सिखाओ, संस्कार भी दो, धन कमाओ, लेकिन धर्म मत बेचो, शक्ति पाओ, लेकिन अहंकार मत पालो, प्रेम करो, लेकिन स्वार्थ मत रखो, राजनीति करो, लेकिन समाज को मत भूलो, विरोध करो, लेकिन सत्य मत छोड़ो, कठिनाई आए तो भागो मत और जब कर्तव्य सामने हो, तब परिणाम की चिंता में अपना कर्म मत छोड़ो।

इस जन्माष्टमी मंदिर से आगे कृष्ण को खोजिए

कृष्ण को केवल मंदिर में मत खोजिए, उन्हें उस मां में खोजिए जो अपने बच्चे को संस्कार देती है, उस किसान में खोजिए जो मिट्टी से अन्न पैदा करता है, उस गरीब में खोजिए जो कठिनाई में भी ईमानदारी नहीं छोड़ता, उस युवा में खोजिए जो गलत रास्ते से दूर रहता है, उस व्यक्ति में खोजिए जो किसी कमजोर के लिए आवाज उठाता है, उस मित्र में खोजिए जो संकट में साथ खड़ा रहता है, और सबसे बढ़कर अपने कर्म में कृष्ण को खोजिए।

कृष्ण जन्माष्टमी हमें क्या देती है?

जन्माष्टमी हमें आनंद देती है, भक्ति देती है, आस्था देती है,संस्कार देती है, परिवार को जोड़ती है, बच्चों को हमारी संस्कृति से जोड़ती है, मंदिरों और घरों में भक्ति का वातावरण बनाती है।

दही-हांडी जैसी परंपराओं के माध्यम से सामूहिकता का संदेश देती है।

लेकिन इन सबसे ऊपर यह हमें याद दिलाती है कि जब अधर्म बढ़ता है, तब धर्म की आवश्यकता और बढ़ जाती है, जब अंधकार गहरा होता है, तब प्रकाश की कीमत समझ आती है, जब मनुष्य भ्रमित होता है, तब ज्ञान की आवश्यकता होती है, और इसी कारण कृष्ण आज भी प्रासंगिक हैं।

जन्माष्टमी पर अपने भीतर एक नया जन्म होने दें

इस जन्माष्टमी हम केवल घर में झांकी न सजाएं, अपने मन को भी सजाएं।

केवल कृष्ण की प्रतिमा को झूला न झुलाएं, अपने भीतर की कठोरता को भी झुलाकर प्रेम में बदलें।

केवल उपवास न रखें, अपने भीतर के क्रोध, छल, ईर्ष्या और अहंकार पर भी संयम रखें।

केवल मंदिर में दीपक न जलाएं, अपने आसपास किसी जरूरतमंद के जीवन में भी प्रकाश पहुंचाएं।

क्योंकि कृष्ण की पूजा का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें कृष्ण का संदेश हमारे व्यवहार में दिखाई दे।

और अंत में… वह प्रश्न जो कृष्ण छोड़ गए

कृष्ण ने हमें कोई आसान जीवन देने का वादा नहीं किया, उन्होंने हमें कठिन जीवन में सही रास्ता चुनने की शक्ति दी,

उन्होंने यह नहीं कहा कि जीवन में युद्ध नहीं होगा,उन्होंने बताया कि युद्ध के बीच भी विवेक कैसे बचाया जाता है।

उन्होंने यह नहीं कहा कि हर परिस्थिति हमारे मन के अनुसार होगी, उन्होंने बताया कि परिस्थिति चाहे जैसी हो, कर्म हमारा अपना चुनाव है।

श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ और देह त्याग प्रभास में और बीच का पूरा जीवन संघर्ष, प्रेम, नीति, राजनीति, युद्ध, मित्रता, कर्तव्य और ज्ञान से भरा रहा, और यही शायद उनके जीवन का सबसे बड़ा संदेश है

“जीवन तुम्हारे अनुसार नहीं चलेगा, लेकिन जीवन में तुम्हारा आचरण तुम्हारे हाथ में जरूर है।”

कृष्ण का शरीर चला गया, द्वारका भी चली गई, यादव वंश भी चला गया।

लेकिन कृष्ण का संदेश नहीं गया, गीता आज भी है, कृष्ण भक्ति आज भी है, राधा का प्रेम आज भी है, कर्मयोग आज भी है और हर उस हृदय में कृष्ण आज भी जन्म लेते हैं, जहां सत्य, प्रेम और धर्म के लिए जगह होती है।

इसीलिए जन्माष्टमी केवल कृष्ण के जन्म की रात नहीं, यह हमारे भीतर सोए हुए धर्म, विवेक और प्रेम को जगाने की रात है।

अंत में कृष्ण का जन्म केवल द्वापर युग की एक घटना नहीं, बल्कि हर उस हृदय में प्रकाश के जन्म का संदेश है, जहां सत्य, प्रेम, करुणा और धर्म के लिए स्थान है।

कृष्ण हमें यही सिखाते हैं, कर्म करते रहो, सत्य के साथ खड़े रहो और परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर का प्रकाश बुझने मत दो।

इसी संदेश के साथ आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

राधे-राधे… जय श्रीकृष्ण! 

 

प्रदीप मिश्रा

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