नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , मध्यम वर्ग की जिंदगी का हिसाब – महंगाई के चक्रव्यूह में मध्यम वर्ग कब टूटेगी चुप्पी – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

मध्यम वर्ग की जिंदगी का हिसाब – महंगाई के चक्रव्यूह में मध्यम वर्ग कब टूटेगी चुप्पी

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

संपादकीय

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक

✍️ कलम की धार ✍️ 

By ACGN 7647981711, 9303948009

“निष्पक्ष लेखनी • निर्भीक विश्लेषण • विश्वसनीय तथ्य • जनहित की सच्ची आवाज़” हर रविवार आपके बीच

कलम की धार : जहां दबे हुए सवालों को आवाज देने की कोशिश होती है

“कलम की धार” अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़ का साप्ताहिक विशेषांक है, जो हर रविवार आम जनता के उन सवालों, समस्याओं और पीड़ाओं को सामने लाने का प्रयास करता है, जो अक्सर बड़ी-बड़ी राजनीतिक बहसों, सरकारी आंकड़ों और विकास के नारों के बीच कहीं दब जाती हैं। यह मंच निष्पक्षता, निरपेक्षता, निर्भीकता और जनहित को अपना आधार मानता है। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, दल, सरकार या संस्था पर व्यक्तिगत आरोप लगाना नहीं, बल्कि उन नीतियों और परिस्थितियों पर सवाल उठाना है जिनका सीधा असर आम आदमी के जीवन पर पड़ता है। क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर केवल आंकड़ों में नहीं मिलती, वह उस मां के चेहरे पर दिखाई देती है जो महीने के आखिरी सप्ताह में राशन का हिसाब लगाती है, उस पिता की चिंता में दिखाई देती है जो बच्चों की फीस भरने के बाद अपनी जरूरत टाल देता है और उस युवा की आंखों में दिखाई देती है जो वर्षों पढ़ाई करने के बाद नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। आज की “कलम की धार” उसी मध्यम वर्ग की कहानी है, जो न इतना गरीब है कि हर सरकारी मुफ्त योजना का पात्र बन सके और न इतना संपन्न कि महंगाई, टैक्स और बेरोजगारी की चोट को आसानी से सह सके।

आलेख : प्रदीप मिश्रा

आज का विषय – महंगाई, टैक्स, मुफ्त योजनाओं, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बदलती अर्थव्यवस्था के बीच पिसते मध्यम वर्ग की जिंदगी का आईना

राशन बचाती माँ, फीस से परेशान पिता और बेरोजगार बेटा… अब जेब भी डिजिटल है और चिंता भी!

महीने की पहली तारीख को मुस्कुराता परिवार और आखिरी तारीख को खाली जेब, यही है मध्यम वर्ग की कहानी

आज वर्तमान समय में मध्यम वर्ग की जिंदगी देखने में जितनी सामान्य दिखाई देती है, भीतर से उतनी ही गणित में उलझी हुई है। जब महीने की पहली तारीख को वेतन खाते में आता है तो पिता के चेहरे पर थोड़ी राहत दिखाई देती है, लेकिन उसी दिन बढ़ा हुआ बिजली का बिल, स्कूल की भारी भरकम फीस, घर की EMI या किराया, गाड़ी की किश्त, राशन, दूध, गैस, पेट्रोल, मोबाइल, इंटरनेट, बीमा और बच्चों की दूसरी जरूरतें सामने खड़ी हो जाती हैं। मां घर का बजट बनाती है तो पहले जरूरी चीजें लिखती है और फिर गैरजरूरी चीजों की सूची नहीं बनाती, बल्कि अपनी जरूरतों को ही उस सूची से बाहर कर देती है। पिता बच्चों से कहता है कि इस महीने घूमने नहीं जाएंगे, मां कहती है कि नई साड़ी अगले त्योहार पर ले लेंगे और बच्चा पूछता है कि उसकी छोटी-सी इच्छा अगले महीने पूरी होगी या नहीं। महीने का आखिरी सप्ताह आते-आते वही परिवार बैंक बैलेंस देखता है और सोचता है “वेतन तो हमारा था, फिर इतनी जल्दी खत्म कैसे हो गया?”

महंगाई केवल बाजार में नहीं बढ़ती, वह घर के भीतर सपनों की कीमत भी बढ़ाती है

महंगाई का आंकड़ा सरकार बताएगी, अर्थशास्त्री उसका विश्लेषण करेंगे और टीवी पर विशेषज्ञ बहस करेंगे, लेकिन महंगाई की असली कहानी उस व्यक्ति से पूछिए जो बाजार से आधा किलो दाल, एक लीटर तेल, चीनी, दूध और सब्जियां खरीदकर लौटता है और रास्ते भर हिसाब लगाता है कि आज इतना खर्च क्यों हो गया। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं तो केवल वाहन चलाने वाला ही परेशान नहीं होता, बल्कि परिवहन लागत के जरिए उसका असर बाजार की दूसरी वस्तुओं तक भी पहुंच सकता है। खाद्य तेल महंगा होता है तो रसोई का बजट बदलता है, चीनी महंगी होती है तो चाय का स्वाद बदलता है, सब्जी महंगी होती है तो थाली में सब्जियों की मात्रा बदलती है और गैस महंगी होती है तो घर की गृहिणी सिलेंडर का हिसाब पहले से ज्यादा सावधानी से करने लगती है। महंगाई की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि कीमतें बाजार में बढ़ती हैं, लेकिन कटौती परिवार के सपनों में होती है।

पेट्रोल की कीमत पंप पर दिखाई देती है, लेकिन उसका असर घर की थाली तक पहुंचता है

सरकार ऊर्जा सुरक्षा के लिए एथेनॉल मिश्रण बढ़ा रही है, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश हो रही है और यह नीति अपने आर्थिक तर्क रखती है। लेकिन आम आदमी का सवाल थोड़ा अलग है। वह पूछता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने या ईंधन महंगा होने का असर आखिर उसके रोजमर्रा के खर्च तक क्यों पहुंच जाता है। नौकरी करने वाला व्यक्ति रोज बाइक से कार्यालय जाता है, विद्यार्थी स्कूल या कॉलेज जाता है, व्यापारी माल लेने जाता है, किसान खेत तक पहुंचता है और मजदूर काम की तलाश में यात्रा करता है। ऐसे में उससे यह कहना कि ईंधन बचाइए, अच्छी सलाह हो सकती है, लेकिन उसके सामने सवाल रहता है कि “मैं ईंधन बचाऊं तो अपनी जरूरत कैसे पूरी करूं?” यदि स्थानीय स्तर पर रोजगार मिले, सार्वजनिक परिवहन मजबूत हो और रोजमर्रा की दूरी कम हो तो ईंधन की बचत संभव है, लेकिन केवल जनता से पेट्रोल कम खर्च करने की अपील कर देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।

एथेनॉल से लेकर चीनी तक,नीति ऊपर बनती है, हिसाब नीचे घर में होता है

एथेनॉल को लेकर देश में बड़े आर्थिक और ऊर्जा संबंधी लक्ष्य हैं। गन्ना, चीनी उद्योग, किसानों की आय, ईंधन आयात और ऊर्जा सुरक्षा इन सबके बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए जरूरी है। लेकिन मध्यम वर्ग का अपना छोटा-सा सवाल है“नीति का अंतिम असर मेरी जेब पर कितना पड़ेगा?” उसे न कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार का पूरा गणित समझ आता है और न एथेनॉल मिश्रण की तकनीकी प्रक्रिया, उसे केवल इतना पता है कि बाजार में खरीदारी करते समय पहले जितने पैसे में थैला भर जाता था, अब उसी पैसे में थैला हल्का हो गया है। वह चीनी की कीमत देखकर चाय में चीनी कम कर देता है, तेल की कीमत देखकर पकवान कम कर देता है और सब्जी महंगी होने पर दाल और आलू से काम चला लेता है। देश की आर्थिक नीतियों का सबसे शांत लेकिन सबसे सटीक सर्वेक्षण शायद किसी मां की रसोई में होता है।

सोना मत खरीदो… मध्यम वर्ग कहता है, साहब, खरीदने के लिए बचा ही क्या है?

वर्तमान की आर्थिक परिस्थितियों में नागरिकों से सोना न खरीदने, ईंधन बचाने और अनावश्यक खर्च रोकने जैसी अपीलें की जाती रही हैं। ऐसी अपीलों के पीछे विदेशी मुद्रा, आयात और आर्थिक स्थिरता से जुड़े तर्क हो सकते हैं। लेकिन मध्यम वर्ग के घर में इसका दूसरा अर्थ निकलता है। वह कहता है “सोना खरीदना तो दूर, बच्चों की फीस और घर का खर्च निकालना ही बड़ी उपलब्धि है।” भारतीय परिवारों में सोना केवल शौक नहीं, कई बार बेटी की शादी, भविष्य की बचत या आपातकालीन सुरक्षा का माध्यम भी माना जाता है। इसलिए जब सोने की कीमत बढ़ती है तो केवल आभूषण महंगे नहीं होते, परिवार की एक पुरानी बचत की योजना भी महंगी हो जाती है। मध्यम वर्ग फिर पूछता है “बचत आखिर किसमें करें? बैंक में रखें तो महंगाई सामने, बाजार में लगाएं तो जोखिम सामने और सोना खरीदें तो कीमत सामने।”

पहले इंटरनेट मुफ्त फिर सस्ता हुआ, फिर भारत डिजिटल हुआ और अब जेब में पैसा नहीं, मोबाइल में हिसाब है

वर्तमान में डिजिटल इंडिया ने देश की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के लेनदेन को बदल दिया। इंटरनेट और डेटा सेवाओं की पहुंच बढ़ी, मोबाइल भुगतान सामान्य हुआ और आज चाय की दुकान से लेकर बड़े व्यापार तक QR कोड दिखाई देता है। जिसने कभी सोचा भी नहीं था कि वह बिना नकद पैसा खर्च कर पाएगा, वह आज मोबाइल से भुगतान कर रहा है। यह बदलाव सुविधाजनक है और डिजिटल भुगतान ने करोड़ों लोगों की जिंदगी आसान की है। लेकिन मध्यम वर्ग के व्यंग्य में एक बात छिपी है “पहले जेब में पैसे रहते थे तो पता चलता था कि कितना खर्च हुआ, अब मोबाइल में पैसा रहता है तो पता चलता है कि खर्च कब हो गया।” डिजिटल व्यवस्था की सफलता के साथ जनता यह भी चाहती है कि भविष्य में यदि किसी प्रकार का शुल्क लागू हो तो उसकी जानकारी पहले से स्पष्ट हो, नियम सरल हों और उपभोक्ता पर अनावश्यक बोझ न पड़े।

UPI पर आज हर भुगतान का टैक्स नहीं, लेकिन सवाल भविष्य का है

UPI को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें चलती रहती हैं। तथ्य यह है कि हर UPI भुगतान पर अभी कोई सामान्य टैक्स लागू नहीं हुआ है। 2026 में कानून में किए गए बदलावों ने भविष्य में कुछ श्रेणियों के इलेक्ट्रॉनिक भुगतान पर MDR यानी Merchant Discount Rate की व्यवस्था का कानूनी रास्ता खोला है, जबकि सरकार ने आम उपभोक्ता के UPI भुगतान को शुल्क से बाहर रखने और व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान मुफ्त रखने की बात कही है। इसलिए यह कहना कि “अब ₹2,000 या ₹10,000 के UPI पर सीधे GST कट रहा है” सही नहीं होगा। लेकिन जनता का सवाल फिर भी बचता है “यदि आज शुल्क नहीं है तो भविष्य में कौन-सी श्रेणी में होगा, कितना होगा और उसका अंतिम भार व्यापारी के जरिए ग्राहक तक पहुंचेगा या नहीं?” सरकार को इस सवाल का जवाब स्पष्ट भाषा में देना चाहिए, क्योंकि अफवाह से ज्यादा नुकसान कभी-कभी अस्पष्टता करती है।

₹10 हजार, ₹30 हजार और ATM वाला भ्रम मध्यम वर्ग डरता है, इसलिए सच बताना भी सरकार की जिम्मेदारी है

सोशल मीडिया पर यह भी संदेश घूमते रहते हैं कि ATM से एक बार में ₹10,000 निकाल सकते है 

बैंक ग्राहकों को हर महीने निर्धारित संख्या तक ATM लेनदेन निःशुल्क करने की सुविधा देते हैं। सामान्यतः अपने बैंक के ATM पर निर्धारित मुफ्त सीमा पूरी होने के बाद अतिरिक्त नकद निकासी या अन्य ATM लेनदेन पर बैंक शुल्क वसूलता है। यह सरकारी टैक्स नहीं, बल्कि बैंक द्वारा लिया जाने वाला सेवा शुल्क होता है। शुल्क की राशि बैंक, ATM और लेनदेन के प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। जब व्यक्ति बैंक से चेक के माध्यम से पैसे निकालने जाता है तब बैंक कर्मचारी उसे ATM या डिजिटल लेनदेन की बात कहते है फिर पांच मुफ्त लेनदेन के बाद बैंक शुल्क क्यों काटता है?

 यह घटना एक बड़ी बात बताती है लोगों को डर क्यों लग रहा है कि अपने ही पैसे को निकालने, भेजने और खर्च करने पर अगला शुल्क कब आ जाएगा? जब आर्थिक नीतियां जटिल हों और जानकारी स्पष्ट न हो तो अफवाह तेजी से फैलती है। इसलिए सरकार और बैंकिंग व्यवस्था को जनता तक सरल और स्पष्ट जानकारी पहुंचाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

टैक्स पर टैक्स का एहसास मध्यम वर्ग को लगता है कमाई से ज्यादा कटौती का हिसाब रखना पड़ रहा है

मध्यम वर्ग की शिकायत केवल एक टैक्स से नहीं है। उसकी परेशानी उस पूरे खर्च से है जो कमाई से लेकर खर्च तक कई स्तरों पर दिखाई देता है। आय पर लागू कर, वस्तुओं और सेवाओं पर GST, वाहन खरीदने पर कर और अन्य शुल्क, ईंधन पर कर, टोल, बैंकिंग सेवाओं के कुछ शुल्क, इन सबका सम्मिलित प्रभाव परिवार के बजट पर पड़ता है। हर कर अपने स्थान पर किसी सरकारी आवश्यकता से जुड़ा हो सकता है, लेकिन मध्यम वर्ग जब महीने के अंत में अपनी बचत देखता है तो उसे लगता है कि कमाई उसकी है, मगर उसका रास्ता कई सरकारी और बाजार शुल्कों से होकर गुजरता है। यही वह जगह है जहां नीति और जनजीवन के बीच संवाद जरूरी है।

गरीब के लिए मुफ्त योजना, उद्योग के लिए प्रोत्साहन और मध्यम वर्ग के लिए… एक लंबा इंतजार?

गरीब परिवारों के लिए राशन, आवास, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाएं जरूरी हैं। किसी जरूरतमंद परिवार को भूखा छोड़कर विकास की बात नहीं की जा सकती। इसी तरह देश में उद्योग, निवेश और रोजगार बढ़ाने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहन देना भी आर्थिक विकास का हिस्सा है। लेकिन मध्यम वर्ग का सवाल है “इन दोनों के बीच मेरी जगह कहां है?” वह मुफ्त की मांग नहीं करता, वह स्थिरता चाहता है। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां उसकी आय बढ़े, बच्चों की शिक्षा वहन करने योग्य हो, इलाज के लिए जीवनभर की बचत न टूटे, रोजगार के अवसर बढ़ें और कर व्यवस्था न्यायपूर्ण महसूस हो। उसका कहना है “मुझे मुफ्त बिजली नहीं चाहिए, बस इतनी कमाई चाहिए कि बिजली का बिल भरने में डर न लगे; मुझे मुफ्त पैसा नहीं चाहिए, बस इतना रोजगार चाहिए कि बच्चे का भविष्य खरीदने के लिए कर्ज न लेना पड़े।”

मुफ्त योजना राहत हो सकती है, लेकिन रोजगार स्थायी समाधान है

किसी गरीब परिवार को मुफ्त राशन मिलना तत्काल राहत है, लेकिन उसी परिवार के युवा को कौशल और रोजगार मिल जाए तो वह दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की ओर कदम है। किसी छात्र को छात्रवृत्ति मिलना अच्छी बात है, लेकिन शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी न मिले तो परिवार का सपना अधूरा रह जाता है। इसलिए सरकार की प्राथमिकता में कल्याणकारी योजनाओं के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और रोजगार को समान महत्व मिलना चाहिए। क्योंकि जनता केवल यह नहीं पूछती कि “आज क्या मिला?” वह यह भी पूछती है “कल मैं अपने पैरों पर कब खड़ा होऊंगा?”

बड़े स्कूल की भारी फीस से शुरू हुई कहानी, बेरोजगारी पर आकर क्यों रुक जाती है?

आज मध्यम वर्ग का पिता अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए अपनी जरूरतें काटता है। फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, बस, कोचिंग और आगे की उच्च शिक्षा, हर चरण पर खर्च बढ़ता जाता है। पिता सोचता है कि आज मैं परेशान हो रहा हूं, लेकिन मेरा बच्चा पढ़कर अच्छा भविष्य बनाएगा। बच्चा वर्षों पढ़ता है, डिग्री लेता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है और फिर रोजगार बाजार में उतरता है। वहां उसे दूसरा चेहरा दिखाई देता है, बेरोजगारी, सीमित अवसर और बढ़ती प्रतिस्पर्धा। तब पिता के मन में एक सवाल उठता है, “जिस भविष्य के लिए मैंने अपनी जिंदगी की कमाई लगा दी, वह भविष्य मेरे बच्चे को मिलेगा कब?” यह केवल बेरोजगार युवा की पीड़ा नहीं, उस पूरे परिवार की पीड़ा है जिसने शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश समझकर अपनी वर्तमान खुशियां रोक दी थीं।

सरकारी नौकरी का इंतजार और निजी क्षेत्र की मजबूरी,युवा आखिर जाए तो जाए कहां?

वर्तमान में सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है और हर पद के लिए हजारों-लाखों युवा प्रतियोगिता में उतरते हैं। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में नौकरी मिल भी जाए तो कई युवाओं के सामने कम वेतन, अनुबंध, नौकरी की असुरक्षा और काम के दबाव जैसी चुनौतियां रहती हैं। ₹30-40 हजार मासिक वेतन सुनने में ठीक लगता है, लेकिन उसी वेतन से किराया, भोजन, यात्रा, परिवार, बीमा और अन्य खर्च निकालने के बाद बचत कितनी रहती है, यह केवल नौकरी करने वाला युवक जानता है। ESIC और PF जैसी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पात्रता, दस्तावेज और प्रक्रिया के स्तर पर कई श्रमिकों और कर्मचारियों को उनका लाभ लेने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा, वह ऐसी नौकरी मांग रहा है जिसमें मेहनत के बदले सम्मानजनक आय, सुरक्षा और भविष्य मिले।

एक बीमारी आती है और तीस साल की बचत एक झटके में खत्म हो जाती है

वर्तमान में मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी असुरक्षा स्वास्थ्य है। गरीब परिवारों के लिए सरकारी स्वास्थ्य योजनाएं और आयुष्मान जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था में सरकारी अस्पतालों की क्षमता, संसाधन, विशेषज्ञता और पहुंच को लगातार मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है। दूसरी तरफ मध्यम वर्ग कई बार निजी अस्पताल का खर्च उठाते-उठाते अपनी जीवनभर की बचत खत्म कर देता है। जिसने तीस वर्ष नौकरी की, बच्चों की फीस भरी, घर बनाया और थोड़ी बचत की, वही व्यक्ति एक गंभीर बीमारी के सामने खड़ा होकर देखता है कि उसकी जमा पूंजी कुछ ही दिनों में खत्म हो सकती है। सरकार से सवाल है, क्या स्वास्थ्य केवल गरीब और अमीर के बीच की सुविधा है, या हर नागरिक का अधिकार है? मजबूत सरकारी अस्पताल, किफायती इलाज और पारदर्शी स्वास्थ्य व्यवस्था मध्यम वर्ग को भी उतनी ही जरूरत है जितनी समाज के किसी अन्य वर्ग को।

मुफ़्त की योजनाएं गरीबों का हक या कमीशन का खेल?

सरकार की योजनाएं गरीबों और जरूरतमंदों तक राहत पहुंचाने के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन कई बार इन्हीं योजनाओं में बिचौलियों और प्रभावशाली लोगों से जुड़े कथित लोगों द्वारा कमीशन लेने और लाभ दिलाने के नाम पर पैसे मांगने की शिकायतें सामने आती हैं। आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड सहित विभिन्न योजनाओं में ऐसी शिकायतें सुनने को मिलती हैं। कई गरीब परिवार अपना अधिकार पाने के लिए भी हजारों रुपये खर्च करने को मजबूर होने की बात कहते हैं।

सबसे गंभीर सवाल तब उठता है, जब इन मामलों की शिकायत ऊपर के अधिकारियों तक पहुंचने के बाद भी कार्रवाई होती नजर नहीं आती। कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण मिलने की चर्चा भी लोगों के बीच होती है, जिससे शिकायतकर्ता खुद को असहाय महसूस करता है। यदि यह सच है तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीब के अधिकार और शासन की पारदर्शिता पर सीधा सवाल है।

सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति का अधिकार है, किसी बिचौलिए का कमीशन नहीं। जरूरत है कि ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए।

जनता ने प्रतिनिधि चुना… फिर प्रतिनिधि VIP बन गया, यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा व्यंग्य है

जब भी चुनाव आता है तो नेता जनता के बीच आता है। वह उसी गली में जाता है जहां सड़क टूटी होती है, उसी चाय की दुकान पर बैठता है जहां लोग महंगाई पर चर्चा करते हैं, उसी किसान से हाथ मिलाता है जो फसल की चिंता में रहता है और उसी युवा से रोजगार का वादा करता है जो नौकरी की तलाश में भटक रहा है। जनता उसे अपना प्रतिनिधि बनाकर सत्ता में भेजती है। उसके बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था के नियमों के तहत निर्वाचित प्रतिनिधियों को वेतन, भत्ते, यात्रा, आवास, सुरक्षा और अन्य आवश्यक सुविधाएं मिलती हैं। सुरक्षा व्यवस्था भी पद और खतरे के आकलन के अनुसार दी जाती है। इन सुविधाओं की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सवाल यह है कि जनता के पैसे से चलने वाली हर सुविधा की जवाबदेही भी जनता के सामने होनी चाहिए। जनता पेट्रोल की कीमत देखकर अपनी बाइक कम चलाती है, जबकि किसी आधिकारिक दौरे में सरकारी वाहनो और ईंधन का खर्च सार्वजनिक धन से होता है; इसलिए जनता पूछती है “सुविधा मिले, लेकिन हिसाब भी मिले।”

जनता की बाइक में पेट्रोल महंगा, काफिले में कितनी गाड़ियां, यह सवाल क्यों न पूछा जाए?

एक मध्यम वर्गीय व्यक्ति वाहन खरीदता है तो कीमत के साथ टैक्स और अन्य शुल्क देता है, बीमा कराता है, रोड टैक्स देता है, ईंधन खरीदता है, टोल देता है और वाहन की सर्विस भी कराता है। कई बार उसे लगता है कि वाहन चलाना अब जरूरत कम और आर्थिक जिम्मेदारी ज्यादा बन गया है। दूसरी ओर जब सरकारी काफिला सड़क से गुजरता है तो आम आदमी के मन में सवाल उठता है कि उस पूरे सरकारी इंतजाम का खर्च कितना है। यहां सवाल किसी नेता की सुरक्षा या सरकारी यात्रा पर आपत्ति का नहीं है; सवाल सार्वजनिक धन की पारदर्शिता और खर्च की प्राथमिकता का है। यदि सुरक्षा जरूरी है तो पूरी सुरक्षा होनी चाहिए, यदि सरकारी दौरा जरूरी है तो पूरा प्रोटोकॉल होना चाहिए, लेकिन जनता यह जानने का अधिकार भी रखती है कि उसके टैक्स का पैसा कहां और किस उद्देश्य से खर्च हो रहा है।

उद्योगपति देश की ताकत हैं, लेकिन नीति की मेज पर आम आदमी की कुर्सी भी होनी चाहिए

देश को उद्योग चाहिए, कारखाने चाहिए, निवेश चाहिए और रोजगार चाहिए। बड़े उद्योग अर्थव्यवस्था को गति दे सकते हैं, इसलिए सरकार और उद्योग के बीच संवाद होना स्वाभाविक है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले कॉरपोरेट और बड़े दान को लेकर भी देश में लंबे समय से बहस होती रही है और 2024 में सुप्रीम कोर्ट के Electoral Bonds संबंधी फैसले ने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता और मतदाता के सूचना के अधिकार को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। इसलिए यह कहना उचित नहीं कि कोई सरकार केवल उद्योगपतियों के हिसाब से चलती है, जब तक उसके लिए ठोस प्रमाण न हों। लेकिन जनता का सवाल बिल्कुल जायज है “जब बड़े उद्योगों के हितों पर चर्चा होती है तो क्या उसी मेज पर मध्यम वर्ग, किसान, कर्मचारी, छोटे व्यापारी और आम उपभोक्ता की आवाज भी उतनी ही मजबूती से सुनी जाती है?”

उद्योग के लिए नीति, गरीब के लिए योजना और मध्यम वर्ग के लिए क्या?

यही सवाल इस पूरे लेख के केंद्र में है। उद्योग को निवेश चाहिए तो सरकार प्रोत्साहन देती है, आवश्यकता पड़ने पर उसके ऋण भी माफ कर देती है गरीब को सहारा चाहिए तो सरकार योजना देती है, किसान को सहायता चाहिए तो योजना बनती है, लेकिन मध्यम वर्ग को क्या चाहिए? वह कहता है“मुझे किसी की दया नहीं चाहिए, मुझे एक स्थिर व्यवस्था चाहिए।” वह चाहता है कि शिक्षा महंगी न हो, स्वास्थ्य इतना महंगा न हो कि बीमारी से परिवार बिखर जाए, रोजगार ऐसा हो कि युवा अपने पैरों पर खड़ा हो सके, टैक्स व्यवस्था ऐसी हो कि ईमानदार करदाता को हर कदम पर बोझ महसूस न हो और महंगाई ऐसी न हो कि परिवार अपनी मूलभूत जरूरतों में भी कटौती करने लगे। मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी मांग शायद मुफ्त सुविधा नहीं, आर्थिक सम्मान और भविष्य की निश्चितता है।

मुफ्त की चीज मिलने पर खुशी होती है, लेकिन अपनी कमाई से खरीदने का आत्मसम्मान अलग होता है

गरीब को मुफ्त राशन देना गलत नहीं है, जरूरतमंद को सहायता देना सरकार का दायित्व हो सकता है, लेकिन किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की अंतिम सफलता तभी होगी जब लाभार्थी धीरे-धीरे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने। यदि एक युवा को हर महीने सहायता मिलती रहे लेकिन रोजगार न मिले तो उसकी समस्या समाप्त नहीं होती। यदि परिवार को मुफ्त राशन मिलता रहे लेकिन बच्चों की शिक्षा और रोजगार का रास्ता बंद रहे तो गरीबी का चक्र टूटता नहीं। सरकार का लक्ष्य केवल सहायता देना नहीं, ऐसी परिस्थितियां बनाना भी होना चाहिए जिनमें एक दिन नागरिक कह सके “अब मुझे किसी मुफ्त योजना की जरूरत नहीं, मैं खुद कमाऊंगा और टैक्स दूंगा।”

नशा और अपराध की जड़ में केवल पुलिस नहीं, बेरोजगारी और निराशा का सवाल भी देखना होगा

नशे और अपराध को किसी गरीब या बेरोजगार वर्ग से जोड़कर देखना गलत होगा। हर गरीब नशेड़ी नहीं और हर बेरोजगार अपराधी नहीं। लेकिन यह भी सच है कि जब किसी युवा के सामने रोजगार का रास्ता बंद हो, भविष्य को लेकर निराशा हो, नशा आसानी से उपलब्ध हो और परिवार आर्थिक तनाव में हो तो जोखिम बढ़ सकता है। नशे की गिरफ्त में आया व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो सकता है, परिवार में हिंसा और आर्थिक संकट पैदा कर सकता है और कुछ मामलों में नशे की पूर्ति के लिए अपराध की ओर भी जा सकता है। इसलिए केवल गिरफ्तारी और कार्रवाई पर्याप्त नहीं; रोजगार, खेल, कौशल विकास, नशामुक्ति केंद्र, मानसिक-सामाजिक सहयोग और परिवार की आर्थिक सुरक्षा को भी अपराध नियंत्रण की नीति का हिस्सा बनाना होगा। सरकार यदि राजस्व के लिए शराब की बिक्री पर निर्भर रहती है तो उसे उसी समाज में पैदा हो रही स्वास्थ्य और अपराध संबंधी लागत पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।

मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा अपराध शायद यही है कि वह दिखाई देता है

गरीब की गरीबी दिखाई देती है, इसलिए उसके लिए योजनाएं बनती हैं। उद्योग की ताकत दिखाई देती है, इसलिए निवेश और रोजगार की जरूरत को ध्यान में रखकर नीतियां बनती हैं। लेकिन मध्यम वर्ग न पूरी तरह गरीब दिखाई देता है और न इतना अमीर कि उसकी समस्या को गंभीर माना जाए। वह टैक्स देता है, नियम मानता है, बच्चों को पढ़ाता है, EMI भरता है, बीमारी में अपनी बचत खर्च करता है और जरूरत पड़ने पर कर्ज लेता है। शायद उसकी सबसे बड़ी परेशानी यही है कि व्यवस्था उसे देखकर मान लेती है “यह संभाल लेगा।” लेकिन सवाल यह है कि क्या वह सच में संभाल पा रहा है? कितने परिवार अपनी इच्छाएं छोड़कर केवल जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, कितने पिता अपनी जरूरत रोककर बच्चों की फीस भर रहे हैं, कितनी माताएं अपनी दवाइयां टालकर घर का राशन खरीद रही हैं और कितने युवा डिग्री हाथ में लेकर रोजगार के लिए भटक रहे हैं—इनका आंकड़ा किसी आर्थिक रिपोर्ट में शायद दिखाई नहीं देता।

मध्यम वर्ग सरकार से मुफ्त नहीं मांगता, वह सिर्फ इतना चाहता है कि उसकी कमाई उसके परिवार तक सुरक्षित पहुंचे

मध्यम वर्ग की मांग को समझने के लिए उसके घर में जाकर देखना होगा। वह कहता है, “मेरी कमाई पर जो कर बनता है, मैं दूंगा; देश के विकास में योगदान दूंगा; कानून का पालन करूंगा; डिजिटल भुगतान करूंगा; बैंक में पैसा रखूंगा; लेकिन बदले में मुझे गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्कूल, अच्छे अस्पताल, सुरक्षित सड़कें, रोजगार के अवसर, पारदर्शी प्रशासन और ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें मेहनत करने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत का कुछ हिस्सा भविष्य के लिए बचा सके।” वह मुफ्त बिजली से ज्यादा स्थिर बिजली चाहता है, मुफ्त पैसे से ज्यादा रोजगार चाहता है, मुफ्त इलाज से ज्यादा मजबूत सरकारी अस्पताल चाहता है और किसी विशेष रियायत से ज्यादा न्यायपूर्ण व्यवस्था चाहता है। यह मांग किसी दल की नहीं, करोड़ों परिवारों की सामान्य आकांक्षा है।

और फिर महीने की आखिरी तारीख आती है…

महीने की आखिरी तारीख को पिता फिर बैंक ऐप खोलता है। मां राशन के डिब्बे देखती है। बच्चे पूछते हैं कि अगले महीने उनकी फीस कब जमा होगी। घर का कोई सदस्य कहता है कि पेट्रोल भराना है। किसी को दवाई चाहिए। बिजली का बिल बाकी है। मोबाइल रिचार्ज करना है। और पिता कुछ सेकंड चुप रहने के बाद कहता है, “देखते हैं, किसी तरह हो जाएगा।” यही “किसी तरह” आज करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों की सबसे बड़ी आर्थिक रणनीति बन गया है। वे जी रहे हैं, बच्चों को पढ़ा रहे हैं, कर्ज चुका रहे हैं, टैक्स दे रहे हैं, बाजार चला रहे हैं और देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं, लेकिन अपने भविष्य की चिंता भी साथ लेकर चल रहे हैं।

एक दिन मध्यम वर्ग ने अपनी जेब से पूछा तू इतनी जल्दी खाली क्यों हो जाती है?

जेब ने कोई जवाब नहीं दिया। उसमें पेट्रोल का बिल था, स्कूल की फीस की रसीद थी, किराने की पर्ची थी, बिजली का बिल था, EMI का संदेश था, दवाई की पर्ची थी और मोबाइल में कई UPI भुगतान की हिस्ट्री थी। जेब ने बस इतना कहा “मैं खाली नहीं हुई हूं, मुझे कई जगहो पर थोड़ा-थोड़ा करके बांट दिया गया है।”

यही इस पूरे लेख का व्यंग्य है। मध्यम वर्ग को एक बड़ी चोट नहीं मारती, उसे छोटी-छोटी कटौतियां मिलकर कमजोर करती हैं। कहीं महंगाई, कहीं फीस, कहीं स्वास्थ्य खर्च, कहीं रोजगार की अनिश्चितता, कहीं बैंक शुल्क, कहीं ईंधन, कहीं टोल और कहीं भविष्य का डर हर तरफ से थोड़ी-थोड़ी रकम निकलती है और अंत में परिवार पूछता है कि बचत क्यों नहीं हुई।

सरकार से मध्यम वर्ग की मांग : मुफ्त नहीं, मजबूत व्यवस्था दीजिए

सरकार यदि वास्तव में मध्यम वर्ग की पीड़ा कम करना चाहती है तो उसे केवल राहत की घोषणाओं से आगे जाकर शिक्षा की लागत, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर, कौशल विकास, कर व्यवस्था, महंगाई नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन, छोटे व्यवसायों की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर दीर्घकालिक ध्यान देना होगा। सरकारी अस्पतालों में संसाधन बढ़ें, सरकारी शिक्षा मजबूत हो, निजी शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते खर्च पर प्रभावी नियमन और पारदर्शिता हो, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ें, निजी क्षेत्र में श्रम कानूनों का वास्तविक पालन हो, PF और ESIC का लाभ आसानी से मिले और ईमानदार करदाता को अनावश्यक प्रक्रियाओं से राहत मिले। कल्याणकारी योजनाएं चलें, लेकिन उनका लक्ष्य नागरिक को हमेशा निर्भर रखना नहीं बल्कि आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। और सरकारी धन चाहे किसी गरीब की योजना में खर्च हो या किसी प्रतिनिधि की सुविधा में उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही जनता के सामने होनी चाहिए।

आखिर सवाल यह नहीं कि सरकार ने कितना दिया, सवाल यह है कि जनता के पास कितना बचा

देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, विकास हो, उद्योग बढ़ें, डिजिटल भुगतान बढ़े, निवेश आए, गरीब को सहायता मिले, इन सबका स्वागत होना चाहिए। लेकिन विकास की अंतिम कसौटी यह भी होनी चाहिए कि सामान्य परिवार की जिंदगी कितनी आसान हुई। यदि GDP बढ़ती है लेकिन परिवार की बचत घटती जाती है, यदि डिजिटल लेनदेन बढ़ता है लेकिन नागरिक भविष्य के शुल्क से चिंतित है, यदि उद्योग बढ़ते हैं लेकिन युवा रोजगार के लिए भटकता है, यदि योजनाएं बढ़ती हैं लेकिन मध्यम वर्ग अपनी जरूरतें काटता जाता है, तो नीति-निर्माताओं को इस अंतर को गंभीरता से देखना होगा। क्योंकि देश केवल बड़े उद्योगों, सरकारी योजनाओं और आर्थिक आंकड़ों से नहीं चलता; देश उन करोड़ों परिवारों से चलता है जो हर महीने अपनी कमाई से घर चलाते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं, टैक्स देते हैं और फिर भी उम्मीद बनाए रखते हैं।

एक आखिरी सवाल… जिसका जवाब मध्यम वर्ग आज भी इंतजार कर रहा है

“जिस देश को बनाने में हम टैक्स देते हैं, जिस अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए हम रोज काम करते हैं, जिस डिजिटल इंडिया को हमने अपनाया, जिस बाजार को हम अपनी कमाई से चलाते हैं, जिस शिक्षा के लिए हम कर्ज लेते हैं और जिस भविष्य के लिए हम अपनी आज की खुशियां रोक देते हैं—उस भविष्य में मध्यम वर्ग के लिए आखिर कितना सुरक्षित स्थान बचा है?” और शायद उससे भी बड़ा सवाल “गरीब को सहारा, उद्योग को प्रोत्साहन और सत्ता को सुविधाएं मिलती रहें, लेकिन मध्यम वर्ग को केवल यह कहकर कब तक समझाया जाएगा कि ‘आप संभाल लीजिए, आप तो मध्यम वर्ग हैं’?”

 मध्यम वर्ग को दया नहीं, नीति में सम्मान चाहिए

समाधान किसी एक योजना में नहीं है। सरकार को महंगाई पर प्रभावी निगरानी के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के खर्च को नियंत्रित करने की दिशा में काम करना होगा। युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों के साथ निजी क्षेत्र में सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार पैदा करने होंगे। PF, ESIC और श्रम कानूनों का लाभ वास्तविक श्रमिक तक सरल तरीके से पहुंचाना होगा। सरकारी स्कूल और अस्पताल इतने मजबूत होने चाहिए कि मध्यम वर्ग भी उन पर भरोसा कर सके। कर व्यवस्था में पारदर्शिता और सरलता बढ़ानी होगी। डिजिटल भुगतान की व्यवस्था को नागरिकों के लिए भरोसेमंद और कम लागत वाली बनाए रखना होगा तथा किसी भी नए शुल्क को लागू करने से पहले उसके प्रभाव की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। सरकारी प्रतिनिधियों और सार्वजनिक संस्थाओं पर होने वाले खर्च की पारदर्शिता बढ़ानी होगी। कल्याणकारी योजनाओं के साथ कौशल और रोजगार को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि मुफ्त सहायता स्थायी निर्भरता नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता की सीढ़ी बने। और सबसे जरूरी, नीति बनाते समय गरीब, किसान और उद्योग के साथ मध्यम वर्ग की आवाज को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए।

 मध्यम वर्ग को बचाना मतलब देश की रीढ़ को मजबूत करना

मध्यम वर्ग कोई अलग दुनिया नहीं है। इसी वर्ग में वह पिता है जो सुबह नौकरी पर जाता है, वही मां है जो घर का खर्च संभालती है, वही बेटी है जिसकी शादी के लिए सालों से बचत हो रही है, वही बेटा है जो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, वही कर्मचारी है जो PF काटकर भविष्य सुरक्षित समझता है और वही छोटा व्यापारी है जो हर लेनदेन का हिसाब रखता है। वह न सरकार से मुफ्त का जीवन मांगता है, न किसी विशेष कृपा की अपेक्षा करता है। वह सिर्फ इतना चाहता है कि उसकी मेहनत की कमाई से परिवार सम्मानपूर्वक चल सके, बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो, बीमारी घर न उजाड़े, रोजगार मिले और महीने के आखिर में जेब खाली होने के बजाय थोड़ी-सी उम्मीद बची रहे। सरकारें आती-जाती रहेंगी, नीतियां बदलती रहेंगी, डिजिटल व्यवस्था और मजबूत होगी, अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी, लेकिन यदि विकास के बीच आम परिवार की चिंता बढ़ती चली गई तो हमें रुककर यह पूछना ही होगा कि विकास का लाभ समाज के हर हिस्से तक किस अनुपात में पहुंच रहा है। मध्यम वर्ग की आवाज किसी सरकार के खिलाफ आवाज नहीं है; यह उस देश के नागरिक की आवाज है जो अपना हिस्सा निभा रहा है और अब चाहता है कि व्यवस्था भी उसके हिस्से की चिंता करे।

एक जरूरी संपादकीय स्पष्टता

यह लेख किसी राजनीतिक दल, नेता, सरकार, उद्योगपति या व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसमें महंगाई, कर व्यवस्था, डिजिटल भुगतान, कल्याणकारी योजनाओं, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी सुविधाओं और राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था से जुड़े विषयों को व्यंग्यात्मक, आलोचनात्मक और जनहितकारी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। जहां तथ्यात्मक विषय हैं, वहां उन्हें वास्तविक नीतियों और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के संदर्भ में समझना चाहिए। विशेष रूप से UPI के संबंध में अभी हर उपभोक्ता भुगतान पर कोई सामान्य UPI टैक्स लागू होने की बात सही नहीं है; संभावित MDR और उसके दायरे को लेकर भविष्य की व्यवस्था को वर्तमान कर के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार ATM निकासी शुल्क और UPI शुल्क अलग-अलग विषय हैं।

“कलम की धार” का उद्देश्य फैसला सुनाना नहीं, सवाल उठाना है; किसी को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की आवाज को सामने लाना है जिसकी जिंदगी में ये सवाल रोज दिखाई देते हैं।

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़  साप्ताहिक विशेषांक “कलम की धार”

हर रविवार पाठकों की पसंद और मांग पर प्रकाशित।

“कलम की धार” आम जनता की समस्याओं, जनहितकारी मुद्दों, राजनीतिक-सामाजिक आलोचनात्मक विश्लेषण और उन आवाजों को सामने लाने का एक छोटा-सा प्रयास है, जो अक्सर भीड़ में दब जाती हैं। यदि आपके पास राजनीतिक, आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक या जनहितकारी लेख, आपके क्षेत्र की कोई समस्या, पर्यटन अथवा दर्शनीय स्थल, लोकपर्व, संस्कार, संस्कृति, परंपरा या समाज से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण विषय है, तो हमें भेजिए। आपके नाम के साथ आपके लेख को निशुल्क प्रकाशित करने का प्रयास किया जाएगा।

यह मंच आम जनता की आवाज है आपका सहयोग अनिवार्य है।

संपर्क : 7647 9817 11 | 9303948009

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

निष्पक्षता • निरपेक्षता • निर्भीकता • जनहित

प्रदीप मिश्रा

देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल 

अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

हम लाते हैं निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबरें।

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now