नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे +91 7647981711 ,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , “छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराधों की आहट… क्या सत्ता के साथ बदल रहा है संगठन का चेहरा?” – Anjor Chhattisgarh News

Anjor Chhattisgarh News

सच की तह तक

“छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराधों की आहट… क्या सत्ता के साथ बदल रहा है संगठन का चेहरा?”

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

रायपुर छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009

छत्तीसगढ़ में बदलती राजनीतिक संस्कृति पर बड़ा सवाल: क्या सत्ता के साथ कमजोर पड़ रहा है अनुशासन और विचारधारा?

अपराध, अवैध कारोबार और प्रभाव की राजनीति के बीच पुराने कार्यकर्ताओं की खामोशी, नेतृत्व के लिए आत्ममंथन का समय

ACGN:- छत्तीसगढ़ की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को वर्षों तक अनुशासन, संगठन शक्ति और समर्पित कार्यकर्ताओं की पार्टी के रूप में पहचान मिली। एक ऐसा संगठन, जहां कार्यकर्ता पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं बल्कि विचारधारा, जनसेवा और राष्ट्रहित की भावना से जुड़ते थे। लेकिन बदलते समय के साथ प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर में कई ऐसे सवाल सामने आने लगे हैं, जिन पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।
आज प्रदेश में अपराध, अवैध कारोबार और राजनीतिक प्रभाव को लेकर आम जनता के बीच चिंता बढ़ रही है। अलग-अलग जिलों में सामने आई घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर वह व्यवस्था कहां कमजोर हो रही है, जहां कानून का शासन सबसे ऊपर होना चाहिए।
कटघोरा में अक्षय गर्ग हत्याकांड हो या पाली क्षेत्र में हुई हत्या जैसी घटनाएं, इन मामलों ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं कोरिया क्षेत्र में कोयला और रेत जैसे कारोबार से जुड़े विवादों में सामने आई हिंसक घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी कि कहीं आर्थिक हितों और राजनीतिक प्रभाव का गठजोड़ तो व्यवस्था को प्रभावित नहीं कर रहा।
आज सबसे बड़ी चिंता यह है कि जब किसी भी अवैध गतिविधि को राजनीतिक संरक्षण मिलने की चर्चा शुरू होती है, तो उसका असर केवल प्रशासन पर नहीं बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है।
पुराने कार्यकर्ताओं से चर्चा करने पर एक अलग पीड़ा सामने आती है। उनका कहना है कि जब भाजपा सत्ता में नहीं थी, तब कार्यकर्ता संघर्ष को अपना कर्तव्य मानते थे। गांव-गांव जाकर संगठन खड़ा करना, जनता की समस्याओं के लिए आवाज उठाना और बिना किसी अपेक्षा के काम करना ही कार्यकर्ता की पहचान थी।
लेकिन सत्ता में आने के बाद राजनीति का स्वरूप कई जगह बदलता दिखाई दिया। कुछ ऐसे लोग भी प्रभावशाली होते गए जिनकी प्राथमिकता संगठन की विचारधारा से ज्यादा सत्ता के करीब रहकर अपना प्रभाव बढ़ाना रही।
यही कारण है कि आज कई स्थानों पर यह चर्चा सुनने को मिलती है कि कुछ लोग मंत्रियों और बड़े नेताओं के नाम का सहारा लेकर अपने काम निकालने, अधिकारियों पर दबाव बनाने या अपने हित साधने का प्रयास करते हैं।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और प्रशासन एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं, लेकिन जब जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है। विधायक और तहसीलदार जैसे मामलों में सामने आए विवादों ने भी यह संदेश दिया कि व्यवस्था में संवाद और मर्यादा बनाए रखना कितना जरूरी है।
सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि जिन पुराने कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संगठन को खड़ा किया, वे आज कई बार खामोश नजर आते हैं। जिन लोगों ने कठिन समय में पार्टी का झंडा उठाया, संघर्ष किया, वे पीछे खड़े दिखाई देते हैं और सत्ता के आसपास रहने वाले नए चेहरे ज्यादा प्रभावशाली नजर आते हैं।
यह केवल एक राजनीतिक दल का विषय नहीं, बल्कि हर उस संगठन के लिए चेतावनी है जो विचारधारा के आधार पर खड़ा हुआ हो।
क्योंकि सत्ता का दौर बदल सकता है, लेकिन संगठन की पहचान उसके मूल सिद्धांतों से बनती है। अगर अनुशासन की जगह व्यक्तिगत प्रभाव, सेवा की जगह स्वार्थ और विचारधारा की जगह अवसरवाद हावी होने लगे तो सबसे बड़ा नुकसान उसी संगठन को होता है जिसने वर्षों में जनता का विश्वास बनाया है।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए यह समय केवल उपलब्धियों को गिनाने का नहीं बल्कि जमीनी सच्चाइयों को सुनने का भी है। जरूरी है कि पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं को फिर से सम्मान और भूमिका मिले, संगठन में अनुशासन मजबूत हो और प्रशासन को निष्पक्ष होकर काम करने का अवसर मिले।
क्योंकि जनता सब देख रही है। जनता यह भी याद रखती है कि कौन उसके साथ खड़ा रहा और कौन केवल सत्ता के समय दिखाई दिया।

राजनीति में सबसे बड़ी ताकत कुर्सी नहीं, जनता का विश्वास होता है। और विश्वास तभी कायम रहता है जब सत्ता सेवा का माध्यम बने, दबाव का साधन नहीं।

अब संगठन को क्या करना चाहिए?

भारतीय जनता पार्टी जैसे बड़े राजनीतिक संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज यही है कि वह अपनी मूल पहचान और अनुशासन को फिर से मजबूत करे। संगठन को केवल सत्ता के आसपास रहने वाले चेहरों तक सीमित न रहकर उन पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को फिर से केंद्र में लाना होगा, जिन्होंने कठिन समय में पार्टी की विचारधारा को गांव-गांव तक पहुंचाया।

जरूरत इस बात की है कि संगठन में पद और प्रभाव का आधार केवल नजदीकी या सिफारिश नहीं बल्कि कार्यकर्ता की निष्ठा, समाज में उसकी छवि और जनसेवा का रिकॉर्ड हो। जो कार्यकर्ता वर्षों से जनता के बीच रहकर काम कर रहे हैं, उनकी आवाज को महत्व देना होगा।

सत्ता में रहने के दौरान सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है कि सरकार और संगठन के नाम का उपयोग कोई व्यक्ति निजी लाभ, दबाव या गलत गतिविधियों के लिए न कर सके। पार्टी नेतृत्व को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके काम से हो, न कि किसी बड़े नेता की नजदीकी से।

प्रशासन को भी स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करने का वातावरण मिलना चाहिए। अधिकारी और जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, दोनों के बीच सम्मान और सहयोग जरूरी है, टकराव नहीं।

संगठन को समय-समय पर आत्ममंथन करना होगा कि आखिर क्यों पुराने कार्यकर्ता पीछे हटते जा रहे हैं और क्यों सत्ता के आसपास रहने वाले लोग अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगे हैं। यदि समय रहते इस बदलाव को नहीं समझा गया तो इसका असर केवल संगठन पर नहीं बल्कि जनता के विश्वास पर भी पड़ेगा।

राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की सेवा और विश्वास की जिम्मेदारी है। जिस संगठन की पहचान अनुशासन और विचारधारा से बनी हो, उसके लिए सबसे जरूरी है कि वह अपने मूल सिद्धांतों को जीवित रखे।

आज आवश्यकता है कि दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को सम्मान मिले, कानून व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए और सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया जाए।

क्योंकि इतिहास गवाह है कि किसी भी राजनीतिक संगठन की असली ताकत कुर्सी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास और कार्यकर्ताओं का समर्पण होता है। अगर यह विश्वास मजबूत रहा तो संगठन मजबूत रहेगा, लेकिन अगर यह दूरी बढ़ी तो आने वाले समय में सवाल और गहरे होते जाएंगे।

प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर और जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now