पर्यावरण मंत्री के गृह जिले में हरियाली का सामूहिक नरसंहार! ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के बीच 60 से अधिक पेड़ों पर चली आरी
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रायगढ़ छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- संजय जेठवानी
धरमजयगढ़ के रूपुंगा में बड़े पैमाने पर वृक्ष कटाई का मामला, संरक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ा विवाद; जांच और कार्रवाई पर टिकी निगाहें। आखिर संरक्षण के दावों का सच क्या है?
धरमजयगढ़/रायगढ़। प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े अभियान चलाए जा रहे हैं। सरकार “एक पेड़ मां के नाम” जैसी योजनाओं के माध्यम से जनभागीदारी बढ़ाने का प्रयास कर रही है। करोड़ों रुपये वृक्षारोपण और हरित आवरण बढ़ाने पर खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन पर्यावरण मंत्री के गृह जिले रायगढ़ में ही यदि एक साथ 60 से 70 पेड़ों की कटाई का मामला सामने आए, तो यह केवल एक स्थानीय घटना नहीं बल्कि पूरे पर्यावरण संरक्षण तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

धरमजयगढ़ क्षेत्र के रूपुंगा ग्राम में लगभग चार एकड़ भूमि पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई किए जाने का मामला सामने आया है। ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार दर्जनों पेड़ों को इस प्रकार काटा गया मानो वे वर्षों पुराने वृक्ष नहीं बल्कि खेत की सामान्य फसल हों। बताया जा रहा है कि कटे हुए पेड़ों को हटाने और भूमि को समतल कर कृषि उपयोग में लाने के लिए जेसीबी मशीन लगाने की तैयारी भी कर ली गई थी। मामला सार्वजनिक होने और मीडिया में चर्चा के बाद कथित रूप से संबंधित पक्षों द्वारा जिम्मेदारी से दूरी बनाने की कोशिश शुरू हो गई।

मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस भूमि का स्वामित्व तिलकराम पटेल निवासी जोबीतराई (रायगढ़) के नाम बताया जा रहा है, वहां अब यह दावा किया जा रहा है कि पेड़ों की कटाई किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कराई गई। यदि वास्तव में किसी बाहरी व्यक्ति ने भूमि पर प्रवेश कर इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काट दिए, तो क्या इसकी शिकायत तत्काल वन विभाग अथवा राजस्व विभाग को दी गई? यदि शिकायत दर्ज नहीं हुई, तो स्वाभाविक रूप से संदेह की सुई भूमि स्वामी अथवा संबंधित पक्षों की ओर घूमती है।

यह मामला केवल एक गांव या एक जमीन तक सीमित नहीं दिखता। धरमजयगढ़ सहित जिले के कई हिस्सों से समय-समय पर पेड़ों की कटाई और वन क्षेत्र पर अतिक्रमण जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। पर्यावरण संरक्षण की सरकारी घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच का यह विरोधाभास अब अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा है।

एक तरफ पौधरोपण के कार्यक्रमों की तस्वीरें प्रचारित होती हैं, वहीं दूसरी तरफ वर्षों से पर्यावरण को संतुलित रखने वाले वृक्षों की कटाई की खबरें भी लगातार सामने आती हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि एक परिपक्व वृक्ष को विकसित होने में वर्षों लगते हैं, तो उसकी कटाई केवल लकड़ी का नुकसान नहीं बल्कि जैव विविधता, भूजल संरक्षण, तापमान संतुलन और पर्यावरणीय सुरक्षा पर सीधा आघात है। ऐसे में यदि दर्जनों वृक्ष एक साथ समाप्त कर दिए जाएं तो इसका प्रभाव स्थानीय पर्यावरण पर भी पड़ना तय है।

अब निगाहें प्रशासन और वन विभाग की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या मौके पर निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान की जाएगी? क्या वन संरक्षण कानूनों के तहत कठोर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी नोटिस, स्पष्टीकरण और फाइलों तक सीमित होकर रह जाएगा?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब सरकार “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के माध्यम से पर्यावरण बचाने का संदेश दे रही है, तब पर्यावरण मंत्री के गृह जिले में ही दर्जनों पेड़ों की कटाई कैसे हो गई?

और यदि जिले में लगातार इस प्रकार की घटनाएं हो रही हैं, तो क्या वन विभाग की निगरानी व्यवस्था वास्तव में प्रभावी है या केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है?
प्रदीप मिश्रा
निष्पक्ष, निर्भीक और सच्ची खबर, हर खबर पर तिरछी नजर। जनहित के प्रति समर्पित पत्रकारिता के साथ देश में तेजी से बढ़ता विश्वसनीय वेब पोर्टल अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़।
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