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तालाब निर्माण के नाम पर हरे-भरे पेड़ों की बलि! वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- संजय जेठवानी

जल संरक्षण परियोजना के लिए दर्जनों पेड़ों की कटाई से ग्रामीणों में नाराजगी, पर्यावरण संरक्षण के दावों पर उठे प्रश्न

धरमजयगढ़ ACGN:- विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहां एक ओर पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और जैव विविधता बचाने की बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर धरमजयगढ़ वनमंडल के छाल वन परिक्षेत्र से सामने आई एक तस्वीर वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां जल संरक्षण और पानी संग्रहण के लिए तालाब निर्माण के नाम पर दर्जनों हरे-भरे एवं परिपक्व पेड़ों की कटाई किए जाने का मामला सामने आया है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में नाराजगी व्याप्त है।


जानकारी के अनुसार छाल वन परिक्षेत्र के संरक्षित वन क्षेत्र में जल संरक्षण के उद्देश्य से तालाब निर्माण का कार्य कराया जा रहा है। आरोप है कि इस निर्माण कार्य के लिए बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों को काट दिया गया। जंगल के बीच जेसीबी मशीनों से कराए जा रहे कार्य की तस्वीरें और जानकारी सामने आने के बाद लोगों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर जिस विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी जंगलों और पेड़ों की रक्षा करना है, वही विभाग पेड़ों की कटाई कर विकास कार्यों को प्राथमिकता क्यों दे रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित क्षेत्र सैकड़ों हेक्टेयर में फैला हुआ संरक्षित वन क्षेत्र है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या पूरे वन क्षेत्र में तालाब निर्माण के लिए ऐसी कोई जगह उपलब्ध नहीं थी, जहां बिना पेड़ों को नुकसान पहुंचाए कार्य किया जा सकता था। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से खड़े और पर्यावरण को संतुलित रखने वाले पेड़ों को काटकर तालाब निर्माण करना दूरदर्शी योजना नहीं बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी है।


ग्रामीणों का कहना है कि जल संरक्षण आवश्यक है और इसके लिए किए जा रहे प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन यदि जल संरक्षण की कीमत परिपक्व पेड़ों की कटाई के रूप में चुकानी पड़े तो यह चिंता का विषय बन जाता है। उनका मानना है कि विभाग को ऐसे स्थानों का चयन करना चाहिए था जहां पर्यावरणीय क्षति न्यूनतम होती।
मामले को लेकर पर्यावरण से जुड़े जानकारों ने भी कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कई बार निर्माण कार्यों की लागत कम रखने के उद्देश्य से ऐसी प्राकृतिक ढलान वाली जगहों का चयन किया जाता है जहां कम मिट्टी कटाई और कम निर्माण कार्य में तालाब तैयार हो जाए। इससे परियोजना की लागत कम दिखाई देती है और कार्य शीघ्र पूरा हो जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में अक्सर उन पेड़ों का महत्व नजरअंदाज कर दिया जाता है जिन्हें विकसित होने में वर्षों नहीं बल्कि दशकों का समय लगता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी परिपक्व पेड़ की पर्यावरणीय उपयोगिता को केवल उसकी लकड़ी के मूल्य से नहीं आंका जा सकता। ऐसे पेड़ वन्यजीवों का आश्रय स्थल होते हैं, भूजल संरक्षण में योगदान देते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं तथा वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे पेड़ों की कटाई से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सरकार और वन विभाग हर वर्ष बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लोगों को पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है और जंगल बचाने के संदेश दिए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि विकास कार्यों के नाम पर पहले से विकसित और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण पेड़ों की कटाई की जाती है, तो इससे विभाग की नीतियों और जमीनी कार्यप्रणाली के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि एक ओर पौधे लगाने की बात हो और दूसरी ओर वर्षों पुराने वृक्षों को काट दिया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण के दावे कमजोर पड़ जाते हैं। उनका मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते योजनाओं का चयन और क्रियान्वयन दूरदर्शिता के साथ किया जाए।
मामले के सामने आने के बाद अब ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों की नजर उच्च अधिकारियों पर टिकी हुई है। लोगों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि तालाब निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई कितनी आवश्यक थी। साथ ही यह भी बताया जाए कि क्या इसके लिए कोई वैकल्पिक स्थल उपलब्ध था और यदि था तो उसका चयन क्यों नहीं किया गया।
ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि यदि नियमों की अनदेखी हुई है या पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं किया गया है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए। साथ ही कटे हुए पेड़ों के बदले पर्याप्त संख्या में पौधारोपण और उनके संरक्षण की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।
फिलहाल यह मामला क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि वन विभाग इस पूरे विवाद पर क्या पक्ष रखता है और उच्च अधिकारी मामले में जांच कर कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या नहीं। लेकिन इतना तय है कि तालाब निर्माण के नाम पर हुई पेड़ों की कटाई ने पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस जरूर खड़ी कर दी है।

प्रदीप मिश्रा
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