संगत, विवेक और श्रीराम में अटूट विश्वास का संदेश – पं. विजयानन्द शर्मा
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संपादकीय
By ACGN 7647 98171193039 48009
पं. विजयानन्द शर्मा जी के चिंतन पर आधारित विशेष लेख
आज का युग सूचना, आकर्षण और भ्रम का युग है। व्यक्ति बाहरी चमक-दमक, दिखावे और त्वरित लाभ के प्रलोभनों में उलझकर अक्सर सही और गलत का अंतर भूल जाता है। ऐसे समय में विवेक, सत्संग और ईश्वर में विश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बनकर सामने आते हैं। पं. विजयानन्द शर्मा जी ने अपने संदेश में इसी जीवन-दर्शन को अत्यंत सरल किंतु गहन शब्दों में प्रस्तुत किया है।
उन्होंने रामचरितमानस की इस चौपाई का स्मरण कराया है
“चितवहि राम कृपा कर जेहि।
संत विशुद्ध मिलहिं पर तेहि॥”
अर्थात जिस पर भगवान श्रीराम की कृपा होती है, उसे निर्मल और सच्चे संतों का सान्निध्य प्राप्त होता है। वास्तव में मनुष्य का जीवन उसकी संगति से ही बनता और बिगड़ता है। इसलिए वर्तमान समय में मित्र, मार्गदर्शक, गुरु और सहयोगी चुनते समय विशेष सावधानी आवश्यक है।
मानस के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए पंडित जी बताते हैं कि बाहरी स्वरूप पर विश्वास करना हमेशा उचित नहीं होता। सुंदर स्त्री के रूप में दिखाई देने वाली शूर्पणखा निकली, स्वर्ण मृग वास्तव में मारीच था, साधु के वेश में रावण आया, गुरु के रूप में कालनेमि मिला और कपटमुनि के कारण प्रतापभानु जैसा धर्मात्मा राजा भी विनाश की ओर बढ़ गया। यह सभी प्रसंग हमें चेतावनी देते हैं कि केवल बाहरी रूप देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए।
ऐसी परिस्थितियों में भक्त का मार्ग क्या होना चाहिए? इसका उत्तर भी वे मानस की चौपाइयों में देते हैं
“सीताराम चरण रति मोरे।
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे॥”
और
“जेहि विधि होइ नाथ हित मोरा।
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥”
अर्थात भक्त को अपने जीवन का भार भगवान पर छोड़कर उनके चरणों में प्रेम बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। जो ईश्वर को समर्पित हो जाता है, उसके जीवन में अनावश्यक चिंताएं कम हो जाती हैं।
पंडित जी तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे का भी उल्लेख करते हैं
“प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर।
तुलसी चिंता क्यों करे, भज ले श्री रघुवीर॥”
यह दोहा मनुष्य को याद दिलाता है कि जीवन की अनेक घटनाएं प्रारब्ध और ईश्वरीय विधान के अनुसार घटित होती हैं। इसलिए हर परिस्थिति में अत्यधिक चिंता करने के बजाय भगवान के स्मरण में मन लगाना अधिक हितकारी है।
इसी संदर्भ में वे एक अन्य प्रसिद्ध वचन भी उद्धृत करते हैं
“आयु कर्म अरु धन विद्या, मृत्यु ये पाँच।
जीव गर्भ में ही रहत, जात लिखिही सब साँच॥”
अर्थात आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु का विधान जन्म से पहले ही निश्चित माना गया है। मनुष्य का कर्तव्य केवल श्रेष्ठ कर्म करना है।
संपादकीय दृष्टि से देखें तो आज समाज में अनेक लोग तंत्र-मंत्र, अंधविश्वास, झूठे दावों और चमत्कारों के नाम पर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। कोई ग्रह-नक्षत्रों का भय दिखाता है, कोई भूत-प्रेत का, तो कोई तत्काल समाधान का प्रलोभन देता है। ऐसे समय में विवेकशील व्यक्ति को सतर्क रहना चाहिए।
पंडित जी एक सुंदर उदाहरण देते हैं। जैसे गर्मी में कूलर सुख देता है और सर्दी में वही कूलर कष्टदायक लगने लगता है। वास्तव में सुख-दुःख का कारण कूलर नहीं, बल्कि समय और परिस्थिति होती है। इसी प्रकार जीवन में आने वाली अनेक स्थितियों का कारण भी समय और प्रारब्ध होता है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
सच्चा सद्गुरु भी मनुष्य को यही शिक्षा देता है कि जीवन में आने वाली अनुकूलता और प्रतिकूलता को ईश्वर की इच्छा मानकर धैर्यपूर्वक स्वीकार किया जाए। भक्ति का मार्ग मनुष्य को भय, भ्रम और चिंता से मुक्त करता है।
अंत में पंडित जी का यह दोहा जीवन के लिए प्रेरक संदेश बन जाता है
“जिनही भरोसो राम को, तिनही न व्यापहि क्लेश।
राम सदा रक्षा करैं, धरि-धरि नित नव वेश॥”
अर्थात जिन लोगों को भगवान श्रीराम पर पूर्ण विश्वास होता है, उन्हें क्लेश और भय अधिक समय तक परेशान नहीं कर पाते। भगवान विभिन्न रूपों में अपने भक्तों की रक्षा करते रहते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दिखावे, भ्रम और प्रलोभनों से बचें, विवेकपूर्ण निर्णय लें, श्रेष्ठ संगति अपनाएं और भगवान श्रीराम के चरणों में अपनी आस्था दृढ़ करें। यही जीवन को संतुलित, शांत और सार्थक बनाने का सबसे सरल मार्ग है।
संपादकीय डेस्क
अंजोर छत्तीसगढ़ न्यूज़
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