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धारा-7 की अधिसूचना से गरमाई कोल ब्लॉक की राजनीति, दुर्गापुर-सरिया-तराईमार परियोजना पर फिर उठे विरोध के स्वर

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

संवाददाता:- संजय जेठवानी

सात गांवों की हजारों हेक्टेयर भूमि प्रभावित होने की आशंका, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट को लेकर ग्रामीणों में बढ़ी बेचैनी

रायगढ़ ACGN:- धरमजयगढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित दुर्गापुर-सरिया-तराईमार कोल ब्लॉक परियोजना को लेकर एक बार फिर संघर्ष की जमीन तैयार होती दिखाई दे रही है। कोयला मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा कोल बेरिंग एरिया (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम 1957 की धारा-7 के अंतर्गत अधिसूचना जारी किए जाने के बाद प्रभावित गांवों में हलचल तेज हो गई है। ग्रामीणों के बीच जमीन, जंगल और विस्थापन को लेकर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं तथा आने वाले दिनों में विरोध आंदोलन की संभावना भी जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने इस कोल ब्लॉक का आवंटन कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (केपीसीएल) को किया था। इससे पहले यह खदान डी.बी. पावर लिमिटेड और वेदांता समूह को आवंटित की गई थी, लेकिन वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देशभर के कई कोल ब्लॉकों का आवंटन निरस्त किए जाने के बाद इस परियोजना को नए सिरे से केपीसीएल को सौंपा गया।


प्रस्तावित ओपन कास्ट कोयला खदान का दायरा काफी बड़ा बताया जा रहा है। परियोजना से धरमजयगढ़ तहसील के तराईमार, मेडरमार, धरमजयगढ़, धरमजयगढ़ कॉलोनी, बयासी, बयासी कॉलोनी और रुपुंगा सहित सात गांवों की लगभग 1610.75 हेक्टेयर भूमि प्रभावित होगी। वहीं नगर पंचायत क्षेत्र के कई हिस्से भी इसकी जद में आ रहे हैं। संतोष नगर चर्च क्षेत्र, पतरापारा और धरमजयगढ़ कॉलोनी सहित कई मोहल्लों के लगभग 128 परिवारों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।
जानकारी के अनुसार बयासी, हाथीगाड़ा कॉलोनी, ढालीपारा, तराईमार और बयासी कॉलोनी जैसे गांवों के पूर्ण विस्थापन की आशंका व्यक्त की जा रही है। यही कारण है कि अधिसूचना जारी होते ही ग्रामीणों के बीच चिंता और असंतोष का माहौल दिखाई देने लगा है।


इस परियोजना का विरोध पहले भी कई बार सामने आ चुका है। कुछ समय पूर्व ग्राम पंचायत बयासी और बयासी कॉलोनी में आयोजित विशेष ग्राम सभाओं में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर खनन परियोजना का विरोध किया था। ग्राम सभा में कहा गया था कि प्रस्तावित खदान क्षेत्र घने जंगलों और हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग से जुड़ा हुआ है। ऐसे में खनन गतिविधियों से मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने की आशंका है।
ग्रामीणों का कहना है कि कोयला खनन शुरू होने से क्षेत्र के जंगल, जलस्रोत, कृषि भूमि और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। स्थानीय लोगों का मानना है कि विकास और रोजगार के नाम पर उनके अस्तित्व, संस्कृति और आजीविका को खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए। ग्राम सभाओं में यह भी निर्णय लिया गया था कि विरोध संबंधी प्रस्तावों को केंद्र और राज्य शासन के संबंधित विभागों तक पहुंचाया जाएगा।
अब जबकि धारा-7 की अधिसूचना जारी हो चुकी है, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। दूसरी ओर प्रभावित गांवों के लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। रोजगार और औद्योगिक विकास के दावों के बीच जंगल, जल और जमीन की रक्षा का मुद्दा एक बार फिर प्रमुखता से उभरकर सामने आ गया है।
क्षेत्र में पहले भी खनन परियोजनाओं के खिलाफ बड़े जनआंदोलन हो चुके हैं। ऐसे में नई अधिसूचना के बाद ग्रामीणों की बैठकों और ग्राम सभाओं पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन सकता है। अब देखना होगा कि प्रशासन, कंपनी और ग्रामीणों के बीच इस बहुचर्चित परियोजना को लेकर आगे क्या स्थिति बनती है।

प्रदीप मिश्रा
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