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गोद में मासूम, हाथों में कटोरा: सूरजपुर की सड़कों पर मजबूर बचपन

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सूरजपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN 7647981711, 9303948009

संवाददाता:- सौरभ साहू

चौक-चौराहों पर बच्चों संग भीख मांगती महिलाओं की बढ़ती संख्या ने खोली गरीबी और बेरोजगारी की हकीकत

सूरजपुर ACGN:- जिले के चौक-चौराहों पर इन दिनों एक ऐसी तस्वीर लगातार दिखाई दे रही है, जो विकास और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। गोद में छोटे-छोटे मासूम बच्चों को लिए महिलाएं सड़कों पर भीख मांगती नजर आ रही हैं। यह केवल आर्थिक तंगी की कहानी नहीं बल्कि टूटती पारंपरिक आजीविका, बेरोजगारी और प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी की दर्दनाक तस्वीर बन चुकी है।
जिले के विभिन्न विकासखंडों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में महिलाएं अपने बच्चों के साथ खुलेआम भिक्षावृत्ति करती दिखाई देती हैं। जिला मुख्यालय के प्रमुख चौक-चौराहों और ट्रैफिक सिग्नलों पर रोजाना ऐसे कई दृश्य देखने को मिलते हैं, जहां मासूम बच्चे धूप और धूल के बीच अपने बचपन को सड़कों पर बिताने को मजबूर हैं। यह दृश्य न केवल लोगों की संवेदनाओं को झकझोरता है बल्कि समाज और प्रशासन दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
ऐसी ही एक महिला से बातचीत के दौरान उसकी मजबूरी और दर्द साफ झलक उठा। महिला ने बताया कि वह प्रतिदिन सुबह घर से निकलकर भीख मांगने का काम करती है। वह भैयाथान विकासखंड के ग्राम समोली की रहने वाली है और बसोर समाज से संबंध रखती है। महिला के अनुसार उनके पूर्वज कभी बांस के कुशल कारीगर हुआ करते थे और बांस से घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाकर परिवार का गुजारा चलता था। लेकिन समय बदलने के साथ प्लास्टिक और आधुनिक सामानों ने बाजार पर कब्जा जमा लिया, जिससे बांस के सामानों की मांग धीरे-धीरे खत्म हो गई और उनके परिवार का पारंपरिक रोजगार भी छिन गया।
महिला ने बताया कि रोजगार के अभाव में अब उनके पास भीख मांगने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है। वर्षों से इसी परिस्थिति में जीवन गुजारने के कारण अब वे लगातार मेहनत वाला काम भी नहीं कर पातीं। सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति उन बच्चों की है, जिनका बचपन स्कूल, खेल और शिक्षा से दूर ट्रैफिक सिग्नलों और सड़कों के किनारे गुजर रहा है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि प्रशासन गंभीर पहल करे तो ऐसे परिवारों को रोजगार योजनाओं, स्वरोजगार, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास योजनाओं से जोड़कर मुख्यधारा में लाया जा सकता है। लोगों का मानना है कि केवल दान या सहानुभूति से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इनके स्थायी पुनर्वास के लिए ठोस योजना बनाने की जरूरत है।
सूरजपुर की सड़कों पर दिखाई दे रहे ये दृश्य इस बात का संकेत हैं कि विकास की चमक के पीछे आज भी कई परिवार दो वक्त की रोटी और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

प्रदीप मिश्रा
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