“हसदेव में राख, हवा में जहर”: धनरास स्थित NTPC के राखड़ डैम से उठता राख गुबार और सिस्टम की चुप्पी, कब तक भुगतेगा कोरबा?
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN 7647981711, 9303948009
“धनरास से दर्री तक राख का कब्ज़ा: उपनगरीय क्षेत्र दमघोंटू, हसदेव किनारे बेकाबू होता राख का गुबार, कब जागेगा सिस्टम?”
कोरबा ACGN :- छत्तीसगढ़ की ऊर्जा नगरी कोरबा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां विकास और विनाश की रेखा लगभग मिट चुकी है। कोरबा जिले के पश्चिमी हिस्से दर्री उपनगर में NTPC का धनरास ग्राम में स्थित विशाल राखड़ डैम अब केवल एक औद्योगिक संरचना नहीं, बल्कि फैलते प्रदूषण का स्थायी स्रोत बन गया है। नदी के बिल्कुल किनारे धनरास से लेकर छुरी, कछार तक कई हेक्टेयर में फैला यह डैम अब अपने दायरे से बाहर निकल चुका है आसपास के ग्रामीण अंचलों से होते हुए इसका असर दर्री नगर और पूरे उपनगरीय क्षेत्र तक पहुंच गया है। हर दिन, हर सुबह, हर आंधी के बाद एक ही दृश्य सामने आता है राख से ढके घर, सड़कों पर जमी परत, पेड़ों की मुरझाई हरियाली और हवा में तैरता जहर। खास कर अप्रैल–मई की तेज हवाएं इस संकट को और भयावह बना देती हैं; हवा या आंधी यदि केवल 5 मिनट भी चल जाए, तो उसके बाद घंटों तक राख हवा में तैरती रहती है और पूरा क्षेत्र धुंध की तरह ढक जाता है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे फैलती एक अदृश्य बीमारी है।

इस संकट की गंभीरता को उस घटना ने और स्पष्ट कर दिया, जब कुछ समय पहले CSEB का राखड़ डैम फट गया और भारी मात्रा में राख बहकर सीधे हसदेव नदी में जा मिली, वही नदी, जिससे जिले की बड़ी आबादी अपना पीने का पानी प्राप्त करती है।

उस दौरान लोगों को वही पानी पीना पड़ा, जिसमें राख घुल चुकी थी। यह राख केवल कोरबा ही नहीं आस पास के जिले तक पानी में घुल कर लोगो के जीवन से खिलवाड़ कर रहा था , यह घटना एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी थी


लेकिन सवाल यह है कि क्या इस चेतावनी से किसी ने सबक लिया? आज भी धनरास का डैम उसी नदी के किनारे खड़ा है, उसी जोखिम के साथ।

ग्रामीणों ने कई बार अपनी आवाज उठाई है। ग्राम धनरास के सरपंच के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन हुए, जनपद सदस्य ने सुशासन तिहार में कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा, स्थानीय लोग बार-बार शिकायतें करते रहे, लेकिन हर बार वही क्रम दोहराया गया। अधिकारी आते हैं, स्थिति देखते हैं, आश्वासन देते हैं और फिर चले जाते हैं। इसके बाद राख फिर उड़ती है, लोग फिर खांसते हैं और जिंदगी फिर उसी संघर्ष में लौट जाती है।

मुआवज़े के नाम पर भी एक विडंबना सामने आती है राशि केवल कुछ नजदीकी गांवों तक सीमित, जबकि प्रदूषण का असर दर्री नगर तक फैला है। सालभर की परेशानी के बदले कुछ हजार रुपये क्या यह मुआवज़ा है या मज़ाक?

स्वास्थ्य पर इसका असर अब आंकड़ों में नहीं, बल्कि हर घर में दिखाई दे रहा है। दमा, अस्थमा, एलर्जी और श्वसन रोगों के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। बच्चे छोटी उम्र में ही इन समस्याओं से जूझ रहे हैं, बुजुर्गों के लिए सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। सरकारी अस्पतालों में सीमित सुविधाएं हैं, और निजी अस्पतालों में इलाज इतना महंगा कि आम आदमी के लिए बोझ बन जाता है।

वही राख का परिवहन भी इस संकट को बढ़ा रहा है ट्रक ट्रेलरों से गिरती औरउड़ती राख सड़कों से उठकर सीधे लोगों की सांसों में घुसती है।

इस पूरे मामले में पर्यावरण विभाग और प्रशासन की चुप्पी सबसे ज्यादा चुभती है। न कोई सख्त निगरानी, न ठोस कार्रवाई, न ही पारदर्शी रिपोर्टिंग मानो सब कुछ कागजों तक सीमित हो।

कोरबा का आम नागरिक आज यह महसूस कर रहा है कि यहां विकास का अर्थ है एक ओर बिजली की चमक और दूसरी ओर राख से ढकी जिंदगी।
अब जवाब कौन देगा?
क्या दर्री नगर तक फैल चुकी राख के बीच सांस लेना ही कोरबा की नियति बन चुका है?
जब हसदेव का पानी भी राख से अछूता नहीं रहा, तो लोगों के जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्या मुआवज़े के कुछ हजार रुपये लोगों की सेहत और भविष्य की कीमत तय कर सकते हैं?
क्या उद्योगों के मुनाफे के सामने आम नागरिक की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है?
समाधान: अब निर्णायक कार्रवाई का समय
वर्तमान में स्थिति अब उस स्तर पर पहुंच चुकी है, जहां केवल चेतावनी या औपचारिकता से काम नहीं चलेगा। धनरास स्थित राखड़ डैम का स्वतंत्र और वैज्ञानिक ऑडिट कर उसे पूर्णतः कवर और सुरक्षित बनाया जाना चाहिए, ताकि हवा के संपर्क में आने वाली राख पर स्थायी नियंत्रण हो सके।
24×7 अत्याधुनिक डस्ट कंट्रोल और जल छिड़काव प्रणाली को सख्ती से लागू किया जाए और इसकी निगरानी के लिए रियल-टाइम सिस्टम विकसित किया जाए।
राख परिवहन के लिए पूरी तरह सीलबंद वाहनों को अनिवार्य किया जाए, नियमों के उल्लंघन पर भारी दंड तय हो और सड़क स्तर पर नियमित निरीक्षण किया जाए।
मुआवज़ा नीति में व्यापक सुधार करते हुए केवल नजदीकी गांवों ही नहीं, बल्कि पूरे प्रभावित क्षेत्र दर्री नगर सहित को शामिल किया जाए और वास्तविक स्वास्थ्य एवं आर्थिक नुकसान के आधार पर पर्याप्त एवं समयबद्ध क्षतिपूर्ति दी जाए।
प्रभावित क्षेत्रों में विशेष स्वास्थ्य आपात योजना लागू कर मुफ्त उपचार, नियमित मेडिकल कैंप और श्वसन रोगों के लिए विशेष इकाइयां स्थापित की जाएं।
पर्यावरण विभाग को सक्रिय भूमिका निभाते हुए नियमित मॉनिटरिंग, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी, ताकि भविष्य में हसदेव जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
अब समय आ गया है कि राख पर नियंत्रण केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई दे क्योंकि यह लड़ाई अब पर्यावरण की नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और अस्तित्व की
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