चार बार टूटा तटबंध, अब एक्शन मोड में प्रबंधन, जांच, जुर्माना और सुधार की तेज रफ्तार
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कोरबा, छत्तीसगढ़
By ACGN | 7647981711, 9303948009
चौथी बार तटबंध टूटने के बाद बढ़ा दबाव, जुर्माना, जांच और मरम्मत एक साथ तेज; राउरकेला विशेषज्ञ टीम करेगी तकनीकी जांच, लापरवाही मिलने पर सख्त कार्रवाई के संकेत
कोरबा जिले के दर्री स्थित छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी मर्यादित के हसदेव ताप विद्युत संयंत्र के राख संग्रहण के लिए बनाए गए नवागांव-झाबु स्थित राखड़ डैम का 19 अप्रैल को चौथी बार तटबंध टूटना न सिर्फ एक गंभीर तकनीकी विफलता के रूप में सामने आया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम के लिए एक बड़ी चेतावनी भी बन गया है। पहले तीन बार भी इसी स्थान से तटबंध ध्वस्त हो चुका था, लेकिन इस बार की घटना ने एक युवक की जान लेकर इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। यही कारण है कि जहां एक ओर सवाल तेज हुए हैं, वहीं दूसरी ओर इस बार की प्रतिक्रिया भी पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज और व्यापक नजर आ रही है।
इस घटना के तुरंत बाद प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ और जिला प्रशासन ने कलेक्टर कुणाल दुदावत के निर्देश पर एडिशनल कलेक्टर ओंकार यादव के नेतृत्व में जांच टीम गठित कर दी। साथ ही, सीएसईबी प्रबंधन की ओर से विभागीय जांच भी जारी है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले तीसरी घटना के बाद ही विभागीय जांच शुरू कर दी गई थी, जिसमें अधीक्षण अभियंता का तबादला और कार्यपालन अभियंता तथा उप अभियंता के निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई की गई थी। इसके बावजूद चौथी बार उसी स्थान से तटबंध का टूटना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
हालांकि इस बार एक महत्वपूर्ण बदलाव यह देखने को मिला है कि पर्यावरण विभाग और जल संसाधन विभाग द्वारा प्रबंधन पर जुर्माना लगाए जाने के बाद सुधारात्मक कार्यों की गति में स्पष्ट तेजी आई है। लंबे समय से राखड़ उड़ने और प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों की शिकायतों को भी अब प्राथमिकता मिलती दिख रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू राउरकेला, ओडिशा से विशेषज्ञों की टीम का कोरबा पहुंचना है। एनआईटी से जुड़े विशेषज्ञ श्री सी.आर. पात्रा के नेतृत्व में यह टीम रविवार तक कोरबा पहुंच जाएगी इसके पश्चात सोमवार से स्थल पर विस्तृत तकनीकी जांच प्रारंभ करेगी। यह टीम केवल इस एक तटबंध के टूटने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दर्री क्षेत्र में स्थित हरदेवता विद्युत संयंत्र के अन्य राखड़ डैमों का भी निरीक्षण कर समग्र तकनीकी मूल्यांकन करेगी। इससे यह उम्मीद जताई जा रही है कि समस्या की जड़ तक पहुंचकर स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
घटना के प्रारंभिक जांच में यह संकेत मिले हैं कि अत्यधिक जलदबाव और ड्रेनेज सिस्टम की कमी इस घटना के प्रमुख कारण हो सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए फिलहाल राखड़ डैम में अस्थायी ड्रेनेज की व्यवस्था की गई है और सिपेज से निकलने वाले पानी को फिल्टर करने के लिए टेंपरेरी फिल्टर भी लगाया गया है, ताकि नदी के पानी को प्रदूषित होने से बचाया जा सके।
घटना के बाद प्रबंधन के कार्यों की जानकारी के लिए हमारी टीम ने अधीक्षण अभियंता (सिविल) एस.के. साहू से बातचीत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूर्व की घटनाओं के कारणों की पूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन वर्तमान में जो स्थिति सामने आई है, उसमें पानी का दबाव और ड्रेनेज की कमी मुख्य कारण प्रतीत हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विशेषज्ञों की टीम के आने के बाद तकनीकी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाएगी और उसी आधार पर स्थायी समाधान लागू किया जाएगा।
महत्वपूर्ण यह भी है कि प्रबंधन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जांच पूरी होने के बाद यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों या जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अब पूरा मामला इसी पर टिका है कि तटबंध का बार-बार ध्वस्त होना महज तकनीकी कारणों का परिणाम है या फिर कहीं न कहीं मानवीय लापरवाही भी इसमें शामिल रही है।
अधीक्षण अभियंता (सिविल) श्री साहू ने बताया कि वर्तमान में जिस पॉन्ड में तटबंध टूटा है, वहां राखड़ डालना पूरी तरह बंद कर दिया गया है और दूसरे पॉन्ड में सीमित क्षमता के साथ संचालन किया जा रहा है। राखड डैम में बढ़ते राख के दबाव को कम करने एवं शासन की मनसा अनुरूप रख का अधिक से अधिक निष्पादन के लिए पांच ठेकेदारों को कार्यादेश जारी कर प्रतिदिन लगभग 5000 घन मीटर राखड़ बाहर भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस राखड़ को बिलासपुर, रतनपुर और चोटिया जैसे क्षेत्रों में उपयोग के लिए भेजा जा रहा है, जिससे डैम में अतिरिक्त स्थान बन सके और आगामी वर्षा ऋतु में किसी प्रकार का दबाव न बने।
इसके साथ ही पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए भी कई कदम उठाए जा रहे हैं। राखड़ उड़ने की समस्या को देखते हुए राखड डैम के चारों ओर ग्रीन पर्दे लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई है, स्प्रिंकलर के माध्यम से राखड़ को गीला रखने की व्यवस्था की जा रही है और परिवहन के दौरान उड़ने वाली धूल को रोकने के लिए टैंकरों का उपयोग किया जा रहा है। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ग्रामीणों को राहत देने की दिशा में भी आवश्यक हैं।
इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अब भी यही बना हुआ है कि आखिर एक ही स्थान से चार बार तटबंध क्यों टूटा और क्या पूर्व में की गई जांचों में वास्तविक तकनीकी खामियों की पहचान नहीं हो पाई थी। यह भी सवाल उठता है कि क्या हर बार किसी बड़े हादसे के बाद ही सिस्टम सक्रिय होगा या फिर इस बार सच में स्थायी समाधान की दिशा में काम होगा।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि जुर्माना, जनदबाव और लगातार उठते सवालों के बीच इस बार प्रबंधन अधिक गंभीर और सक्रिय नजर आ रहा है। तेजी से चल रहे मरम्मत कार्य, विशेषज्ञों की टीम की तैनाती और पर्यावरणीय उपाय इस बात के संकेत हैं कि इस बार केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सुधार की वास्तविक कोशिश की जा रही है।
अब सबकी नजर राउरकेला से आई विशेषज्ञ टीम की रिपोर्ट पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि यह घटना केवल एक और मरम्मत तक सीमित रहेगी या फिर वास्तव में एक स्थायी समाधान की शुरुआत साबित होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट होगा कि तटबंध का ध्वस्त होना तकनीकी खामी का परिणाम था या लापरवाही का—और यदि लापरवाही सामने आती है, तो प्रबंधन का रुख कितना कड़ा होता है, यह भी आने वाले समय में देखने वाली बात होगी।
अब देखना होगा कि यह “चौथी चेतावनी” सिस्टम के लिए अंतिम साबित होती है या फिर इतिहास खुद को दोहराने की आशंका बनी रहेगी।
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प्रदीप मिश्रा
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