भारतीय समाज में पुरुषों के न्याय संकट पर उठे सवाल
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गंजाम, ओडिशा
By ACGN 7647981711, 9303948009
संवाददाता अनिल कुमार चौधरी
अधिवक्ता इंजीनियर विजय मिश्रा ने कहा, न्याय व्यवस्था में पुरुषों के अधिकारों और पीड़ा पर भी गंभीरता से विचार आवश्यक
वर्तमान समय में भारतीय समाज और न्याय व्यवस्था को लेकर पुरुषों की स्थिति पर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। गंजाम जिले के ब्रह्मपुर निवासी अधिवक्ता और इंजीनियर विजय मिश्रा ने एक लेख के माध्यम से कहा है कि समाज और न्याय व्यवस्था में पुरुषों को न्याय मिलने की प्रक्रिया कई बार जटिल और कठिन हो जाती है। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें पुरुषों ने मानसिक और सामाजिक दबाव के कारण गंभीर कठिनाइयों का सामना किया है।
उन्होंने कहा कि कई बार पारिवारिक विवाद या पति-पत्नी के बीच उत्पन्न मतभेद जब सार्वजनिक या कानूनी स्तर तक पहुंचते हैं, तो समाज और मीडिया में तुरंत पुरुषों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। इससे कई बार न्यायालय का निर्णय आने से पहले ही व्यक्ति सामाजिक रूप से दोषी मान लिया जाता है, जिससे उसके मानसिक, सामाजिक और पेशेवर जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

अधिवक्ता विजय मिश्रा का कहना है कि महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून समाज में आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कुछ मामलों में इनका दुरुपयोग भी सामने आया है। उनका मानना है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है ताकि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक कानूनी परेशानियों का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि कई न्यायालयों ने भी समय-समय पर झूठे मामलों और कानूनों के दुरुपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की है।
उन्होंने अपने विचारों में यह भी उल्लेख किया कि परिवार और समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए पुरुष और महिला दोनों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को समान रूप से समझना आवश्यक है। किसी भी समाज में असंतुलन दीर्घकाल में सभी के लिए हानिकारक होता है। उपलब्ध आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश में आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या अधिक होने की बात भी सामने आती रही है, जो सामाजिक और मानसिक दबाव की ओर संकेत करती है।
अधिवक्ता विजय मिश्रा ने कहा कि एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए पुरुष और महिला दोनों को परस्पर सम्मान, सहयोग और विश्वास के साथ जीवन जीना होगा। उनका मानना है कि न्याय व्यवस्था को भी दोनों पक्षों के प्रति समान और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए ताकि संविधान के अनुसार सभी नागरिकों को समान न्याय और अधिकार मिल सकें।
प्रदीप मिश्रा
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