जहां कभी डर की चर्चा थी, वहां अब पर्यटन की दस्तक! बस्तर में बदल रही तस्वीर, गांवों से खुल रही रोजगार की राह
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बस्तर, छत्तीसगढ़
By ACGN – 7647981711, 9303948009
प्रकृति, जनजातीय संस्कृति, हस्तशिल्प, होमस्टे और इको-टूरिज्म से बस्तर में आकार ले रही नई अर्थव्यवस्था; स्थानीय युवाओं और ग्रामीण परिवारों के लिए खुल रहे रोजगार के अवसर
बस्तर ACGN:- छत्तीसगढ़ का बस्तर अब अपनी पहचान के एक नए दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। जिस क्षेत्र की चर्चा लंबे समय तक नक्सलवाद और हिंसा के संदर्भ में होती रही, वही बस्तर आज अपनी प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध जनजातीय संस्कृति, कला, परंपराओं और आतिथ्य के कारण पर्यटन के नए केंद्र के रूप में सामने आ रहा है। बदलते माहौल के बीच पर्यटन, इको-टूरिज्म, ग्रामीण पर्यटन और स्थानीय उद्यमिता के अवसर आकार ले रहे हैं, जिससे गांवों और स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार तथा आय के नए रास्ते खुलने की संभावना बन रही है।
बस्तर की सबसे बड़ी ताकत यहां प्रकृति और संस्कृति का अनोखा संगम है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, कुटुमसर और कैलाश गुफाएं, मां दंतेश्वरी मंदिर, दलपत सागर और बस्तर पैलेस जैसे स्थल पर्यटकों को प्रकृति, रोमांच, आस्था और इतिहास से रूबरू कराते हैं। यहां आने वाला पर्यटक केवल किसी जलप्रपात या ऐतिहासिक स्थल को देखकर वापस नहीं लौटता, बल्कि स्थानीय जीवन, पारंपरिक खान-पान, हस्तशिल्प, लोकनृत्य और संगीत से भी जुड़ता है। यही वजह है कि बस्तर को केवल घूमने की जगह के बजाय अनुभव आधारित पर्यटन के एक अलग मॉडल के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

कनेक्टिविटी मजबूत तो पर्यटन की राह आसान
किसी भी पर्यटन क्षेत्र के विकास में बेहतर संपर्क व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बस्तर में सड़क, रेल और हवाई संपर्क को मजबूत करने की दिशा में किए जा रहे प्रयास पर्यटन की संभावनाओं को नई गति दे सकते हैं। ‘बस्तर 2.0’ ब्लूप्रिंट में 228 नई सड़कों और 267 पुलों के निर्माण का प्रस्ताव दूरस्थ क्षेत्रों को बेहतर तरीके से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी एयरपोर्ट बस्तर को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्तमान में रायपुर और हैदराबाद के लिए हवाई संपर्क उपलब्ध होने से पर्यटकों के लिए पहुंच आसान हुई है। वहीं रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना जैसी योजनाएं भविष्य में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को और मजबूत करने की संभावनाएं रखती हैं।
बेहतर कनेक्टिविटी का फायदा केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने, ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर संपर्क देने और युवाओं को पर्यटन आधारित रोजगार से जोड़ने के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
होमस्टे से गांवों तक पहुंच रही पर्यटन की अर्थव्यवस्था
बस्तर में ग्रामीण और जनजातीय होमस्टे पर्यटन विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बन रहे हैं। छत्तीसगढ़ होमस्टे नीति 2025-30 के माध्यम से पर्यटकों को स्थानीय परिवारों के साथ रहकर ग्रामीण जीवन, जनजातीय संस्कृति, स्थानीय कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक खान-पान को करीब से समझने का अवसर देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
होमस्टे की खासियत यह है कि इससे पर्यटन का आर्थिक लाभ सीधे स्थानीय परिवारों तक पहुंच सकता है। पर्यटक जहां ठहरता है, वहीं भोजन, स्थानीय गाइड, परिवहन, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े दूसरे परिवारों के लिए भी आय के अवसर बनते हैं।
प्रावधान के अनुसार नए कमरे के निर्माण पर प्रति कमरा एक लाख रुपये और पहले से बने कमरे के नवीनीकरण पर प्रति कमरा 50 हजार रुपये की सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। एक से नौ कमरों तक सहायता के प्रावधान से ग्रामीण परिवार अपनी क्षमता के अनुसार पर्यटन गतिविधियों से जुड़ सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 85 हितग्राहियों को अनुदान के लिए बैंकों को प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं, जबकि 27 होमस्टे पहले से छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के साथ पंजीकृत हैं।

जब संस्कृति ही बन जाए पर्यटन की पहचान
बस्तर की जनजातीय संस्कृति उसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल है। बेलमेटल और धातु शिल्प, लकड़ी एवं बांस की कला, पारंपरिक आभूषण, नृत्य, संगीत और खान-पान देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। बस्तर पंडुम जैसे आयोजन इस सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच प्रदान कर रहे हैं।
वर्ष 2026 के बस्तर पंडुम में जनजातीय संस्कृति की 12 विधाओं को मंच मिला और लगभग 55 हजार आदिवासी लोगों की सहभागिता हुई। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम ने बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सामने रखने का अवसर दिया।

आस्था, प्रकृति और रोमांच-एक साथ
बस्तर में धार्मिक, सांस्कृतिक, इको-टूरिज्म और एडवेंचर पर्यटन की संभावनाएं एक साथ मौजूद हैं। मां दंतेश्वरी मंदिर और बस्तर दशहरा आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को आधार देते हैं, वहीं कांगेर घाटी और धुड़मारास जैसे क्षेत्र प्रकृति और रोमांच आधारित पर्यटन के लिए अलग पहचान बना रहे हैं।
धुड़मारास में एडवेंचर पर्यटन, ग्लास ब्रिज और कैनोपी वॉक जैसी सुविधाओं की योजना तथा गांव का यूएन टूरिज्म बेस्ट टूरिज्म विलेज डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए चयन ग्रामीण पर्यटन की संभावनाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पर्यटन बढ़े तो रोजगार भी बढ़े
बस्तर में पर्यटन विकास की असली तस्वीर तभी मजबूत होगी, जब इसका लाभ स्थानीय समुदाय तक पहुंचे। होमस्टे संचालक, पर्यटन गाइड, स्थानीय वाहन चालक, भोजन सेवा से जुड़े लोग, हस्तशिल्प विक्रेता, सांस्कृतिक कलाकार और साहसिक पर्यटन से जुड़े युवा इस उभरती पर्यटन अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं।
बस्तर के पर्यटन रोडमैप के अंतर्गत 45 युवाओं को पर्यटन प्रबंधन का प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी है। इससे संकेत मिलता है कि पर्यटन को केवल नए पर्यटन स्थलों के विकास तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय कौशल, रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

बस्तर की बदलती तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल
बस्तर के पर्यटन विकास की यह नई तस्वीर उम्मीदों से भरी है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कितना कायम रखा जाता है। जंगल, जलस्रोत और जनजातीय संस्कृति बस्तर की असली पहचान हैं। इसलिए पर्यटन का विस्तार ऐसा हो जिसमें स्थानीय संस्कृति की मौलिकता बनी रहे, प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और पर्यटन से होने वाली आय का उचित हिस्सा स्थानीय समुदाय तक पहुंचे।
सड़कें बस्तर को जोड़ रही हैं, हवाई संपर्क दूरी कम कर रहा है, रेल कनेक्टिविटी की संभावनाएं विस्तार पा रही हैं, होमस्टे गांवों को पर्यटन अर्थव्यवस्था से जोड़ रहे हैं और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन इसकी सांस्कृतिक पहचान को व्यापक मंच दे रहे हैं।
बस्तर अब केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह संभावनाओं का एक नया अध्याय लिख रहा है। जंगलों की हरियाली, जलप्रपातों की खूबसूरती, जनजातीय संस्कृति की जीवंतता और स्थानीय लोगों की मेहमाननवाजी मिलकर छत्तीसगढ़ के पर्यटन को नई दिशा दे सकती है। बस्तर की नई पहचान अब केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, पर्यटन, शांति और स्थानीय विकास की उभरती संभावनाओं से लिखी जा रही है।
प्रदीप मिश्रा
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