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जिस नाचा ने छत्तीसगढ़ की मिट्टी की आवाज दूर तक पहुंचाई, उसके पुरोधा को नमन! दाऊ मंदराजी की विरासत आज भी जिंदा

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रायपुर, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- अनादि पांडेय रायपुर


पुण्यतिथि पर संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने दी श्रद्धांजलि, कहा-लोकभाषा, हास्य-व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों को मंच देने वाले महान लोक कलाकार का योगदान सदैव स्मरणीय


रायपुर ACGN:- छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की पहचान केवल गीत-संगीत और परंपराओं से नहीं, बल्कि उन लोक कलाकारों की साधना से भी बनी है, जिन्होंने अपनी मिट्टी की आवाज को मंच दिया और उसे पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम किया। ऐसे ही महान लोक कलाकार थे दाऊ दुलार सिंह मंदराजी, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य ‘नाचा’ को एक अलग पहचान और विशिष्ट स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दाऊ मंदराजी की पुण्यतिथि पर संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और नाचा की परंपरा को समृद्ध करने में दाऊ मंदराजी का योगदान हमेशा स्मरण किया जाता रहेगा।
नाचा को मनोरंजन से आगे लोकजीवन की आवाज बनाया
संस्कृति मंत्री ने कहा कि दाऊ दुलार सिंह मंदराजी ने नाचा को केवल मनोरंजन का माध्यम बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसे छत्तीसगढ़ के जनजीवन, लोकभाषा, सामाजिक सरोकारों और सांस्कृतिक भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाला प्रभावशाली लोकमंच बनाया।
उनका जीवन लोककला और कलाकारों के उत्थान के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कलाकारों को संगठित कर ‘रैली रिगनी साज’ नाचा दल बनाया, जिसे छत्तीसगढ़ की पहली नाचा पार्टी के रूप में बताया जाता है।
यह पहल केवल एक नाचा दल के गठन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने अनेक लोक कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मंच उपलब्ध कराने का रास्ता खोला।
        हंसी के बीच समाज की बात कहने की कला
दाऊ मंदराजी की कला की सबसे बड़ी विशेषताओं में छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की सहजता, हास्य और व्यंग्य के साथ सामाजिक सरोकारों को जोड़ना शामिल रहा। नाचा के माध्यम से उन्होंने आम लोगों की भाषा में उनके जीवन, उनकी परिस्थितियों और समाज से जुड़े विषयों को अभिव्यक्ति दी।
उनके प्रयासों से नाचा को गांवों की सीमाओं से आगे व्यापक पहचान मिली और लोक कलाकारों के लिए एक ऐसा मंच तैयार हुआ, जहां कला के साथ समाज की बात भी कही जा सकती थी।
            पीढ़ियों तक पहुंची मिट्टी की वह आवाज
संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध लोक परंपराओं, लोककलाओं और लोक कलाकारों से है। दाऊ मंदराजी जैसे कलाकारों ने अपनी साधना से इन परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
आज जब नई पीढ़ी आधुनिक मनोरंजन के अनेक माध्यमों से जुड़ रही है, ऐसे समय में अपनी लोककला और सांस्कृतिक विरासत से उसे जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। दाऊ मंदराजी का जीवन इस दिशा में प्रेरणा देने वाला उदाहरण है।
  ‘दाऊ मंदराजी सम्मान’ बना स्मृति और कृतज्ञता का प्रतीक
संस्कृति मंत्री ने कहा कि दाऊ मंदराजी की स्मृति में राज्य सरकार द्वारा लोक नाट्य एवं लोक शिल्प के क्षेत्र में ‘दाऊ मंदराजी सम्मान’ प्रदान किया जाना उनके योगदान के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है।
यह सम्मान केवल एक महान कलाकार की स्मृति को जीवित रखने का माध्यम नहीं, बल्कि लोककला के क्षेत्र में काम करने वाले कलाकारों को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जाता है।
अपनी मिट्टी से जुड़कर भी कला को मिल सकती है व्यापक पहचान
दाऊ मंदराजी का जीवन यह संदेश देता है कि अपनी मिट्टी, अपनी बोली और अपनी लोक परंपराओं से गहराई से जुड़कर भी कला को व्यापक पहचान दिलाई जा सकती है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोकजीवन को नाचा के मंच पर इस तरह प्रस्तुत किया कि उसकी सहजता, हास्य, व्यंग्य और सामाजिक चेतना लोगों तक पहुंच सकी।
उनकी कला-साधना ने छत्तीसगढ़ी नाचा को केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं रहने दिया, बल्कि उसे लोकजीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
दाऊ दुलार सिंह मंदराजी की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना दरअसल छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक परंपरा को नमन करना है, जो गांव की चौपालों, लोकभाषा, गीत-संगीत और नाचा के माध्यम से आज भी जीवित है।
दाऊ मंदराजी चले गए, लेकिन उनकी बोली, उनका नाचा और अपनी मिट्टी से जुड़ी उनकी कला-साधना आज भी छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा संदेश भी।


प्रदीप मिश्रा
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