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सच की तह तक

“मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में की शिकायत,संपर्क हुआ नहीं,निराकरण प्रस्तुत, जांच का सच अब भी रहस्य!”

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रायगढ़, छत्तीसगढ़

By ACGN – 7647981711, 9303948009
संवाददाता :- रायगढ़

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का रहस्य: संपर्क हुआ नहीं, जांच हुई नहीं तो शिकायत का निराकरण कैसे?
11:10 बजे कथित निजी उपचार, 11:18 बजे अवकाश आवेदन; शिकायत में वीडियो, लेकिन जांच में सिर्फ कर्मचारी का जवाब!

रायगढ़ ACGN:रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड के हाटी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ सुपरवाइजर लालजी राठौर से जुड़ा मामला अब स्वास्थ्य विभाग और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

शिकायतकर्ता के अनुसार 11 अगस्त 2026 को करीब 11:10 बजे संबंधित कर्मचारी को अपने घर पर निजी क्लीनिक में कथित रूप से मरीजों का उपचार करते देखा गया। शिकायत में इसका वीडियो साक्ष्य भी उपलब्ध कराने का दावा किया गया है। इसके बाद करीब 11:18 बजे संबंधित उक्त कर्मचारी द्वारा व्हाट्सऐप के माध्यम से अवकाश का आवेदन भेजे जाने की बात सामने आई।

स्वास्थ्य कर्मी की छुट्टी के सामान्य नियम
स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी भी शासकीय सेवा के अवकाश नियमों के अधीन आते हैं। सामान्यतः छुट्टी पर जाने से पहले सक्षम अधिकारी को आवेदन देकर स्वीकृति लेना जरूरी होता है।
आकस्मिक अवकाश अचानक उत्पन्न हुई आवश्यक परिस्थिति में लिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को तत्काल अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचना देनी चाहिए। यदि पहले आवेदन करना संभव न हो, तो दूरभाष या उपलब्ध डिजिटल माध्यम से सूचना देकर बाद में नियमानुसार आवेदन प्रस्तुत करना होता है।
इसलिए हाटी मामले में सवाल है, यदि घरेलू काम पहले से पता था तो पहले छुट्टी क्यों नहीं मांगी गई? और यदि आकस्मिक परिस्थिति थी तो क्या संबंधित अधिकारी को तत्काल सूचना देकर छुट्टी स्वीकृत कराई गई थी?


इसलिए यदि किसी कर्मचारी के बारे में 11:10 बजे ड्यूटी के बजाय घर पर होने का आरोप है और 11:18 बजे उसने घरेलू कार्य के कारण अवकाश का आवेदन भेजा, तो केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि आवेदन भेजा गया था या नहीं। जांच में यह देखना चाहिए कि अवकाश कब मांगा गया, कब स्वीकृत हुआ, किस अधिकारी ने स्वीकृत किया, कर्मचारी की निर्धारित ड्यूटी क्या थी, उपस्थिति पंजिका में क्या दर्ज है और 11:10 बजे उसकी वास्तविक स्थिति क्या थी।
अगर घर में काम पहले से ज्ञात था, तो पहले आवेदन क्यों नहीं किया गया, यह भी विभागीय जांच का उचित प्रश्न है। वहीं यदि कर्मचारी का दावा है कि परिस्थिति अचानक उत्पन्न हुई थी, तो उस दावे की भी जांच की जानी चाहिए।
“अवकाश का आवेदन देना और अवकाश स्वीकृत होना दो अलग बातें हैं।  क्या इस पूरे घटनाक्रम का ड्यूटी अभिलेख और उपस्थिति पंजिका से मिलान किया गया?

यदि लालजी राठौर ने 11 अगस्त को घरेलू कार्य के कारण आकस्मिक अवकाश लिया था, तो क्या विभाग ने यह जांच की कि आकस्मिक अवकाश की वास्तविक वजह क्या थी?

शिकायत में केवल अनुपस्थिति नहीं, बल्कि घर पर कथित निजी क्लीनिक खोलकर मरीजों का उपचार करने की बात भी कही गई है। यदि यह उपचार नियमों के तहत हो रहा था तो उस प्रतिष्ठान का पंजीयन क्रमांक, नाम और वैध अनुमति क्या है? घर पर मरीज देखने और दवाइयां देने की अनुमति किस आधार पर है? खासकर बच्चों का उपचार और दवा वितरण किस वैधानिक अधिकार के तहत किया जा रहा था?
यदि यह निजी चिकित्सा केंद्र नियमसम्मत नहीं था तो स्वास्थ्य विभाग और संबंधित औषधि अधिकारियों ने इसकी जांच क्यों नहीं की? और यदि नियमसम्मत था तो उसका पंजीयन सार्वजनिक क्यों नहीं है?


          मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का जवाब भी सवालों में
मामला मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 तक पहुंचा। शिकायत हुई शिकायत क्रमांक के साथ जांच का आश्वासन भी मिला, कुछ दिन बाद शिकायतकर्ता को व्हाट्सएप्प में संदेश मिला कि निराकरण की पुष्टि के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क स्थापित नहीं हो सका। इसके बाद आगे की जानकारी के लिए हेल्पलाइन से संपर्क करने को कहा गया।


जब संपर्क किया गया तो जवाब में बताया गया लेकिन 17 अगस्त 2026 के खंड चिकित्सा अधिकारी कार्यालय, धरमजयगढ़ के पत्र में शिकायत के संबंध में बताया गया कि 13 अगस्त को संबंधित कर्मचारी को नोटिस दिया गया और 14 अगस्त को उसके द्वारा जवाब प्रस्तुत किया गया। जवाब में कर्मचारी ने घर पर प्रैक्टिस से इनकार करते हुए 11 अगस्त को घरेलू कार्य के कारण अवकाश पर रहने की बात कही।


अब रहस्य यही है, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन ने संपर्क करने का प्रयास किस अधिकारी ने किया? किस नंबर से किया? कितनी बार किया? संपर्क क्यों नहीं हुआ? और क्या शिकायतकर्ता से संपर्क किए बिना ही शिकायत का निराकरण मान लिया गया?
मौके की जांच हुई तो पंचनामा और गवाह कहां?

शिकायतकर्ता स्वयं साक्षी होने और वीडियो उपलब्ध कराने की बात कह रहा है। ऐसे में यदि वास्तविक भौतिक जांच हुई तो क्या अधिकारी संबंधित कर्मचारी के घर पहुंचे? क्या कथित निजी क्लीनिक की जांच की गई? क्या आसपास के ग्रामीणों से पूछताछ हुई? क्या पंचनामा बनाया गया? क्या शिकायतकर्ता का बयान लिया गया? और वीडियो साक्ष्य की जांच किस आधार पर की गई?
जांच रिपोर्ट में इन सवालों का स्पष्ट उल्लेख दिखाई नहीं देता। वहां मुख्य रूप से नोटिस और कर्मचारी के जवाब का उल्लेख है।


यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि शिकायत की जांच हुई या केवल शिकायत का कागजी निराकरण?
मुख्यमंत्री हेल्पलाइन आम नागरिक की शिकायत को समाधान तक पहुंचाने के लिए है। या मामले को दबाने के लिए यदि शिकायतकर्ता से संपर्क ही नहीं हुआ, मौके की जांच स्पष्ट नहीं है और उपलब्ध वीडियो साक्ष्य का परीक्षण सामने नहीं आया, तो जनता यह जानना चाहेगी कि शिकायत का वास्तविक समाधान आखिर हुआ कहां?
सरकार को अब सिर्फ जवाब नहीं, जांच का आधार बताना चाहिए। क्योंकि शिकायत नंबर मिलना समाधान नहीं और कर्मचारी का जवाब लेना पूरी जांच नहीं।

मामला केवल एक कर्मचारी की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि जांच की पारदर्शिता और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की विश्वसनीयता का है। यदि शिकायत में वीडियो साक्ष्य है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो, शिकायतकर्ता और ग्रामीणों के बयान लिए जाएं तथा कथित निजी क्लीनिक के पंजीयन व वैधता की जांच की जाए। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि शिकायत का समाधान वास्तव में हुआ है या केवल कागजों में। जनता को शिकायत नंबर नहीं, न्याय और कार्रवाई चाहिए।

जब शिकायतकर्ता जांच से संतुष्ट ही नहीं है, तो क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन दोबारा निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या मौके पर भौतिक सत्यापन, शिकायतकर्ता के बयान और उपलब्ध वीडियो साक्ष्य की जांच होगी, या फिर कर्मचारी का जवाब लेकर मामला यूं ही फाइलों में दबा दिया जाएगा? आखिर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन जनता को वास्तविक समाधान देगी या सिर्फ शिकायत बंद होने का संदेश?

अगली कड़ी में हम बताएंगे कि हाटी मामले में वास्तव में क्या जांच हुई, मौके पर कौन पहुंचा और शिकायतकर्ता के साक्ष्यों का क्या हुआ। क्या गरीब ग्रामीणों की जिंदगी और स्वास्थ्य से इसी तरह खिलवाड़ होता रहेगा और विभाग सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना रहेगा? या फिर अपने ही कर्मचारी के बचाव से आगे बढ़कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी?

क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन जनता के बीच अपना विश्वास कायम रख पाएगी? या सिर्फ कागजी निराकरण तक सीमित रह जाएगी। सवाल अब मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की विश्वसनीयता का भी है, क्या जनता की आवाज सच में शासन तक पहुंच रही है?

प्रदीप मिश्रा संपादक
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